दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) ने आवासीय संपत्तियों को लीजहोल्ड से फ्रीहोल्ड में बदलने के सभी पेंडिंग आवेदनों पर फिलहाल रोक लगा दी है. केंद्र सरकार ने राज्यसभा में जानकारी दी कि इस पूरी व्यवस्था से जुड़ी नीति की समीक्षा की जा रही है. सरकार का मकसद कन्वर्जन की दरों को तर्कसंगत बनाना और आम प्रॉपर्टी मालिकों के लिए इस पूरी प्रक्रिया को सरल और आसान बनाना है.
राज्यसभा में एक लिखित सवाल का जवाब देते हुए आवास और शहरी मामलों के केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू ने बताया कि समीक्षा पूरी होने तक नए और लंबित मामलों को होल्ड पर रखा गया है. उन्होंने कहा कि मौजूदा नीति की समीक्षा का उद्देश्य इसे पूरी तरह नागरिक-अनुकूल बनाना है. हालांकि, सरकार ने अभी यह साफ नहीं किया है कि नई नीति कब से लागू होगी या यह प्रक्रिया दोबारा कब शुरू की जाएगी.
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लीजहोल्ड और फ्रीहोल्ड का अंतर
कन्वर्जन प्रक्रिया के तहत लीजहोल्ड प्रॉपर्टी को फ्रीहोल्ड में बदला जाता है. लीजहोल्ड में प्रॉपर्टी मालिक के पास जमीन DDA से लंबी अवधि की लीज पर होती है. वहीं, फ्रीहोल्ड कराने के बाद मालिक को उस संपत्ति और जमीन पर पूरा, स्थायी और कानूनी मालिकाना अधिकार मिल जाता है.
किन प्रॉपर्टीज पर लागू होता है नियम
DDA की मौजूदा योजना के तहत कई तरह की आवासीय संपत्तियां फ्रीहोल्ड के दायरे में आती हैं. इसमें 50 वर्ग मीटर से छोटे प्लॉटों को छोड़कर बने हुए आवासीय प्लॉट और बिना प्रीमियम वाले फिक्स्ड-टर्म मकान शामिल हैं. इसके अलावा DDA द्वारा आवंटित LIG, MIG, HIG, SFS फ्लैट्स, एशियन गेम्स विलेज कॉम्प्लेक्स और ग्रुप हाउसिंग सोसायटियों की प्रॉपर्टीज भी इसके तहत आती हैं. शर्त सिर्फ इतनी है कि प्रॉपर्टी पर कोई विवाद न हो और लीज के कागजात में जमीन का इस्तेमाल 'आवासीय' दर्ज हो.
फीस और किस्त से जुड़े नियम
कन्वर्जन शुल्क प्रॉपर्टी के इलाके और ज़ोन के हिसाब से तय होता है. आवेदक इस राशि का भुगतान एक बार में कर सकते हैं या फिर 12% सालाना ब्याज के साथ 5 साल की किस्तों में भी दे सकते हैं. DDA किस्तें पूरी होने के बाद ही फ्रीहोल्ड अधिकार देता है और डेडलाइन छूटने पर कोई अतिरिक्त समय नहीं मिलता. आवेदन के लिए कागजात के साथ 200 रुपये की प्रोसेसिंग फीस लगती है. ध्यान देने वाली बात यह भी है कि लीजहोल्ड प्रॉपर्टी को फ्रीहोल्ड में बदलना पूरी तरह ऐच्छिक है, अनिवार्य नहीं.
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