सफलता सिखाई जाती है... पर खुश रहना नहीं, IAS दिव्या मित्तल ने क्यों बोला ऐसा 

क्या आप अपने बच्चे को स्कूल केवल इसलिए भेजते हैं कि वह सफलता की डेफिनेशन सीख सकें? ऐसा ही एक सवाल सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा. IAS दिव्या मित्तल ने सोशल मीडिया पर पोस्ट शेयर किया है जिसके बाद से ये चर्चा तेज हो गई है. उन्होंने लिखा स्कूल में सफलता सिखाई जाती है  लेकिन खुश रहना नहीं. 

Advertisement
IAS दिव्या मित्तल ने स्कूली शिक्षा पर उठाए सवाल. (Photo-x/@divyamittal_IAS) IAS दिव्या मित्तल ने स्कूली शिक्षा पर उठाए सवाल. (Photo-x/@divyamittal_IAS)

आजतक एजुकेशन डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 19 मई 2026,
  • अपडेटेड 11:56 AM IST

क्या खुश रहना बहुत बड़ा गुनाह है? ये सवाल इन दिनों तेजी से वायरल हो रहा है. ऐसा इसलिए क्योंकि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर IIT दिल्ली से बीटेक, IIM बैंगलोर से एमबीए और फिर UPSC की कठिन परीक्षा पास कर आईएएस ऑफिसर बनीं दिव्या मित्तल ने सवाल खड़े किए हैं. उन्होंने पोस्ट में लिखा कि मुझे अपने देश की सर्वश्रेष्ठ शिक्षा प्राप्त हुई. इसने मुझे कठिन परीक्षाओं को पास करना और बड़ी जिम्मेदारियों को संभालना सिखाया लेकिन इसने मुझे कभी भी अपने मन को शांत करना या अकेलेपन से निपटना या खुश रहना नहीं सिखाया. 
  
उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि हम सालों साल यह सीखने में बिता देते हैं कि सफलता कैसे मिले लेकिन स्कूल हमें कभी ये नहीं सिखाता है कि खुश कैसे रहना है. IAS दिव्या मित्तल के मुताबिक, शिक्षा प्रणाली हमें अच्छी प्रोडक्ट तो बना रही है लेकिन संतुलित इंसान नहीं बना पा रही है. 

Advertisement

खुश रहने के लिए एक भी दिन नहीं 

पोस्ट में उन्होंने लिखा कि हम सफलता हासिल करने के तरीके सीखने में कई साल बिता देते हैं लेकिन खुश रहने का तरीका सीखने में एक दिन भी नहीं बिताते. यह सिर्फ एक लाइन नहीं है बल्कि आज की शिक्षा व्यवस्था का एक कड़वा सच है. स्कूल और कॉलेज हमें अच्छे अंक लाना, प्रतियोगी परीक्षाएं पास करना और करियर बनाना तो सिखाते हैं, लेकिन जिंदगी की असली चुनौतियों से लड़ना नहीं सिखाते.

सोशल मीडिया पर इस पोस्ट को लेकर लोगों ने खुलकर अपनी राय रखी. कई यूजर्स का कहना था कि भारत में पढ़ाई का पूरा फोकस नंबर, रैंक और एंट्रेंस एग्जाम पर रहता है जबकि मेंटल हेल्थ, इमोशनल समझ, पैसों की समझ और जीवन स्किल जैसी जरूरी चीजें पीछे छूट जाती हैं. 

Advertisement

बचपन से हमें सिखाया जाता है कि फेल नहीं होना है, पीछे नहीं रहना है लेकिन अगर दिल टूट जाए, उम्मीदें टूट जाएं या जिंदगी में असफलता मिले तो उससे कैसे उबरना है यह कोई नहीं सिखाता. अपने पोस्ट में मित्तल ने खास तौर पर इमोशनल रेगुलेशन की कमी पर बात की. उनका कहना है कि छात्र कठिन से कठिन अकादमिक विषय सीख लेते हैं, लेकिन उन्हें शायद ही कभी यह बताया जाता है कि तनाव, दुख, अकेलापन या असफलता से कैसे निपटा जाए. 

केमिस्ट्री तो पढ़ ली पर दिल नहीं 

अपने इस पोस्ट में उन्होंने आगे लिखा कि स्कूल में पीरियोडिक टेबल तो रट ली, लेकिन किसी ने यह नहीं बताया कि जब दिल टूटता है या मन दुखी होता है तो उस केमिस्ट्री से कैसे डील करना होता है. स्कूल में शांति का मतलब चुप रहना सिखाया जाता है लेकिन असली शांति मन में चल रहे तूफानों से लड़ने में है. 

'ना' कहने की कला 

हम परफेक्ट निबंध लिखना तो जानते हैं लेकिन यह कहना नहीं आता ह कि मुझे दुख हो रहा है. ऑफिस में बॉस की बुलिंग या अपने काम की सीमाओं की रक्षा के लिए ना बोलना नहीं सिखाया जाता है. 

नहीं सिखाई जाती फाइनेंशियल लिटरेसी

Advertisement

स्कूल में मैथ्स तो पढ़या जाता है. X की वैल्यू भी निकालना सिखाई जाती है लेकिन कर्ज के जाल से कैसे खुद को निकाले यह नहीं सिखाया जाता है. 

अकेलेपन से दोस्ती 

स्कूल में मौजूद घंटी और टाइमटेबल के मुताबिक हमें चलाना सिखाया जाता है लेकिन लाइफ में जब कोई देखने वाला नहीं होता है तब हम खुद को भूल जाते हैं. स्कूल में तो हम हमेशा लोगों से घिरे होते हैं लेकिन एडल्ट लाइफ का सन्नाटा से डील करना नहीं सिखाया जाता है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »