JEE टॉपर, अमेरिका में जॉब, स्वदेश मूवी देखकर लौटे भारत, अब IIT कानपुर में मच्छरों के दिमाग पर कर रहे रिसर्च

कई बार आप उन चीजों के लिए भी मेहनत करते हैं जिन्हें आपको छोड़ने में ज्यादा समय नहीं लगता है. नितिन गुप्ता के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. वह अमेरिका में अपनी ट्रेनिंग छोड़कर वापस आ गए और एक बेहद खास विषय पर रिसर्च शुरू की.

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नितिन के जीवन में स्वदेश जैसी एक घटना घटी, और जैसा कि वे कहते हैं, फिल्म ने ही उन्हें भारत लौटने के लिए प्रेरित किया. (Photo: आईआईटी कानपुर) नितिन के जीवन में स्वदेश जैसी एक घटना घटी, और जैसा कि वे कहते हैं, फिल्म ने ही उन्हें भारत लौटने के लिए प्रेरित किया. (Photo: आईआईटी कानपुर)

आजतक एजुकेशन डेस्क

  • नई दिल्ली ,
  • 28 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 11:13 AM IST

भारत में IIT जैसे बड़े संस्थान से पढ़े लोगों के साथ एक अलग ही भ्रम जुड़ा हुआ है कि वह कहीं भी पहुंच सकते हैं, ISRO के वैज्ञानिक से लेकर किसी स्टार्टअप के संस्थापक तक वह हर फील्ड में अपनी जगह बना सकते हैं लेकिन पहले से ही IIT से निकले हजारों वैज्ञानिक NASA और सिलिकॉन वैली की शीर्ष कंपनियों, जैसे कि ओरेकल, Intel और माइक्रोसॉफ्ट में व्यापक योगदान दे रहे हैं. हालांकि, उनमें से कुछ ही ऐसे हैं जो नितिन गुप्ता (2000 में AIR 1) की तरह करियर चुनने का उत्साह दिखाते हैं. अब सवाल यह है कि आखिर नितिन गुप्ता कौन हैं? तो चलिए जानते हैं उनके बारे में. 

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IIT कानपुर फिर अमेरिका और भारत वापसी 

बता दें कि नितिन गुप्ता ने भारत के प्रमुख आईआईटी संस्थान कानपुर से कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई की है. इसके बाद वह कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सैन डिएगो चले गए. लेकिन वहां पर भी उन्हें संतुष्टि नहीं मिली. अपनी भूख को शांत करने और कुछ नया सीखने के उद्देश्य से वह साल 2014 में भारत वापस आ गए और फिर जिस संस्थान से उन्होंने पढ़ाई की थी उसी में प्रोफेसर के रूप में काम करने लगे. लेकिन उनका काम बेहद खास रहा. उनकी रिसर्च ऐसे विषय पर थी, जिसने कई लोगों को भी हैरान किया. 

मच्छरों के दिमाग पर रिसर्च 

बता दें कि वह आईआईटी कानपुर में मच्छरों के दिमाग का अध्ययन कर रहे हैं, यह समझने की कोशिश कर रहा है कि बिना पहले से सबक सीखे, दिमाग किस बात में अंतर करता है कि क्या पीछा करने लायक है और किससे बचना चाहिए? 

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AIR-1 से IIT कानपुर तक...

नितिन की स्टोरी हर उस युवा को प्रोत्साहित करती है, जो कभी सीखना नहीं छोड़ना चाहते हैं. उनका ये सफर भी बेहद खास रहा है. साल 2000 में  IIT-JEE परीक्षा में वह पहले स्थान पर रहे. इसके बाद से उन्होंने आगे की पढ़ाई के लिए आईआईटी कानपुर में एडमिशन लिया और वहां से कंप्यूटर साइंस की डिग्री हासिल की. डिग्री मिलने के बाद उनके पास करियर के कई विकल्प शामिल थे. टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में जाना, किसी बड़ी कंपनी में काम करना या फिर सिलिकॉन वैली में अपना करियर बनाना. लेकिन उन्होंने इससे अलग रास्ता चुना. 

