बिजनेस टुडे के 'इंडिया एट 100' इवेंट में इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव एस. कृष्णन ने सोशल मीडिया के प्रभावों और सरकारी नियमों पर विस्तार से बात की.
हाल ही में, मेटा के फेसबुक, इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के उपयोगकर्ताओं पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं. हालांकि, एस. कृष्णन का कहना है कि ये चिंताएं और आशंकाएं केवल भारत तक सीमित नहीं हैं, उन्होंने जोर देकर कहा कि "दुनिया का हर बड़ा लोकतंत्र" इस तरह की समान चुनौतियों का सामना कर रहा है.
कृष्णन ने उन्होंने कहा, "यूरोपीय संघ (EU) के साथ हमारी कुछ बातचीत के दौरान, वे भारत के मौजूदा कानूनी ढांचे से काफी प्रभावित दिखे, उन्होंने यह भी जोड़ा कि सरकार अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने के तरीके को लेकर "बेहद विचारशील" रही है.
ऑनलाइन कंटेंट को ब्लॉक करने पर कृष्णन ने कहा कि सरकार के आदेश से कंटेंट हटाया जाना कुल टेकडाउन का केवल एक हिस्सा है, क्योंकि अधिकांश कंटेंट प्लेटफॉर्म्स द्वारा खुद ही हटाया जाता है जब वे तय करते हैं कि वह सामग्री उनके नियमों का उल्लंघन करती है. उन्होंने कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A के तहत उपलब्ध शक्ति का उपयोग केवल विशिष्ट परिस्थितियों में ही किया जाता है. यह धारा सरकार को चार व्यापक आधारों पर कंटेंट ब्लॉक करने की अनुमति देती है, राज्य की सुरक्षा, भारत की रक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध.
उन्होंने आगे कहा, "इसका उपयोग बहुत ही संयम के साथ, बहुत कम किया जाता है. यह सिर्फ मेरा नजरिया नहीं हो सकता कि कोई चीज़ अश्लील है, मुझे यह साबित करना होगा कि वह इन चार आधारों में से ही किसी एक के तहत आती है, 99% कंटेंट प्लेटफॉर्म्स के अपने नियमों के तहत हटाया जाता है.'
कृष्णन ने बताया कि ज्यादातर टेकडाउन अनुरोध और कंटेंट हटाने की कार्रवाई सीधे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स द्वारा ही की जाती है. उन्होंने कहा, "वास्तव में 99% या उससे भी अधिक टेकडाउन विभिन्न सोशल मीडिया कंपनियों की अपनी 'कम्युनिटी गाइडलाइन्स' के आधार पर होते हैं."
गैर-कानूनी कंटेंट को चिह्नित करने पर क्या होता है?
भारत के कानूनी ढांचे के तहत, कृष्णन ने स्पष्ट किया कि जब किसी कंटेंट के भारतीय कानून का उल्लंघन करने की आशंका होती है, तो अधिकृत सरकारी एजेंसी या अधिकारी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को नोटिस भेज सकते हैं. उन्होंने यह भी बताया कि सरकार किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को यह नोटिस भेज सकती है कि कंटेंट पोस्ट करने वाले व्यक्ति को आपराधिक मामलों का सामना करना पड़ सकता है. इसके अलावा, यदि प्लेटफॉर्म उस कंटेंट पर कार्रवाई नहीं करता है, तो उसे स्वयं भी कानूनी परिणामों का सामना करना पड़ सकता है.
कृष्णन ने आईटी अधिनियम की धारा 79 का भी जिक्र किया, जो मध्यस्थों को तीसरे पक्ष के कंटेंट के दायित्व से 'सेफ-हार्बर' प्रदान करती है. इसलिए, यह प्लेटफॉर्म पर निर्भर करता है कि वह कंटेंट को हटाए या लागू कानून के तहत संभावित कानूनी कार्रवाई का सामना करे.
कृष्णन ने तर्क दिया कि ग्लोबल सोशल मीडिया कंपनियां भारत जैसे विविध देश से निपटते समय पूरी तरह से एक यूनिवर्सल कंटेंट-मॉडरेशन सिस्टम पर निर्भर नहीं रह सकतीं. प्लेटफॉर्म्स को भारत के सांस्कृतिक और भाषाई संदर्भ को समझने की आवश्यकता है, खासकर जब कंटेंट में हिंसा, यौन उत्पीड़न या नुकसान के अन्य रूप शामिल हों, जो केवल दृश्य मूल्यांकन से तुरंत स्पष्ट नहीं हो पाते.
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को संबंधित राज्यों के सांस्कृतिक और भाषाई संदर्भ के प्रति सतर्क रहने की जरूरत है, उन्होंने आगे कहा, वे यह कहकर अपना पल्ला नहीं झाड़ सकते कि हमने इस विशेष कंटेंट में फ्रंटल न्यूडिटी नहीं देखी, इसलिए हमने इसे नहीं हटाया, बिना यह समझे कि यह यौन उत्पीड़न या हिंसा का कृत्य है.
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