43 साल पुराने गैंग रेप केस में 3 आरोपी बरी, हाईकोर्ट ने कहा- अभियोजन नहीं दे सका पुख्ता सबूत

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फतेहपुर के 43 साल पुराने सामूहिक दुष्कर्म मामले में तीन आरोपियों को बरी कर दिया. कोर्ट ने गवाहों के बयानों में विरोधाभास और FIR में देरी समेत सबूतों का आकलन करने के बाद ये फैसला किया. पढ़ें पूरी कहानी.

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इस मामले में पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठे हैं (फोटो-ITG) इस मामले में पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठे हैं (फोटो-ITG)

आनंद राज

  • प्रयागराज,
  • 21 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 11:50 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने करीब 43 साल पुराने सामूहिक दुष्कर्म मामले में तीन आरोपियों की दोषसिद्धि निरस्त करते हुए उन्हें बरी कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि यौन अपराध के मामलों में पीड़िता की गवाही को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता और परिस्थितियों के अनुरूप होने का आकलन किए बिना उसे अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता. 

न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद की पीठ ने फतेहपुर के इस मामले में अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों में गंभीर विरोधाभास पाए. प्राथमिकी दर्ज कराने में छह दिन की देरी और गवाहों के बयानों में महत्वपूर्ण विसंगतियां भी सामने आईं. कोर्ट ने माना कि इन परिस्थितियों में अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा.

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मामला 17 अक्टूबर 1983 की रात का है, जब उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के बिंदकी क्षेत्र में दो महिलाओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म किए जाने का आरोप लगाया गया था. दोनों महिलाओं में से एक दूसरी की भाभी थी, जबकि दूसरी उसकी ननद थी. आरोप के मुताबिक, चार नामजद आरोपी दो अन्य लोगों के साथ उनके घर में घुसे थे. उन्होंने तमंचा दिखाकर परिवार के सदस्यों को धमकाया और इसके बाद वारदात को अंजाम दिया. घटना के छह दिन बाद, 23 अक्टूबर 1983 को इस मामले में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी.

इस मामले में निचली अदालत ने 22 अप्रैल 1985 को आरोपियों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी. इसके बाद दोषसिद्धि के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की गई. अपील पर सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने अभियोजन की कहानी और उसके समर्थन में पेश किए गए साक्ष्यों पर सवाल उठाए. बचाव पक्ष का कहना था कि प्राथमिकी दर्ज कराने में हुई देरी का संतोषजनक कारण नहीं बताया गया. 

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इसके अलावा, दोनों पीड़िताओं के बयानों में विरोधाभास होने और घटना के समय पहने गए कपड़े पुलिस को नहीं सौंपे जाने का मुद्दा भी उठाया गया. आरोपियों ने यह दावा भी किया कि पुरानी रंजिश के कारण उन्हें झूठे मामले में फंसाया गया था.

हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए पाया कि शुरुआती शिकायत में दो अन्य कथित आरोपियों के नाम का उल्लेख नहीं था, जबकि बाद में उनकी भूमिका बताई गई. मामले के विवेचक ने भी अपनी गवाही में कहा कि पहली पीड़िता ने पूछताछ के दौरान उन दोनों के नाम नहीं बताए थे. अदालत के मुताबिक, दोनों पीड़िताओं के बयानों में घटना के क्रम, आरोपियों की भूमिका और परिवार के सदस्यों को किस तरह रोका गया, इस बारे में भी महत्वपूर्ण विसंगतियां थीं. 

इसके साथ ही, घटना के समय पहने गए कपड़े भी पुलिस को उपलब्ध नहीं कराए गए थे. कोर्ट ने इन सभी तथ्यों को अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों की विश्वसनीयता के आकलन में महत्वपूर्ण माना.

मामले में दोनों महिलाओं का चिकित्सकीय परीक्षण भी कराया गया था. परीक्षण के दौरान उनके शरीर पर कोई ताजा बाहरी या आंतरिक चोट नहीं मिली थी. हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल चोट नहीं मिलने या चिकित्सकीय साक्ष्यों से आरोपों की पुष्टि नहीं होने के आधार पर यौन अपराध के आरोप को खारिज नहीं किया जा सकता. इसी तरह, प्राथमिकी दर्ज कराने में देरी भी अपने आप में अभियोजन के मामले को समाप्त करने का आधार नहीं है. 

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लेकिन इस मामले में देरी का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया था और अन्य साक्ष्यों में भी गंभीर विरोधाभास थे. ऐसे में अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष की कहानी संदेह से परे साबित नहीं हो सकी.

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यदि यौन अपराध के मामले में पीड़िता की गवाही विश्वसनीय और भरोसेमंद है, तो केवल उसके बयान के आधार पर भी दोषसिद्धि की जा सकती है. इसके लिए हर मामले में किसी अतिरिक्त गवाह या स्वतंत्र पुष्टि का होना अनिवार्य नहीं है. लेकिन जब मुख्य गवाहों के बयानों में ऐसे विरोधाभास सामने आएं, जो अभियोजन की मूल कहानी को प्रभावित करते हों, तो सभी साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन करना जरूरी है. 

अदालत के मुताबिक, इस मामले में सामने आई विसंगतियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था. इन्हीं आधारों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सिराजुल, छोटेलाल और फक्कू की अपील स्वीकार करते हुए उनकी दोषसिद्धि निरस्त कर दी और उन्हें बरी कर दिया. 

इस मामले के मुख्य आरोपी मोहम्मद अनीस खान की अपील उसकी मृत्यु के कारण पहले ही समाप्त हो चुकी थी. अदालत के अनुसार, उसकी अपील 16 मार्च 2026 को समाप्त कर दी गई थी. इस तरह, 1983 की घटना से जुड़े इस पुराने मामले में हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का मूल्यांकन करने के बाद तीन आरोपियों को राहत दी.

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