किताबें गायब, पैटर्न बदला... आखिर 10वीं-12वीं के छात्र कैसे न हों डिप्रेशन के शिकार?

संसदीय समिति ने CBSE और NCERT की लापरवाही पर गंभीर सवाल उठाए हैं. नई शिक्षा नीति के तहत बदले सिलेबस के बावजूद नई किताबें उपलब्ध नहीं हैं, जिससे लाखों छात्र तनाव में हैं. शिक्षकों की ट्रेनिंग में भारी गिरावट और फीस स्ट्रक्चर की समस्याओं ने छात्रों की पढ़ाई प्रभावित की है. समिति ने शिक्षा बजट बढ़ाने और फीस माफ करने की सिफारिश की है.

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किताबों की किल्लत से लेकर शिक्षकों की ट्रेनिंग में 97% की गिरावट! जानिए संसद में क्यों घिरी CBSE किताबों की किल्लत से लेकर शिक्षकों की ट्रेनिंग में 97% की गिरावट! जानिए संसद में क्यों घिरी CBSE

आजतक एजुकेशन डेस्क

  • नई दिल्ली ,
  • 13 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 11:26 AM IST

नया सिलेबस, बदले हुए पैटर्न और एप्लिकेश-बेस्ड सवालों का भारी-भरकम बोझ! ऊपर से पढ़ाई के लिए नई किताबों का अता-पता नहीं... अगर आपका बच्चा भी इस साल CBSE बोर्ड की 10वीं या 12वीं परीक्षा देने जा रहा है और पढ़ाई के तनाव में रात-रात भर जाग रहा है, तो समझ लीजिए कि गलती बच्चे की नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम की है!

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संसद की एस्टिमेट्स कमेटी (प्राकलन समिति) ने लोकसभा में अपनी 10वीं रिपोर्ट (2026-27) पेश करते हुए देश के शिक्षा तंत्र, NCERT और CBSE की भारी लापरवाही पर गंभीर सवाल उठाए हैं. संसदीय समिति ने साफ कहा है कि किताबों की कमी और अचानक बदले गए परीक्षा पैटर्न की वजह से देश के लाखों छात्र भारी तनाव और असमंजस से गुजर रहे हैं.

किताबें गायब, पढ़ाई 'हाई-फाई': NCERT और CBSE में तालमेल गायब!

संसदीय समिति ने पाया कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) और NCF 2023 के तहत कक्षा 9वीं से 12वीं तक का पाठ्यक्रम तो बदल दिया गया, लेकिन NCERT अब तक नई किताबें छापने में ही अटका हुआ है. स्कूलों में बच्चों को पुरानी किताबों के सहारे ही नया और कठिन एप्लिकेशन-बेस्ड सिलेबस पढ़ाया जा रहा है. समिति ने शिक्षा मंत्रालय से कहा है कि इस 'गैप' को तुरंत भरा जाए और बची हुई नई किताबों की छपाई व देशव्यापी डिलीवरी में तेजी लाई जाए.

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शिक्षकों की ट्रेनिंग में 97% की भारी गिरावट!

बोर्ड कह रहा है कि परीक्षा का पैटर्न एप्लिकेशन-बेस्ड (व्यावहारिक) होगा, लेकिन शिक्षकों को इसके लिए ट्रेन ही नहीं किया जा रहा. रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि CBSE शिक्षकों की ऑनलाइन ट्रेनिंग में बहुत बड़ी गिरावट आई है. साल 2022 में जहां 53 लाख से ज्यादा शिक्षकों को ऑनलाइन ट्रेनिंग दी गई थी, वहीं 2025 में यह आंकड़ा घटकर महज 1.62 लाख रह गया!

सरकारी स्कूलों के टीचरों को मुफ्त ट्रेनिंग मिलती है, लेकिन ग्रामीण इलाकों के सस्ते प्राइवेट स्कूलों के टीचरों से ट्रेनिंग के नाम पर फीस और ₹700 प्रति छात्र-शिक्षक अतिरिक्त वसूला जा रहा है. समिति ने इस फीस को तुरंत माफ करने या कम करने की सिफारिश की है.

गरीब बच्चों से भी ₹1600 की फीस, 12वीं तक आते-आते पढ़ाई छोड़ रहे छात्र

संसदीय समिति ने बोर्ड की फीस स्ट्रक्चर और घटते एनरोलमेंट पर भी चिंता जताई है. बोर्ड ने बताया कि साल 2025 में 10वीं बोर्ड के लिए 23.85 लाख छात्रों ने रजिस्ट्रेशन कराया, लेकिन 12वीं तक पहुंचते-पहुंचते यह संख्या घटकर सिर्फ 17.04 लाख रह गई. यानी लाखों बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़ रहे हैं.

गरीबों के लिए कोई छूट नहीं: CBSE सिर्फ दृष्टिबाधित छात्रों को छोड़कर बाकी सभी से 5 सब्जेक्ट्स के ₹1,600 फीस वसूलता है. आर्थिक रूप से कमजोर (EWS) और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए कोई छूट नहीं है. समिति ने EWS वर्ग के बच्चों के लिए बोर्ड फीस माफ करने की सिफारिश की है.

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बजट में 'कंजूसी': NEP का आखिरी साल, पर शिक्षा बजट लक्ष्य से बहुत दूर

नई शिक्षा नीति (NEP 2020) में वादा किया गया था कि देश की जीडीपी का 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च होगा. लेकिन NEP के अंतिम चरण में पहुंचने के बावजूद केंद्र और राज्यों का कुल खर्च जीडीपी का सिर्फ 4.1% ही है. समिति ने सिफारिश की है कि शिक्षा बजट में हर साल कम से कम 10% की अनिवार्य बढ़ोतरी की जाए, ताकि 6% का लक्ष्य हासिल हो सके.

इसके अलावा एक विशेष फंड बनाने की सलाह दी गई है, जिसका बजट वित्त वर्ष खत्म होने पर बेकार (Lapse) न हो और उससे डिजिटल व बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत किया जा सके. बता दें कि जब तक शिक्षा नीतियां सिर्फ कागजों पर बनेंगी और जमीन पर किताबें ही गायब रहेंगी, तब तक 10वीं-12वीं के बच्चों के सिर से 'बोर्ड एग्जाम' का खौफ कभी कम नहीं हो पाएगा!

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