बिना नोट्स, बिना लैपटॉप... इस IIT प्रोफेसर के 'दिमाग' में ही छपी है पूरी की पूरी फिजिक्स!

यूट्यूब के एक शांत कोने में पिछले 17 सालों से प्रोफेसर बालाकृष्णन के 'क्लासिकल फिजिक्स' के लेक्चर्स पड़े हुए हैं. NPTEL (भारत के नेशनल ओपन कोर्सवेयर प्रोग्राम) के जरिए रिकॉर्ड किए गए इन वीडियोज ने बिना किसी शोर-शराबे के एक साधारण से ब्लैकबोर्ड वाले क्लासरूम को दुनिया भर के छात्रों के लिए 'ग्लोबल क्लासरूम' बना दिया है.

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No notes, just a green board: This IIT Madras professor carried physics in his head No notes, just a green board: This IIT Madras professor carried physics in his head

आजतक एजुकेशन डेस्क

  • नई दिल्ली ,
  • 27 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 3:59 PM IST

आज के दौर में जब ऑनलाइन पढ़ाई का मतलब 3D एनिमेशन, चमचमाते स्मार्ट स्क्रीन, रंग-बिरंगी पीपीटी (PPT) और बड़े-बड़े दावों वाले प्रचार बन चुके हैं, ऐसे समय में क्या आप सोच सकते हैं कि एक प्रोफेसर बिना किसी नोट्स, बिना किसी लैपटॉप और बिना एक भी स्लाइड के दुनिया के सबसे कठिन विषयों में से एक 'फिजिक्स' को ऐसे पढ़ा दे कि सुनने वाला बस देखता ही रह जाए?

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IIT मद्रास के प्रोफेसर वी. बालाकृष्णन (Prof. V Balakrishnan) की यह कहानी उस भ्रांति को जड़ से उखाड़ फेंकती है जो कहती है कि 'बेहतरीन पढ़ाई केवल महंगे सेटअप और हाई-टेक प्लेटफॉर्म्स पर ही संभव है.'

यूट्यूब के एक शांत कोने में पिछले 17 सालों से प्रोफेसर बालाकृष्णन के 'क्लासिकल फिजिक्स' के लेक्चर्स पड़े हुए हैं. NPTEL (भारत के नेशनल ओपन कोर्सवेयर प्रोग्राम) के जरिए रिकॉर्ड किए गए इन वीडियोज ने बिना किसी शोर-शराबे के एक साधारण से ब्लैकबोर्ड वाले क्लासरूम को दुनिया भर के छात्रों के लिए 'ग्लोबल क्लासरूम' बना दिया है.

जब क्लास में चौक और बोर्ड के सिवा कुछ नहीं होता...
प्रोफेसर बालाकृष्णन के लेक्चर 1 (Classical Physics) को देखना आज के दौर में किसी चमत्कार से कम नहीं लगता. वे क्लासरूम में कदम रखते हैं. हाथ में न कोई कागज़ होता है, न कोई नोट्स और न ही लैपटॉप. वे सीधे हरे चॉकबोर्ड की तरफ मुड़ते हैं, हाथ में चौक उठाते हैं और बोलना शुरू करते हैं.

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अगले 50-60 मिनट तक न तो वे एक पल के लिए रुकते हैं, न ही आगे क्या बोलना है यह सोचने के लिए किसी पन्ने को पलटते हैं. एक-एक शब्द और एक-एक कॉन्सेप्ट इतनी तार्किक सटीकता से दूसरे से जुड़ता चला जाता है मानो पूरी की पूरी फिजिक्स उनके दिमाग में ही छपी हुई हो.

'फर्स्ट प्रिंसिपल्स' से फिजिक्स गढ़ने की कला
ज्यादातर शिक्षक या कोचिंग संस्थान छात्रों को सीधे भारी-भरकम समीकरणों और फॉर्मूलों में उलझा देते हैं. लेकिन प्रोफेसर बालाकृष्णन का तरीका बिल्कुल अलग है. वो कभी सीधे फॉर्मूला नहीं लिखाते, बल्कि सवाल पूछते हैं, जैसे आखिर क्लासिकल फिजिक्स क्या समझाने की कोशिश कर रही है?

वो क्लासिकल मैकेनिक्स का दायरा समझाते हैं, इसके पीछे की बुनियादी मान्यताओं (Assumptions) पर बात करते हैं और फिर बताते हैं कि ये नियम दैनिक जीवन में इतने सटीक क्यों बैठते हैं. वे ठीक उस सटीक बिंदु की निशानदेही करते हैं जहां आकर क्लासिकल फिजिक्स के नियम फेल होते हैं और 'क्वांटम मैकेनिक्स' की ज़रूरत पड़ती है.

बिना किसी फालतू शब्दों (Verbal Fillers) के, बिना किसी विजुअल इफेक्ट्स के, एक कॉन्सेप्ट शुरू होता है, पूरा होता है और फिर बहुत ही सहजता से अगला कॉन्सेप्ट सामने आता है.

पश्चिमी देशों के 'पेड कोर्सेज' से भी बेहतर!
यह कोई हवा-हवाई बात नहीं है. दुनिया भर के भौतिक विज्ञानियों और इंजीनियरिंग के छात्रों ने चुपचाप इस सीरीज की खोज की है. एक विदेशी भौतिक विज्ञानी, जिन्होंने NPTEL पर यह पूरा कोर्स खत्म किया, उन्होंने यह स्वीकार किया कि 'हजारों डॉलर देकर पश्चिमी यूनिवर्सिटीज से पढ़े गए पेड कोर्सेज की तुलना में प्रोफेसर बालाकृष्णन के इस फ्री कोर्स में कहीं ज्यादा वैचारिक गहराई है.' दुख की बात बस इतनी है कि कम रिज़ॉल्यूशन में अपलोड होने और बिना किसी चमकदार थंबनेल या एल्गोरिदम के प्रमोशन के कारण, भारत के बाहर की दुनिया को इस अनमोल खजाने की खबर देर से लगी.

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