चेक बाउंस केस: समय रहते कर लें सेटलमेंट, जितनी करेंगे देरी उतना बड़ा होगा नुकसान

चेक बाउंस मामलों में समझौता करने में देरी महंगी पड़ सकती है. क्योंकि केस जितना आगे बढ़ेगा, समझौते की कीमत उतनी बढ़ेगी. सेशंस कोर्ट या हाई कोर्ट में समझौता होने पर चेक राशि का 7.5% और सुप्रीम कोर्ट में 10% तक अतिरिक्त खर्च देना पड़ सकता है.

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चेक बाउंस के मामलों को जल्द निपटा लें वरना मुकदमा आगे बढ़ने के साथ सेटलमेंट भी महंगा होता जाएगा. (सांकेतिक तस्वीर) चेक बाउंस के मामलों को जल्द निपटा लें वरना मुकदमा आगे बढ़ने के साथ सेटलमेंट भी महंगा होता जाएगा. (सांकेतिक तस्वीर)

आजतक बिजनेस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 06 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 12:54 PM IST

अगर आप चेक बाउंस का केस लड़ रहे हैं और आपके पास इसे सेटल करने का विकल्प है, तो इसमें देरी करन महंगा पड़ सकता है. चेक बाउंस के मामले में समझौता समय पर नहीं होता और केस ऊपरी अदालतों तक पहुंच जाता है, तो आरोपी को चेक की मूल राशि के अलावा अतिरिक्त खर्च भी देना पड़ सकता है. मामला अगर सेशंस कोर्ट या हाई कोर्ट तक पहुंचने के बाद सुलझता है तो चेक राशि का 7.5 फीसदी, जबकि सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने के बाद समझौता होने पर 10 फीसदी तक अतिरिक्त राशि देनी पड़ सकती है.

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पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने 3 अगस्त को दिए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए इसी सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि इसका उद्देश्य पक्षकारों को शुरुआती चरण में ही विवाद सुलझाने के लिए प्रोत्साहित करना है, ताकि चेक बाउंस के मामले वर्षों तक अदालतों में लंबित न रहें. ऐसे मामलों की सुनवाई नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 के तहत होती है.

किस चरण में कितना अतिरिक्त खर्च?

पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का उल्लेख करते हुए बताया कि यदि बचाव पक्ष के बयान और साक्ष्य (Defence Evidence) रिकॉर्ड में दर्ज होने से पहले ही समझौता हो जाता है, तो ट्रायल कोर्ट बिना किसी अतिरिक्त खर्च के मामले का निपटारा कर सकती है. यदि बचाव पक्ष के बयान और साक्ष्य रिकॉर्ड में दर्ज होने के बाद लेकिन फैसला आने से पहले समझौता होता है, तो चेक राशि का 5 फीसदी अतिरिक्त खर्च देना पड़ सकता है. वहीं, मामला अपील या रिवीजन के दौरान सेशंस कोर्ट या हाई कोर्ट में सुलझने पर यह बढ़कर 7.5 फीसदी हो सकता है. यदि समझौता सुप्रीम कोर्ट में होता है, तो अतिरिक्त खर्च 10 फीसदी तक हो सकता है.

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₹10 लाख के चेक पर कितना असर?

उदाहरण के तौर पर यदि चेक की राशि 10 लाख रुपये है और समझौता सेशंस कोर्ट या हाई कोर्ट में होता है, तो 75 हजार रुपये अतिरिक्त देने पड़ सकते हैं. वहीं, सुप्रीम कोर्ट में समझौता होने पर यह राशि 1 लाख रुपये तक पहुंच सकती है. यह रकम मूल चेक राशि के अतिरिक्त होगी. यानी आपको सेटलमेंट में ₹10 लाख की जगह ₹11 लाख तक देने पड़ सकते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों बनाया यह नियम?

सुप्रीम कोर्ट ने चेक बाउंस मामलों में समय रहते समझौते को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 2010 में दामोदर एस. प्रभु vs सैयद बाबालाल एच. मामले में ग्रेडेड कॉस्ट (Graded Cost) का सिद्धांत तय किया था. बाद में 2025 के संजाबीज तारी vs किशोर एस. बोरकर फैसले में अदालत ने इन अतिरिक्त खर्चों की समीक्षा करते हुए अलग-अलग चरणों के लिए संशोधित व्यवस्था लागू की.

ताजा मामले में क्या हुआ?

सोनीपत निवासी सुभाष चंदर को मार्च 2019 में दो चेक बाउंस मामलों में दोषी ठहराया गया था. शिकायतकर्ता सुनील कुमार थे. अदालत ने उन्हें डेढ़ वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी. साथ ही एक मामले में 5.10 लाख रुपये और दूसरे में 1.55 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया गया था. बाद में अतिरिक्त सेशंस जज ने उनकी अपील भी खारिज कर दी. इसके बाद मामला पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट पहुंचा.

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रिवीजन याचिका लंबित रहने के दौरान 22 मई 2026 को सोनीपत के मेडिएशन एंड कंसिलिएशन सेंटर में दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया. शिकायतकर्ता ने भी अदालत में समझौते की पुष्टि की, जिसके बाद हाई कोर्ट ने दोषसिद्धि, सजा और सेशंस कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए मामले का निपटारा कर दिया. हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चेक बाउंस के मामलों में समझौता मुकदमे के किसी भी चरण में किया जा सकता है. इसमें ट्रायल कोर्ट में दोषसिद्धि या सेशंस कोर्ट में अपील खारिज होने के बाद का चरण भी शामिल है.

क्या अतिरिक्त खर्च माफ हो सकता है?

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अतिरिक्त खर्च हर मामले में अनिवार्य नहीं है. यदि किसी मामले में असाधारण और विशेष परिस्थितियां हों, तो अदालत कारण दर्ज करते हुए इस अतिरिक्त खर्च को कम या पूरी तरह माफ भी कर सकती है. सुभाष चंदर के मामले में हाई कोर्ट ने अतिरिक्त खर्च नहीं लगाया, क्योंकि अदालत के अनुसार वह वर्ष 2014 से लगातार आपराधिक मुकदमेबाजी का सामना कर रहे थे और मामले की परिस्थितियां विशेष थीं.

पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि चेक बाउंस मामलों में समय रहते समझौता करना न केवल कानूनी प्रक्रिया को छोटा करता है, बल्कि अतिरिक्त आर्थिक बोझ से भी बचा सकता है. वहीं, यदि समझौता बाद के चरणों में होता है तो अदालत द्वारा तय ग्रेडेड कॉस्ट का सामना करना पड़ सकता है.

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