भारत के जाने-माने शिक्षाविद और बिहार, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल पद्मश्री डॉ डीवाई पाटिल (ज्ञानदेव यशवंतराव पाटिल) का मंगलवार को महाराष्ट्र के कोल्हापुर स्थित उनके घर पर 90 साल की उम्र में निधन हो गया. उनके निधन के साथ देश ने शिक्षा जगत की एक ऐसी शख्सियत को खो दिया, जिन्होंने लाखों छात्रों के भविष्य को नई दिशा दी.
करीब पांच दशकों तक उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में ऐसा काम किया कि डीवाई पाटिल सिर्फ एक नाम नहीं बल्कि भरोसे का प्रतीक बन गए. उन्होंने स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और अस्पतालों का विशाल नेटवर्क खड़ा किया, जहां से लाखों छात्र डॉक्टर, इंजीनियर, दंत चिकित्सक, प्रबंधन विशेषज्ञ, नर्स और शोधकर्ता बनकर निकले. उनकी बनाई शैक्षणिक विरासत आज भी देशभर के युवाओं के सपनों को उड़ान दे रही है.
उनके बड़े सपनों ने खड़ा कर दिया विशाल नेटवर्क
महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में 22 अक्टूबर, 1935 को जन्मे ज्ञानदेव यशवंतराव पाटिल एक किसान परिवार से थे. उन्होंने राजाराम कॉलेज, कोल्हापुर ग्रेजुएशन किया और फिर शिवाजी विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई की, जहां उन्होंने फर्स्ट डिविजन के साथ अपनी डिग्री ली. शिक्षा और सार्वजनिक सेवा से उनका प्रारंभिक जुड़ाव उनके जीवन की दिशा तय करने में सहायक रहा. हालांकि, पाटिल ने वकील के रूप में ट्रेनिंग ली लेकिन उनका सबसे बड़ा योगदान अदालतों के अंदर नहीं बल्कि कक्षाओं में था.
केवल कॉलेज नहीं कैंपस का किया निर्माण
डॉ. पाटिल को महाराष्ट्र में निजी उच्च शिक्षा को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख लोगों में माना जाता है. उस समय जब प्रोफेशनल कोर्स की पढ़ाई के अवसर कम थे तब उन्होंने इंजीनियरिंग, मेडिकल, डेंटल, नर्सिंग, फार्मेसी, कृषि, मैनेजमेंट और आर्किटेक्चर जैसे क्षेत्रों में कई संस्थान शुरू किए. हालांकि, समय के साथ डीवाई पाटिल का विस्तार कोल्हापुर, नवी मुंबई, पुणे और देश के कई अन्य हिस्सों तक हो गया.
आगे चलकर यह 100 से ज्यादा स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और स्वास्थ्य संस्थानों का बड़ा नेटवर्क बन गया. इनमें से कई संस्थान बाद में मेडिकल और टेक्निकल शिक्षा के लिए प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों के रूप में बदल गए. उनकी सोच केवल अकादमिक क्षेत्र तक ही सीमित नहीं थी. संस्थानों से जुड़े अस्पताल भी चिकित्सा शिक्षा और रोगी देखभाल के प्रमुख केंद्र बन गए.
शिक्षा ने राजभवन तक पहुंचाया
शिक्षा उनके जीवन का मुख्य काम होने के साथ-साथ पाटिल कई अहम पदों पर भी काम कर चुके हैं. बिहार के राज्यपाल बनने से पहले उन्होंने त्रिपुरा के राज्यपाल के रूप में कार्य किया. बाद में उन्होंने पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के रूप में भी कार्यभार संभाला, जिससे वे उन गिने-चुने शिक्षाविदों में शामिल हो गए जिन्होंने कई राज्यों में राजभवन का पद संभाला. अपने राज्यपाल कार्यकाल के दौरान उन्होंने विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखा. उनकी नियुक्तियां शिक्षा क्षेत्र से परे उनकी प्रतिष्ठा को दर्शाती हैं, जहां उन्हें सार्वजनिक सेवा और संस्था निर्माण के लिए मान्यता प्राप्त थी.
किया गया सम्मानित
शिक्षा और समाज सेवा में उनके बड़े योगदान को देखते हुए डॉ. पाटिल को देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्म श्री से
सम्मानित किया गया. यह सम्मान उन्हें व्यावसायिक शिक्षा को आसान बनाने और देशभर के छात्रों के लिए बेहतर शैक्षणिक संस्थान खड़े करने के उनके लंबे प्रयासों के लिए मिला. शिक्षा के अलावा उनका योगदान स्वास्थ्य सेवा, परोपकार और खेल सुविधाओं के विकास में भी रहा. ये सभी क्षेत्र डीवाई पाटिल समूह के काम का अहम हिस्सा बने.
कैंपस में सिर्फ एक नाम नहीं, एक विरासत
कई पीढ़ियों के छात्रों के लिए डीवाई पाटिल केवल विश्वविद्यालयों, डिग्री और अस्पतालों पर लिखा नाम नहीं रहा, बल्कि यह एक ऐसी सोच की पहचान बना जिसमें शिक्षा को लोगों की जिंदगी बदलने का सबसे बड़ा माध्यम माना गया.
डॉ. पाटिल के निधन से शिक्षा जगत में एक युग का अंत हो गया है, लेकिन उनके बनाए संस्थान आज भी हजारों-लाखों छात्रों को आगे बढ़ने का मौका दे रहे हैं. इन संस्थानों से निकलने वाले छात्र ही उनकी सबसे बड़ी विरासत हैं, जो उनके सपने को आगे बढ़ा रहे हैं.
दीपेश त्रिपाठी