धर्मपाल सिंह ने अपनी जिंदगी में कभी किसी अदालत की चौखट नहीं लांघी थी. लेकिन साल 2012 के अगस्त महीने में जब दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) स्थित उनकी एक छोटी सी दुकान पर वकीलों और कोर्ट कमिश्नर्स की टीम ने अचानक छापेमारी की, तो उनके पैर तले जमीन खिसक गई.
दुनिया के तीन सबसे बड़े अकादमिक पब्लिशर्स यानी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस और टेलर एंड फ्रांसिस-ने उनके खिलाफ मुकदमा ठोंक दिया था. उन पर आरोप था कॉपीराइट उल्लंघन का और मांग की गई थी 65 लाख रुपये के हर्जाने की.
जेल जाने का खौफ, परिवार का पेट पालने की चिंता और कर्मचारियों की रोजी-रोटी का सवाल... लेकिन इसके बावजूद धर्मपाल ने घुटने टेकने से इनकार कर दिया. यह कहानी सिर्फ एक दुकान बचाने की नहीं, बल्कि भारत में 'सस्ती शिक्षा और ज्ञान के अधिकार' की सबसे बड़ी मिसाल है.
30 पैसे का 'कोर्स पैक' और पब्लिशर्स का 65 लाख का दांव
दिल्ली यूनिवर्सिटी के 'दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स' (DSE) के एक कोने में स्थित है 'रामेश्वरी फोटोकॉपी सर्विस'. इस दुकान की शुरुआत धर्मपाल के पिता ने 1998 में की थी. यूनिवर्सिटी में जब प्रोफेसरों ने अलग-अलग महंगी किताबों से जरूरी चैप्टर्स चुनकर 'कोर्स पैक्स' बनाने का सुझाव दिया, तो यह दुकान छात्रों की लाइफलाइन बन गई.
जिन किताबों की कीमत हजारों रुपये थी, धर्मपाल उनके जरूरी पन्नों का सेट बनाकर महज 30 से 50 पैसे प्रति पेज में छात्रों को उपलब्ध कराते थे. डीएसई में देश भर से गरीब और मध्यमवर्गीय छात्र पढ़ने आते थे. दर्जनों महंगी किताबें खरीदना हर किसी के बस की बात नहीं थी.
लेकिन 2012 में हुई छापेमारी के बाद पब्लिशर्स ने जब दुकान से तीन बोरियों में भरकर स्टडी मैटेरियल सील किया, तो पूरी दुकान ठप हो गई. धर्मपाल याद करते हैं, 'एक हफ्ते तक कोई काम नहीं हुआ. समझ नहीं आ रहा था कि दुकान बचेगी भी या नहीं.'
जब 'फोटोकॉपीवाले' के पीछे ढाल बनकर खड़े हुए DU के छात्र
पब्लिशिंग दिग्गजों को लगा था कि एक छोटा दुकानदार कानूनी दांव-पेच और करोड़ों की कंपनियों के वकीलों के आगे टिक नहीं पाएगा. लेकिन वे छात्रों के आक्रोश का अंदाजा नहीं लगा पाए. दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रों ने खुद को केस में पार्टी (पक्षकार) बनाने की याचिका डाली. उन्होंने एसोसिएशन बनाई, वकील खड़े किए और हर सुनवाई पर धर्मपाल के साथ कोर्ट रूम में मौजूद रहे.
जो धर्मपाल कभी कोर्ट का नाम सुनकर डरते थे, छात्रों और वकीलों के साथ ने उन्हें वह हिम्मत दी कि उन्होंने पब्लिशर्स से आउट-ऑफ-कोर्ट सेटलमेंट (समझौता) करने से साफ मना कर दिया. धर्मपाल का कहना था, 'अगर हम उस दिन दबाव में झुक जाते, तो देश भर के गरीब छात्रों के लिए पढ़ाई करना नामुमकिन हो जाता.'
दिल्ली हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 'शिक्षा व्यापार नहीं है'
चार साल तक चली लंबी कानूनी जंग के बाद 16 सितंबर 2016 को दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस राजीव सहाय एंडलॉ ने पब्लिशर्स की याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया. दिसंबर 2016 में डबल बेंच ने भी इस फैसले पर मुहर लगा दी.
अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में माना कि छात्रों की पढ़ाई के लिए अकादमिक सामग्री की फोटोकॉपी करना कॉपीराइट का उल्लंघन नहीं है. शिक्षा के अधिकार को सिर्फ उन लोगों तक सीमित नहीं रखा जा सकता जो महंगी किताबें खरीदने में सक्षम हैं. इसके बाद वैश्विक पब्लिशर्स को अपना केस वापस लेना पड़ा.
14 साल बाद भी जारी है सफर
मामला खत्म होने के बाद भी धर्मपाल सिंह के जीवन में कोई रातों-रात कॉरपोरेट जैसा बदलाव नहीं आया. आज भी वे उसी रामेश्वरी फोटोकॉपी सर्विस में काउंटर के पीछे बैठते हैं. मशीनें आज भी चल रही हैं और छात्र अपनी रीडिंग लिस्ट लेकर लाइन में खड़े होते हैं. धर्मपाल कहते हैं, 'मैं कोई प्रतीक या हीरो बनने नहीं निकला था. मैं तो बस एक दुकानदार था. लेकिन जब छात्रों और पढ़ाई के हक की बात आई, तो पीछे हटना मुमकिन नहीं था.'
वैष्णवी पराशर