80 साल बाद जापान का सबसे बड़ा खुफिया 'गेम', अमेरिका भी कर रहा मदद

चीन, रूस और साइबर हमलों से बढ़ते खतरे के बीच जापान 80 साल बाद अपने खुफिया तंत्र में सबसे बड़ा बदलाव करने जा रहा है. नई इंटेलिजेंस एजेंसी पूरे सिस्टम को एक कमान के अंदर लाकर सुरक्षा मजबूत करेगी.

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दूसरे विश्व युद्ध के बाद अब जापान नई खुफिया एजेंसी बनाने जा रहा है. (Photo: ITG) दूसरे विश्व युद्ध के बाद अब जापान नई खुफिया एजेंसी बनाने जा रहा है. (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 14 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 9:03 AM IST

दूसरे विश्व युद्ध के बाद पहली बार जापान अपने खुफिया सिस्टम में बड़ा बदलाव करने जा रहा है. प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची की सरकार एक नई सेंट्रल इंटिलिजेंस एजेंसी बना रही है. यह एजेंसी देश की अलग-अलग खुफिया एजेंसियों को एक साथ जोड़ने और उनके बीच जानकारी साझा कराने का काम करेगी.

इस नई एजेंसी को तैयार करने में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी जैसे देश सलाह दे रहे हैं. सरकार का कहना है कि चीन, रूस और उत्तर कोरिया से बढ़ते खतरे, साइबर हमलों, जासूसी और फर्जी जानकारी फैलाने जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए यह कदम उठाया जा रहा है.

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अभी जापान में पुलिस, रक्षा मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और दूसरी सरकारी एजेंसियां अलग-अलग तरीके से खुफिया जानकारी जुटाती हैं. लेकिन इनके बीच जानकारी साझा करने का सिस्टम मजबूत नहीं है. ऐसे में कई बार जरूरी जानकारी समय पर एक-दूसरे तक नहीं पहुंच पाती. 

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नई एजेंसी इसी कमी को दूर करेगी. इसका काम अलग-अलग विभागों से मिलने वाली जानकारी को एक जगह लाना, उसका विश्लेषण करना और जरूरत के हिसाब से संबंधित एजेंसियों तक पहुंचाना होगा.

पिछले कुछ सालों में जापान अपनी सुरक्षा व्यवस्था को लगातार मजबूत कर रहा है. सरकार का मानना है कि आज सिर्फ सेना मजबूत होना काफी नहीं है. साइबर सुरक्षा, विदेशी जासूसी और संवेदनशील तकनीक की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी हो गई है। इसी वजह से यह नया इंटेलिजेंस सिस्टम तैयार किया जा रहा है.

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अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी से मिल रही है मदद

अमेरिका जापान को साइबर सुरक्षा मजबूत करने, तकनीक की चोरी रोकने और विदेशी एजेंटों पर नजर रखने के तरीके बता रहा है. ऑस्ट्रेलिया अलग-अलग मंत्रालयों के बीच बेहतर तालमेल बनाने और नई तकनीक के इस्तेमाल पर सलाह दे रहा है. वहीं जर्मनी की विदेशी खुफिया एजेंसी BND के प्रमुख भी हाल ही में टोक्यो गए थे. वहां दोनों देशों के बीच इंटेलिजेंस सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई.

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नई एजेंसी की जरूरत क्यों पड़ी?

एक्सपर्ट्स का कहना है कि जापान का मौजूदा इंटेलिजेंस सिस्टम कई हिस्सों में बंटा हुआ है. अलग-अलग विभाग अपनी-अपनी जानकारी जुटाते हैं, लेकिन सभी के बीच तालमेल अच्छा नहीं है. हाल के वर्षों में चीन, रूस और उत्तर कोरिया से जुड़े सुरक्षा खतरे बढ़े हैं. इसके अलावा साइबर हमले, तकनीक की चोरी और विदेशी दखल को लेकर भी जापान की चिंता बढ़ी है.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि चीन से जुड़े कुछ नेटवर्क जापानी भाषा में ऐसे प्लेटफॉर्म चला चुके हैं, जिनके जरिए चीन के पक्ष में जानकारी फैलाने की कोशिश की गई. इन घटनाओं के बाद जापान ने अपना इंटेलिजेंस सिस्टम और मजबूत करने का फैसला लिया है.

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नई एजेंसी क्या काम करेगी?

नई एजेंसी का शुरुआती बजट करीब 407 मिलियन डॉलर यानी लगभग 3,500 करोड़ रुपये रखा गया है. शुरुआत में इसमें सैकड़ों अधिकारी और एक्सपर्ट काम करेंगे. इनमें सॉफ्टवेयर इंजीनियर, साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट और विदेशी मामलों के जानकार शामिल होंगे.

यह एजेंसी जापान सरकार के अलग-अलग विभागों में इंटेलिजेंस से जुड़े करीब 33 हजार अधिकारियों के बीच तालमेल बनाएगी. इसके साथ प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक अलग इंटिलिजेंस काउन्सिल भी बनाया जाएगा. यह बड़े सुरक्षा मामलों में फैसले लेने में मदद करेगा.

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नई एजेंसी को लेकर विरोध भी

नई एजेंसी को लेकर जापान में बहस भी शुरू हो गई है. विपक्ष के कुछ नेताओं और सामाजिक संगठनों का कहना है कि इससे लोगों की निजता पर असर पड़ सकता है और सरकार की निगरानी बढ़ सकती है. वहीं सरकार का कहना है कि इस एजेंसी का मकसद आम लोगों पर नजर रखना नहीं, बल्कि जासूसी, साइबर हमलों और विदेशी दखल जैसी चुनौतियों से देश की सुरक्षा मजबूत करना है.

एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर नई एजेंसी अलग-अलग विभागों के बीच बेहतर तालमेल बना पाती है और नई तकनीक का सही इस्तेमाल करती है, तो जापान का सुरक्षा तंत्र पहले से ज्यादा मजबूत हो सकता है. हालांकि इसके साथ यह भी जरूरी होगा कि लोगों की निजता और अधिकारों का भी पूरा ध्यान रखा जाए.

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