पढ़ाई के दौरान साइंस की ओर बढ़ी दिलचस्पी

आईआईटी में पढ़ाई के दौरान उनकी रुचि धीरे-धीरे जीव विज्ञान की ओर बढ़ी. इसी रुचि ने उन्हें  कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सैन डिएगो (यूसी सैन डिएगो) तक पहुंचाया. यहां पर उन्होंने 
बायोइन्फॉर्मेटिक्स और सिस्टम बायोलॉजी में पीएचडी की पढ़ाई की, जिसे उन्होंने 2009 में पूरा किया. इस दौरान उनका शोध प्रोटीन और जीनोम के अध्ययन पर केंद्रित था. उनका काम गणना यानी कंप्यूटिंग और जीव विज्ञान के संगम पर आधारित था.

पीएचडी पूरी करने के बाद गुप्ता ने अपने करियर में एक और नया कदम उठाया. उन्होंने यूसी सैन डिएगो की एक संज्ञानात्मक तंत्रिका विज्ञान प्रयोगशाला में कुछ महीने काम किया. यहां पर उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि किसी व्यक्ति को खाना या पैसा पाने की इच्छा होने पर, उस पर कोई कदम उठाने से पहले शरीर में किस तरह के बदलाव होते हैं. 

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उनकी सीखने के इच्छा यहीं पर खत्म नहीं हुई. साल 2010 से 2014 तक उन्होंने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ में पोस्टडॉक्टोरल शोधकर्ता के रूप में काम किया. यहां उन्होंने इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी का अध्ययन शुरू किया. इसमें न्यूरॉन्स यानी मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाओं में होने वाली विद्युत गतिविधियों को समझा जाता है. उस समय कंप्यूटर साइंस से जुड़े लोग भी धीरे-धीरे तंत्रिका विज्ञान के क्षेत्र में काम करने लगे थे. 

स्वदेश फिल्म ने वापस लौटने पर किया मजबूर

भारत लौटने के फैसले के पीछे नितिन गुप्ता ने फिल्म ‘स्वदेश’ का भी जिक्र किया है. उन्होंने बताया कि इस फिल्म ने उन्हें भारत लौटने के बारे में सोचने के लिए प्रेरित किया. 

भारत आने के बाद उनके सामने इंडस्ट्री और रिसर्च, दोनों रास्ते थे. उन्होंने रिसर्च को चुना और IIT कानपुर में अपना काम आगे बढ़ाया. 

उनकी लैब में यह समझने की कोशिश की जाती है कि दिमाग गंध को कैसे पहचानता है और उसके आधार पर किसी जीव के व्यवहार में क्या बदलाव आता है. इसके लिए टिड्डे, मक्खियां और मच्छर जैसे कीड़ों का अध्ययन किया जाता है.

मच्छर से समझने की कोशिश, गंध कैसे बदलती है व्यवहार

मच्छर इस रिसर्च के लिए खास तौर पर उपयोगी है. वह सिर्फ गंध पहचानता नहीं बल्कि उसके आधार पर कुछ सीखता भी है. इंसान के शरीर से कई तरह के रासायनिक संकेत निकलते हैं.  इनमें से कुछ मच्छर को इंसान तक पहुंचने में मदद करते हैं, जबकि कुछ संकेत उसे दूर भी कर सकते हैं. यहीं से गुप्ता की रिसर्च का एक अहम सवाल सामने आता है.

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किसी रसायन या गंध को महसूस करने के बाद मच्छर के शरीर में जो हलचल होती है, उसके पीछे उसका तंत्रिका तंत्र किस तरह काम करता है? गुप्ता की लैब ने मच्छर के दिमाग के एक खास हिस्से एंटेना लोब का अध्ययन किया है. यही वह जगह है जहां गंध से जुड़ी जानकारी को संसाधित किया जाता है. 

2023 में नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित एक शोध पत्र में गुप्ता और उनके सहयोगियों ने एडीस एजिप्टी मच्छर के एंटेना लोब में मौजूद न्यूरॉन्स का अध्ययन किया. उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि ये न्यूरॉन्स अलग-अलग गंधों को किस तरह पहचानते हैं. इसके लिए शोधकर्ताओं ने न्यूरॉन्स की विद्युत गतिविधि का अध्ययन किया और उनके आपसी कनेक्शन को समझने के लिए कई वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल किया.

इनमें इंट्रासेल्युलर इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी, न्यूरॉन्स की संरचना का अध्ययन और इम्यूनोहिस्टोकेमिस्ट्री जैसी तकनीकें शामिल थीं. यहां एक और दिलचस्प बात सामने आती है. अलग-अलग कीड़ों के तंत्रिका कनेक्शन एक जैसे नहीं होते. फिर भी वे अपने आसपास की दुनिया के प्रति भरोसेमंद तरीके से प्रतिक्रिया कर सकते हैं यानी हर जीव के दिमाग का बिल्कुल एक जैसा होना जरूरी नहीं है. 

रिसर्च अब न्यूरॉन्स से आगे बढ़कर शरीर की स्थिति तक

गुप्ता का शोध बाद में न्यूरोमॉड्यूलेशन तक भी पहुंचा. आसान भाषा में समझें तो इसमें यह देखा जाता है कि किसी जीव की अंदरूनी स्थिति उसके गंध को महसूस करने और उस पर प्रतिक्रिया देने के तरीके को कैसे बदलती है. हाल के शोध में इस बात पर भी ध्यान दिया गया है कि इंसान का खून पीने के बाद मादा मच्छर की मानव गंध के प्रति आकर्षण में किस तरह बदलाव आता है. इस तरह आईआईटी कानपुर में कंप्यूटर की पढ़ाई से शुरुआत करने वाला एक छात्र आज अपने कामकाजी जीवन का बड़ा हिस्सा इस सवाल को समझने में लगा रहा है कि इंसान की गंध मच्छर तक पहुंचने के बाद उसके दिमाग के अंदर आखिर क्या होता है. 

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लेकिन गुप्ता की कहानी सिर्फ मच्छरों और तंत्रिका विज्ञान तक सीमित नहीं है. मच्छर के साथ इंसानी दिमाग पर भी काम कर रहे हैं. 

गुप्ता की टीम ने ट्रेडविल नाम के एक ऐसे कार्यक्रम को बनाने में भी मदद की है, जो लोगों को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी मदद देता है. यह खास तौर पर उन लोगों के लिए बनाया गया है, जिनके लिए डॉक्टर या मनोचिकित्सक तक पहुंचना आसान नहीं है. भारत में 598 लोगों पर इस कार्यक्रम का परीक्षण किया गया. इसमें देखा गया कि जिन लोगों ने कार्यक्रम का कम से कम आधा हिस्सा पूरा किया, उनमें इंतजार कर रहे लोगों के मुकाबले चिंता और अवसाद के लक्षण कम हुए. देखने में मच्छर और अवसाद से परेशान इंसान की समस्या बिल्कुल अलग लगती है. लेकिन गुप्ता के काम के पीछे एक सवाल दोनों को जोड़ता है—दिमाग किसी जानकारी को कैसे समझता है और उसके बाद उसके आधार पर क्या करता है?

द प्रिंट के एक विश्लेषण में 2000 से 2019 के बीच आईआईटी-जेईई के 20 टॉपर्स के करियर को देखा गया था, इनमें 12 लोग भारत के बाहर काम कर रहे थे. गुप्ता उन लोगों में थे, जिन्होंने विदेश में काम करने के बाद भारत लौटने का फैसला किया. लेकिन वह भारत किसी तकनीकी कंपनी में काम करने के लिए नहीं लौटे. उन्होंने मस्तिष्क पर रिसर्च करने के लिए आईआईटी कानपुर वापस आने का फैसला किया. 

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