बिहार के एक स्कूल में एक महिला की रहस्यमयी मौत और पांच साल तक दबा रहा उस मौत का ऐसा सच, जिसने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए. पांच साल पहले ही पुलिस ने इस मामले को आत्महत्या मानकर केस बंद कर दिया था, लेकिन तीन बेटियों ने हार नहीं मानी. उनकी जिद गुहार बनकर आखिरकार पटना हाईकोर्ट तक जा पहुंची और फिर अदालत ने ऐसा ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जो शायद ही पहले कभी किसी मामले में दिया गया हो. अदालत ने सीधे एक IPS अफसर का नाम लेकर जांच की जिम्मेदारी उसे सौंपी. इसके बाद जो सच सामने आया, उसने मौत की पूरी कहानी ही बदल डाली.
8 अप्रैल 2026, पटना हाईकोर्ट
ये वो तारीख़ थी, जब पटना हाईकोर्ट ने मौत की एक पहेली को सुलझाने के एक केस में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था. ऐतिहासिक इसलिए कि अमूमन ऐसे मामलों में अदालतें जांच कमेटी, एसआईटी, न्यायिक आयोग, सीआईडी, सीबीआई से जांच कराने का हुक्म देती है. लेकिन ये पहली बार था, जब पटना हाईकोर्ट बाकायदा एक आईपीएस अफसर का नाम लेती है और कहती है कि मौत की इस पहेली को सुलझाने की जिम्मेदारी उसी आईपीएस अफसर को दी जाए. इतना ही नहीं हाईकोर्ट ये भी आदेश देती है कि जांच के लिए वो आईपीएस अफसर खुद एक एसआईटी यानि स्पेशल इन्वेस्टिगेटिव टीम बनाएंगे और उस टीम के सदस्यों को भी ख़ुद चुनेंगे. पटना हाईकोर्ट ने जिन आईपीएस अफसर का नाम लेकर उन्हें जांच की जिम्मेदारी सौंपी वो ये हैं- बिहार के मगध रेंज के IG यानि इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस विकास वैभव.
तो पटना हाईकोर्ट के ऐतिहासिक फैसले की जानकारी तो आपको मिल गई. अब सवाल ये है कि आखिर मौत की वो पहेली है क्या? किसकी मौत हुई? कहां हुई है? और लोकल थाने या आईओ को छोड़कर हाईकोर्ट एक आईपीएस को ही इस पहेली को सुलझाने के लिए क्यों कह रही है? तो चलिए पटना हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब उस जगह पर चलते हैं, जहां से इस पहेली की शुरुआत हुई थी.
8 अप्रैल 2026 को पटना हाईकोर्ट ने ऑर्डर दिया और उसके ठीक 5 दिन बाद 13 अप्रैल को आईजी विकास वैभव अपनी अपनी नई नवेली एसआईटी टीम के साथ बेगूसराय के एक स्कूल में पहुंचे- कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय. यही नाम है उस स्कूल का. 5 साल पहले उसी स्कूल की वॉर्डन रिंकू कुमारी की एक क्लासरूम में मौत हो गई थी. गले में फंदा था और एक सिरा पंखे से बंधा था. पुलिस ने मामले की जांच की. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट देखी और इस केस को सुसाइड बताकर अदालत में क्लोज़र रिपोर्ट भी दाखिल कर दी.
अब चूंकि रिंकू की मौत की कहानी उसी स्कूल से शुरु हुई तो एसआईटी की जांच भी यहीं से शुरु होती है. बाकायदा फ़ॉरेंसिक टीम के साथ एसआईटी स्कूल पहुंचती है. रिंकू की तीन बेटियों में से दो बेटी भी एसआईटी के साथ वहां मौजूद थीं. तो एसआईटी की टीम ने अपनी जांच शुरु कर दी. पर सवाल ये है कि 5 साल पुराने क्राइम सीन से एसआईटी को नए सबूत कहां से मिलेंगे? और उससे भी बड़ा सवाल ये कि 5 साल तक इस स्कूल की वॉर्डन रिंकू की मौत की पहेली, पहेली ही क्यों बनकर रह गई? जो काम लोकल पुलिस का था उसे एसआईटी को क्यों करना पड़ रहा है?
