भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) रुड़की और इंस्टीट्यूट ऑफ नैनो साइंस एंड टेक्नोलॉजी (INST), मोहाली के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी क्रांतिकारी 'स्मार्ट पट्टी' तैयार की है, जो शरीर की स्वाभाविक हलचल से ही घावों को तेजी से भरने में मदद करती है.'3D-MIDAS' नाम की यह इलेक्ट्रॉनिक पट्टी पूरी तरह से बैटरी-रहित है. जब कोई व्यक्ति चलता-फिरता या हिलता-डुलता है और यह लचीली पट्टी खिंचती है, तो यह खुद-ब-खुद इलेक्ट्रिकल सिग्नल (विद्युत संकेत) पैदा करने लगती है. यानी इसे चार्ज करने के लिए न तो किसी बाहरी बैटरी की जरूरत है, न ही तारों या किसी पावर सोर्स की.
घाव भरने में कैसे मददगार है यह तकनीक?
जब त्वचा पर कोई चोट या घाव लगता है, तो कोशिकाओं (Cells) को ठीक करने वाले शरीर के प्राकृतिक विद्युत संकेत बाधित हो जाते हैं. यह नई पट्टी जख्म को सुरक्षित ढकने के साथ-साथ वही कुदरती सिग्नल दोबारा पैदा करने का काम करती है. इसमें बेहद पतले रेशों (फाइबर्स) और आयन ले जाने वाले पदार्थों का इस्तेमाल किया गया है. इसका जालीदार डिजाइन घाव तक हवा पहुंचने देता है और रिसने वाले द्रव को जमने नहीं देता. यह पट्टी अपनी मूल लंबाई से लगभग 8 गुना तक खिंच सकती है, जिससे यह शरीर के किसी भी अंग की हलचल के साथ आसानी से ढल जाती है.
लैब, कोशिकाओं और चूहों पर सफल परीक्षण
शोधकर्ताओं ने लैब के भीतर और जानवरों पर इस तकनीक का कड़ा परीक्षण किया है. पेट्री डिश में किए गए लैब टेस्ट के दौरान इस पट्टी ने सामान्य स्थिति की तुलना में 3 गुना तेजी से कोशिकाओं का विकास और 2.5 गुना तेजी से उनकी मूवमेंट दर्ज की. चूहों पर किए गए परीक्षणों में इस बैंड-ऐड से इलाज किए गए घाव 13 से 15 दिनों के भीतर 90 से 95 फीसदी तक भर गए. वैज्ञानिकों को नई रक्त वाहिकाओं, त्वचा के ऊतकों और कोलेजन का बेहतर विकास देखने को मिला. जब इसे स्वतंत्र रूप से घूमने वाले चूहों के जख्मों पर लगाया गया, तो उनके चलने-फिरने मात्र से यह पट्टी बिना किसी बाहरी बल के लगातार इलेक्ट्रिकल सिग्नल पैदा करती रही.
500 बार खींचने पर भी असरदार, बिना बैटरी दूरदराज के इलाकों में मददगार
यह डिवाइस 500 बार खिंचाव के चक्रों के बाद भी पूरी तरह से स्थिर और असरदार बना रहा. 3 महीने तक चले लंबे परीक्षणों में भी इसके प्रदर्शन में कोई गिरावट नहीं आई. प्रोजेक्ट के प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेसर कौशिक परिदा ने बताया कि उनकी टीम ऐसी तकनीक बनाना चाहती थी जो पारंपरिक इलेक्ट्रिकल पट्टियों की बाहरी पावर सोर्स पर निर्भरता को खत्म कर सके. यह तकनीक भविष्य में दूरदराज के ग्रामीण इलाकों, आपातकालीन चिकित्सा और युद्ध क्षेत्रों में बेहद कारगर साबित हो सकती है, जहां बैटरियां पहुंचाना या चार्जिंग संभव नहीं होता.
यह प्रतिष्ठित शोध-पत्र विश्वप्रसिद्ध साइंस जर्नल 'नैनो एनर्जी' में प्रकाशित हुआ है. इस रिसर्च टीम को भारत सरकार की शीर्ष एजेंसियों ANRF, ICMR, DST और PMRF का सहयोग प्राप्त हुआ है. हालांकि, इसे सामान्य मरीजों के लिए अस्पतालों में उपलब्ध कराने से पहले अभी इंसानों पर इसका क्लिनिकल ट्रायल किया जाना बाकी है.
आजतक एजुकेशन डेस्क