सम्राट या तेजस्वी, किसको टेंशन देंगे पीके? बांकीपुर के नतीजों का क्या होगा असर

बिहार की हाईप्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा चुनाव के नतीजे जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर के पक्ष में जाते दिख रहे हैं. पीके को लगातार बढ़त मिल रही है और ये जीत में तब्दली होता है तो बिहार की राजनीति में बड़ा सियासी उलटफेर होगा. बीजेपी सरकार बनने के बाद झटका होगा तो तेजस्वी यादव का राजनीतिक मिजाज बिगड़ सकता है.

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बांकीपुर चुनाव नतीजे का क्या होगा असर (Photo-ITG) बांकीपुर चुनाव नतीजे का क्या होगा असर (Photo-ITG)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 03 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 2:44 PM IST

बिहार की बांकीपुर विधानसभा चुनाव के नतीजे आ रहे हैं, बीजेपी का मजबूत दुर्ग दरकता हुआ नजर आ रहा है. जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर जीत की तरफ धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं. उपचुनाव के नतीजे भले ही बिहार की एनडीए सरकार की सेहत पर कोई खास असर न पड़े, लेकिन सीएम सम्राट चौधरी पर जरूर सवाल उठेंगे? 

प्रशांत किशोर विधानसभा पहुंचने में सफल होते हैं तो आरजेडी नेता तेजस्वी यादव का भी सियासी मिजाज बिगड़ बिहार में बिगड़ सकता है. इसीलिए बांकीपुर सीट के नतीजे का संदेश दूर तक जाएगा.

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बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के रुझान एक बड़े सियासी भूचाल की ओर इशारा कर रहे हैं. बांकीपुर उपचुनाव के 12वें राउंड की मतगणना के बाद प्रशांत किशोर  6646 वोटों से आगे चल रहे हैं.पीके के अब तक 23756 वोट मिल चुके हैं तो बीजेपी उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा को 17110 मिले हैं. राजद प्रत्याशी रेखा गुप्ता को 4850 वोट मिले हैं. यही बढ़त बनी रही तो बीजेपी के लिए बड़ा झटका होगा?

बांकीपुर उचुनाव नतीजे का इम्पैक्ट क्या होगा
बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में प्रशांत किशोर लगातार बढ़त बनाए हैं. वो अगर जीतते हैं तो बिहार में जन सुराज पार्टी का अब उभार होगा. जनता में संदेश जाएगा कि एक पढ़ा लिखा विधायक सदन में पब्लिक की आवाज को बुलंद करेगा.

बांकीपुर सीट से प्रशांत किशोर ने उतरकर एक संदेश ए हैं कि वह बिहार में मज़बूती से खड़े हैं. इस संदेश को देने के लिए ज़रूरी नहीं है कि चुनाव जीता ही जाए, उनका संदेश साफ होगा कि जन सुराज बिहार में लड़ाई लड़ेगी, बिहार में उनकी जीत पार्टी के साथ-साथ एक नई तरह की सियासी संजीवनी बिहार के लिए होगी.

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बांकीपुर सीट पर 2025 के चुनाव में जन सुराज पार्टी के क़रीब आठ हज़ार वोट मिले थे. प्रशांत किशोर ने बांकीपुर उपचुनाव में खुद उतरकर पूरे सियासी माहौल को ही बदल दिया. पीके जीत जाते हैं तो उनकी पार्टी को बहुत मज़बूती मिलेगी.प्रशांत किशोर की जीत जनसुराज के लिए सियासी ऑक्सीजन होगा. 

विधायक बनने के साथ ही प्रशांत किशोर विधानसभा से लेकर सड़क तक बहुत मुखर हो जाएंगे. बिहार की विपक्ष की स्पेस को तेजी से हासिल कर सकते हैं. बीजेपी के खिलाफ भले ही प्रशांत किशोर बहुत ज्यादा मुखर न रहते हों, लेकिन सीएम सम्राट चौधरी के सबसे धुर विरोधी माने जाते हैं. 

बिहार में जाति की पहचान अब भी बहुत बड़ी है और सवर्णों का मोह बीजेपी से अभी ख़त्म नहीं हुआ है. वे ब्राह्मण हैं, सवर्ण वोटरों के लिए मुफीद, लेकिन बांकीपुर में जिस तरह से उन्हें लीड मिलती दिख रही है, उसमें सवर्ण वोटर भी अहम रोल अदा किए. बीजेपी की सवर्ण वोटों से पकड़ कमजोर पड़ी है. 