आख़िर मामला एक आम मौत का ही तो है, तो इन सवालों के जवाब जानने से पहले आपको इन तीन लड़कियों को जानना ज़रूरी है. ये हैं तेजस्वनी, चेतना और लूसी. ये तीनों कोई और नहीं, बल्कि वॉर्डन रिंकू कुमारी की तीन बेटियां हैं. इनकी पूरी दुनिया बस इनकी मां थी क्योंकि पिता हैं नहीं. यही वो तीन बेटियां हैं, जो बीते 5 सालो से सिर्फ एक ज़िद पकड़े हुए थीं और वो ये कि उनकी मां कभी ख़ुदकुशी कर ही नहीं सकती. ना वो इतनी कमज़ोर थीं और ना ही वो अपनी तीन बेटियों को यूं अनाथ छोड़कर जा सकती थीं. असल में ये इन्हीं तीन बेटियों की कहानी है. कहानी इनके हौसलों की. कहानी इनके जज़्बे की. कहानी हार ना मानने की और कहानी पूरी सिस्टम से लड़ जाने की.
4 अप्रैल 2021
ये वो वक्त था, जब पूरे देश में कोरोना फैला हुआ था. दो गज़ की दूरी थी और देश के साथ-साथ स्कूल भी बंद थे. पर रिंकू स्कूल की वॉर्डन थी. इसलिए वो उस दिन स्कूल पहुंची. उसी दिन दोपहर एक बजे स्कूल के एक क्लासरूम में रिंकू की लाश पंखे से झूलती मिली थी. लोकल पुलिस ने पहले दिन से ही केस का ख़ून कर डाला था. जांच की नहीं, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भी आधी अधूरी थी. जिसमें बस इतना लिखा था कि सांस रुकने से उनकी मौत हुई है.
शुरु में तो पुलिस ने मौका-ए-वारदात पर फ़ॉरेंसिक टीम भी नहीं बुलाई. बाद में बुलाई भी तो उनकी सलाह ही नहीं मानी. शायद पुलिस ठान चुकी थी कि वो रिंकू की वही मौत दिखाना चाहती है, जो उसे पसंद है. हैरत की बात ये थी कि 4 अप्रैल 2026 को, जिस दिन रिंकू की मौत हुई उस दिन स्कूल का सीसीटीवी कैमरा कुल डेढ़ घंटे के लिए ठीक उसी समय ख़राब हुआ, जब ये सारी चीज़ें हुईं. डेढ़ घंटे बाद हैरतअंगेज़ तौर पर सीसीटीवी कैमरा अपने आप ठीक भी हो गया. लेकिन इस हैरत या चमत्कार पर लोकल पुलिस ने ज़रा सा भी ध्यान नहीं दिया. वरना क्या पता शायद उसी दिन मौत की ये पहेली सुलझ जाती.
खैर, तीनों बेटियों की बार-बार की गुहार के बावजूद लोकल पुलिस ने रिंकू की मौत को ख़ुदकुशी बताकर केस बंद कर दिया. बाकायदा कोर्ट में क्लोज़र रिपोर्ट भी दाखिल कर दी. लगा अब सब कुछ ख़त्म हो गया. लेकिन तब नई-नई कॉलेज में पहुंची रिंकू की दोनों बड़ी बेटियां तेजस्वनी और चेतना ने अपनी छोटी बहन लूसी के साथ मिलकर ये तय किया कि वो अपनी मां की मौत का सच ज़माने के सामने लाकर रहेंगी. इसी के बाद उनकी जद्दोजहद शुरु होती है. एक तरफ ग्रेजुएशन की पढ़ाई और दूसरी तरफ इंसाफ की लड़ाई. तीनों बहनों ने बिहार पुलिस का शायद ही कोई ऐसा अफसर हो, जिसके दर पर हाज़िरी ना लगाई हो. मगर हर तरफ से नाउम्मीदी ही हाथ लगी.
