देश के रियल एस्टेट क्षेत्र के दिग्गज कारोबारी निरंजन हीरानंदानी ने भारत की आवास नीति में बड़े बदलाव की जरूरत बताई है. उनका कहना है कि देश में सस्ते घरों की कमी को दूर करने के लिए सरकार को अगले 10 साल तक किराये के मकानों को बढ़ावा देना चाहिए, इसके लिए सरकार को निजी कंपनियों, बैंकों, वित्तीय संस्थानों और चैरिटेबल ट्रस्ट को किराये के मकान बनाने के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए.
उनका मानना है कि मौजूदा समय में जमीन की बढ़ती कीमतों, निर्माण लागत और सरकारी शुल्क के कारण कम कीमत वाले घर बनाना मुश्किल होता जा रहा है. ऐसे में किराये के मकान आम लोगों और कामकाजी पेशेवरों के लिए एक बेहतर विकल्प बन सकते हैं.
न्यूज18 के राइजिंग भारत समिट में बोलते हुए हीरानंदानी ने अमेरिका का उदाहरण दिया, उन्होंने कहा कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका में करीब 50 फीसदी लोग किराये के मकानों में रहते हैं. भारत को भी इस मॉडल पर विचार करना चाहिए. उन्होंने कहा, ''यह एक ऐसा विकल्प है, जिसे तेजी से अपनाने की जरूरत है, सरकार को अगले 10 साल तक किराये के मकान बनाने के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए.''
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कंपनियों को अपने कर्मचारियों के लिए मकान बनाने पर मिले टैक्स छूट
हीरानंदानी ने सुझाव दिया कि सरकार को केवल औद्योगिक क्षेत्र तक ही आवास से जुड़ी टैक्स छूट सीमित नहीं रखनी चाहिए. सेवा क्षेत्र की कंपनियों को भी अपने कर्मचारियों के लिए मकान बनाने पर ऐसी सुविधाएं मिलनी चाहिए, इसमें बैंक, वित्तीय संस्थान और बड़ी कंपनियां शामिल हो सकती हैं.
उन्होंने बताया कि करीब दो साल पहले सरकार ने औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों के लिए आवास बनाने की योजना को प्रोत्साहन दिया था. इसके तहत यदि कोई उद्योग अपने कर्मचारियों के रहने के लिए मकान बनाता है और उनका इस्तेमाल इसी उद्देश्य के लिए होता है, तो उसे 10 साल तक टैक्स में छूट का लाभ मिल सकता है.
उनका सुझाव है कि इसी तरह की सुविधा सेवा क्षेत्र की कंपनियों को भी दी जानी चाहिए, उन्होंने रिलायंस और एचडीएफसी जैसी कंपनियों का उदाहरण देते हुए कहा कि ये कंपनियां भी अपने कर्मचारियों के लिए किराये के मकान बना सकती हैं.
मुंबई में रोजाना लंबी दूरी तय करने से मिलेगी राहत
हीरानंदानी के मुताबिक, किराये के मकानों को बढ़ावा देने से बड़े शहरों में नौकरी करने वाले लोगों को काफी राहत मिल सकती है. खासकर मुंबई जैसे शहर में बड़ी संख्या में कर्मचारी अपने घर से दफ्तर पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करते हैं. उन्होंने कहा कि मुंबई में कई लोग विरार और वसई जैसे दूर के इलाकों से दक्षिण मुंबई स्थित दफ्तरों तक रोजाना आते-जाते हैं. इसमें काफी समय और पैसा खर्च होता है. अगर कंपनियां अपने कर्मचारियों के लिए दफ्तर के आसपास किराये के मकान बनवाएं तो उनकी यात्रा आसान हो सकती है, इससे कंपनियों को भी कर्मचारियों के लिए बेहतर सुविधाएं देने का मौका मिलेगा.
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किराये के मकानों में निवेश से क्यों बच रहे हैं डेवलपर्स?
हीरानंदानी ने बताया कि भारत में रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी को किराये पर देने से मिलने वाला रिटर्न काफी कम है. आमतौर पर यह 2 से 3 फीसदी के आसपास रहता है, इसी वजह से डेवलपर्स और बड़े निवेशक किराये के मकान बनाने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाते.
उन्होंने कहा कि सरकार को टैक्स में छूट और दूसरे वित्तीय प्रोत्साहन देने चाहिए, ताकि किराये के मकानों में निवेश करना भी फायदे का सौदा बन सके, इससे न केवल रियल एस्टेट डेवलपर्स बल्कि बैंक और वित्तीय संस्थान भी इस क्षेत्र में निवेश के लिए आगे आ सकते हैं.
देश के बड़े शहरों में घट रही सस्ते घरों की हिस्सेदारी
देश में किफायती घरों की उपलब्धता लगातार एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है. आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के मुताबिक, देश के आठ सबसे बड़े शहरों में नए घरों की कुल सप्लाई में 50 लाख रुपये से कम कीमत वाले मकानों की हिस्सेदारी 2018 में 52.4 फीसदी थी, यह 2025 में घटकर सिर्फ 17 फीसदी रह गई. यह आंकड़ा बताता है कि बड़े शहरों में कम बजट वाले घरों की उपलब्धता कितनी कम हुई है. जमीन और निर्माण की बढ़ती लागत के कारण डेवलपर्स भी कम कीमत वाले मकान बनाने से पीछे हट रहे हैं. ऐसे में किराये के मकानों का विकल्प इस समस्या को कम करने में मदद कर सकता है.
टाटा ट्रस्ट और CSR फंड से भी बनें किराये के मकान
हीरानंदानी ने किराये के मकानों के निर्माण में चैरिटेबल ट्रस्ट और कंपनियों के CSR फंड के इस्तेमाल का भी सुझाव दिया. उन्होंने मुंबई के पुराने दौर का जिक्र करते हुए कहा कि आजादी से पहले कई चैरिटेबल ट्रस्ट मजदूरों और आम परिवारों के रहने के लिए चॉल और दूसरे आवास बनवाते थे, लेकिन अब ऐसी गतिविधियों के लिए पहले जैसी अनुमति नहीं है.
उन्होंने कहा कि सरकार को टाटा ट्रस्ट जैसे संस्थानों को भी किराये के मकान बनाने की अनुमति देनी चाहिए, इसके अलावा बड़ी कंपनियों के CSR फंड का इस्तेमाल भी ऐसे आवास बनाने में किया जा सकता है. इन मकानों को जरूरतमंद और कामकाजी लोगों को किराये पर दिया जा सकता है.
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