बिहार में बीजेपी के सत्ता में रहते हुए बांकीपुर जैसे मजबूत सीट हार जाती है, तो बड़ा सवाल उठेगा. यह सीट 1995 से बीजेपी लगातार जीत रही है. नितिन नवीन के परिवार की परंपरागत सीट है, जहां से पांच बार नितिन नवीन पांच बार विधायक रहे तो चार बार उनके पिता विधायक रहे हैं. 

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बिहार की राजनीति में आरजेडी अभी विपक्ष की सबसे बड़ी है, लेकिन प्रशांत किशोर की जीत तेजस्वी यादव के लिए सियासी टेंशन का सबब बन सकता है. बांकीपुर सीट पर आरजेडी की पूरी सियासी जमीन पीके ने कब्जा ली है. अभी तक के रुझानों से साफ जाहिर हो रहा है. यह नतीजे केवल आरजेडी के तीसरे स्थान पर रहने का नहीं, बल्कि आरजेडी की सिकुड़ती सियासी जमीन के लिए भी है. 

आरजेडी की बिगड़ेगी सियासी सेहत 
बांकीपुर के चुनावी रण में आरजेडी उम्मीदवार तीसरे नंबर पर सिमटती दिख रही है. ऐसे में आरजेडी की जमीनी पकड़ पर एक गहरा सवालिया निशान है. बिहार में अमूमन यह माना जाता रहा है कि मुख्य मुकाबला बीजेपी और आरजेडी के गठबंधन के बीच ही होता है. लेकिन बांकीपुर उपचुनाव नतीजे ने साफ कर दिया है कि आरजेडी का मुख्य मुकाबला तो दूर, वह लड़ाई की रेस से पूरी तरह बाहर हो चुकी है. 

बांकीपुर सीट के नतीजा तेजस्वी यादव के एम-वाई (मुस्लिम-यादव) और ए टू जेड वाली राजनीति के लिए एक सियासी चुनौती है.तेजस्वी ने अपनी सियासी चूकों से प्रशांत किशोर को बिहार की मुख्यधारा की राजनीति में प्रवेश करने के लिए एक बड़ा स्पेस गिफ्ट कर दिया है, तेजस्वी यादव का पूरा ध्यान पारंपरिक तौर-तरीकों पर ही केंद्रित रहा जबकि प्रशांत किशोर ने जमीनी स्तर पर पदयात्रा और तार्किक संवाद के जरिए युवाओं और असंतुष्ट वोटरों को अपने पाले में करने सफल रहे. 

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बांकीपुर के चुनावी समीकरणों को समझें तो यहां पर भाजपा के कोर सवर्ण मतदाताओं में मौजूदा नेतृत्व को लेकर नाराजगी देखने को मिली. अमूमन ऐसी स्थिति में सत्ता विरोधी और नाराज वोट मुख्य विपक्षी दल यानी आरजेडी की झोली में जाते हैं. इस बार पासा पूरी तरह पलट गया. मुस्लिम और यादव मतों में बड़ा बिखराव हुआ और साथ ही भाजपा से नाराज कोर वोटरों ने आरजेडी की तरफ देखने के बजाय प्रशांत किशोर के नए विकल्प पर भरोसा जताया. 

प्रशांत किशोर क्या बनेंगे नया विकल्प
बांकीपुर उपचुनाव में मतदाताओं का यह रुझान बताता है कि जनता अब पारंपरिक जातीय घेरेबंदी से निकलकर एक नया और तार्किक विकल्प तलाश रही थी, जो उन्हें पीके में नजर आया. बांकीपुर के रुझान नतीजों में बदलती है और प्रशांत किशोर बिहार विधानसभा में कदम रखते हैं, तो राजनीति के जानकारों की नजर में निश्चित तौर पर तेजस्वी यादव की राजनीति पर भारी पड़ते नजर आएंगे. 

प्रशांत किशोर की सबसे बड़ी ताकत उनके दावों और कथनों में तार्किक और डेटा-आधारित बातों का पुट होना है. जब सदन के पटल पर विकास, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों पर तार्किक बहस होगी, तो तेजस्वी यादव के लिए उनके तीखे अंदाज के बरअक्श खड़ा होना एक बड़ी अग्निपरीनक्षा साबित होगा. तेजस्वी अब तक खुद को बिहार के युवाओं का एकमात्र चेहरा बताते आए हैं, लेकिन पीके के आने से यह एकाधिकार पूरी तरह समाप्त हो जाएगा. 

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