पुलिस से मायूस होकर एक वक्त ऐसा भी आया जब तीनों बहने बेगूसराय लोअर कोर्ट पहुंची. पर कमाल देखिए एक भी सुनवाई किए बस तारीख़ पर तारीख़ देते हुए बिना तीनों बहनों को सुने निचली अदालत ने भी ये मान लिया कि पुलिस की जांच सही थी और उनकी मां रिंकू ने ख़ुदकुशी ही की है. पहले पुलिस फिर निचली अदालत का फ़ैसला किसी की भी हिम्मत तोड़कर रख देता. और वे तो बच्चियां थी. पर उन तीनों बहनों ने हार नहीं मानी. निचली अदालत से मायूस होने के बाद तीनों बहनों ने बिहार की सबसे बड़ी अदालत का रुख किया. यानि पटना हाईकोर्ट.
पांच साल से अपनी मां की मौत से जु़ड़े जो दस्तावेज़ उन तीनों बेटियों ने संभाल रखे थे, उन्हें देखते ही हाईकोर्ट को पहली नज़र में ही लग जाता है कि कुछ तो गड़बड़ है. फिर पूरे 5 साल की जद्दोजहद के बाद इस साल 8 अप्रैल को पहली बार तीनों बहनों को इंसाफ की लौ नज़र आई. हाईकोर्ट के आदेश के बाद आईजी विकास वैभव की अगुवाई में 13 जुलाई को जांच शुरु हुई. और सिर्फ 15 दिन के अंदर एसआईटी ने उस पहेली को सुलझा दिया, जो बीते 5 सालों से अनसुलझी थी.
रिंकू की मौत को पहेली बनाने वालों में पुलिस के साथ-साथ वो डॉक्टर भी शामिल था, जिसने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट तैयार की थी. एसआईटी ने उस डॉक्टर से भी पूछताछ की. फिर बाकायदा एक मेडिकल बोर्ड से राय ली गई. अब रिंकू की मौत का बाकी का सच जानने के लिए एसआईटी ने एक-एक कर सारे चश्मदीदों से पूछताछ की. उस दिन कौन-कौन स्कूल आया था? कब गया? सारी जानकारी इकट्ठा की गई.
अब तस्वीर साफ हो चुकी थी और कहानी सामने आ चुकी थी. वही कहानी जो बीते 5 सालों से रिंकू की तीनों बेटियां कह-कह कर थक चुकी थीं. कहानी पूरी कुछ यूं थी. रिंकू ने इलाके के एक शख्स कौशल को 15 लाख रुपये दिए थे, वो पैसे लौटा नहीं रहा था. फिर मामला पंचायत तक गया. तय ये हुआ कि 4 अप्रैल 2021 को दोपहर एक बजे कौशल पंचायत के सामने 15 लाख रुपये रिंकू को लौटाएगा. लेकिन उस दिन 1 बजे पैसे तो नहीं मिले पर रिंकू की मौत की ख़बर ज़रूर आ गई.
रिंकू के कत्ल के इल्जाम में कौशल के अलावा जिस दूसरे शख्स अजीत कुमार उर्फ बबलू को गिरफ्तार किया गया है, वो उसी स्कूल का केयर टेकर है. 4 अप्रैल 2021 को जब रिंकू स्कूल पहुंची थी, उसके कुछ देर बाद ही बबलू ने सीसीटीवी कैमरा बंद कर दिया था. उसी के बाद स्कूल के पिछले रास्ते से कौशल अदंर आया. फिर दोनों मिलकर एक कमरे में रिंकू की गला घोंट कर हत्या कर दी. अब बारी थी साजिश को अंजाम तक पहुंचाने की, तो दोनों ने इस कत्ल की वारदात को खुदकुशी का रंग देना का काम किया. उन्होंने मुर्दा रिंकू के गले में फंदा डालकर उसे पंखे से लटका दिया था. अब 5 साल लंबे इंतजार के बाद तीनों बहनों को इंसाफ मिला है, जिसके लिए उन तीनों ने पहली बार पुलिस का शुक्रिया किया.
(बेगुसराय से सौरभ कुमार का इनपुट)
aajtak.in