बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान भारत में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में शामिल नहीं होंगे. यह फैसला ऐसे समय में हुआ है, जब बांग्लादेश के पास BIMSTEC की अध्यक्षता है. इस पर बांग्लादेश के हाई कमिश्नर रियाज हमीदुल्लाह ने कहा कि प्रधानमंत्री के सम्मेलन में शामिल न होने के पीछे एक खास संदर्भ और परिस्थितियां हैं.
इंडिया टुडे के BRICS Roundtable में रियाज हमीदुल्लाह से पूछा गया कि क्या BIMSTEC की अध्यक्षता के चलते तारिक रहमान ने BRICS Summit में शामिल होने से इनकार किया है. इस पर उन्होंने कहा कि इसे इस तरह देखना सही नहीं होगा.
यह भी पढ़ें: भारत किसी एक खेमे में क्यों नहीं जाएगा, राम माधव ने समझाई रणनीति
हमीदुल्लाह ने कहा, 6.5 महीने हो चुके हैं. अब बांग्लादेश में लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार है. कुछ खास परिस्थितियां और संदर्भ थे, जिनकी वजह से प्रधानमंत्री यहां आकर शामिल नहीं हो सके, इसका सबसे सीधा जवाब यही है.
हालांकि, उन्होंने उन परिस्थितियों के बारे में विस्तार से नहीं बताया, जिनकी वजह से तारिक रहमान 12 और 13 सितंबर को होने वाले BRICS Summit में शामिल नहीं हो पाए. हमीदुल्लाह से यह भी पूछा गया कि क्या तारिक रहमान की सम्मेलन में भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए राजनयिकों के बीच बातचीत करना मुश्किल था. इस पर उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा, इसीलिए राजनयिकों को अजीब किस्म के जीव कहा जाता है.
बांग्लादेशी दूत ने कहा कि बड़े शिखर सम्मेलनों में क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय संगठनों की भागीदारी एक स्थापित परंपरा रही है और इसे सकारात्मक रूप से देखा जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि BRICS और अन्य शिखर सम्मेलनों में BIMSTEC जैसे संगठनों को आमंत्रित किया जाना इसी सोच को दर्शाता है. उन्होंने कहा, न केवल BRICS बल्कि अन्य शिखर सम्मेलनों में भी क्षेत्रीय या उप-क्षेत्रीय संगठनों को शामिल करना एक परंपरा रही है. यह स्वागत योग्य कदम है, कोई भी इसे सकारात्मक और रचनात्मक तरीके से देखेगा.
उन्होंने आगे कहा, जब BRICS दक्षिण-पूर्व एशिया और भारत पहुंचा, तो इसी प्रक्रिया के तहत BIMSTEC जैसे क्षेत्रीय संगठनों को भी आमंत्रित किया गया. ‘ग्लोबल साउथ’ की अवधारणा पर हमीदुल्लाह ने कहा कि इसमें बड़ी संख्या में देश शामिल हैं, जिनके हित अलग-अलग हैं. इसलिए इसे एक जैसे हितों वाले समूह के रूप में नहीं देखा जा सकता, उन्होंने कहा कि आर्थिक, राजनीतिक और भू-राजनीतिक क्षेत्रों में अलग-अलग देशों के बीच साझा हित तलाशने पर ध्यान दिया जाना चाहिए. उन्होंने कहा, ग्लोबल साउथ दिलचस्प अवधारणा है, क्योंकि पिछले कई वर्षों से इसका जिक्र होता रहा है. अलग-अलग अनुमानों और मानदंडों के आधार पर देखें तो इसमें 130 से 150 देश शामिल हैं. यह कोई एक जैसा समूह नहीं है. इसके कई स्तर हैं.
यह भी पढ़ें: देश हित में चीन के साथ काम करना भारत के लिए क्यों जरूरी', अमिताभ कांत ने बताया
aajtak.in