जर्मनी की दिग्गज ऑटोमेकर फॉक्सवैगन (Volkswagen) एक बड़े जॉब कट की ओर बढ़ रही है. ये कंपनी के 89 साल के इतिहास में सबसे बड़ा जॉब कट हो सकता है, जिसमें 1 लाख के करीब लोगों की नौकरियां जाएंगी. कंपनी 1 लाख जॉब कट के साथ चार फैक्टरी को बंद कर सकती है. इसकी वजह यूरोप में कमजोर होती मांग, चीन से मिलता कंपटीशन और अमेरिकी टैरिफ है.
फॉक्सवैगन दुनिया की सबसे बड़ी ऑटोमेकर कंपनियों में से एक है. यूरोप में इस कंपनी का दबदबा था, लेकिन चीनी कंपनियों की एंट्री से फॉक्सवैगन को लगातार कंपटीशन मिल रहा है. चीनी कंपनियां कम कीमत में बेहतर टेक्नोलॉजी वाले प्रोडक्ट्स लेकर आ रही हैं. खासकर इलेक्ट्रिक कारों की रेस में चीनी ऑटोमेकर किसी दूसरे देश की कंपनियों से आगे हैं.
न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, फॉक्सवैगन के सुपरवाइजरी बोर्ड के सदस्यों को जिन प्रपोजल की जानकारी दी गई है, उनमें हनोवर, ज्विकौ, एम्डेन और ऑडी के नेकार्सुल्म (Neckarsulm) प्लांट को बंद करने का प्लान भी शामिल है. इन प्लान्स पर 9 जुलाई को होने वाली बोर्ड मीटिंग में चर्चा की जा सकती है.
अगर इन प्लान्स को मंजूरी मिलती है, तो इससे लगभग 45 हजार नौकरियों पर संकट आ जाएगा. लगभग 50 हजार नौकरियों को कम करने पर 2024 में पहले ही यूनियन से बातचीत हो चुकी है. कुल 1 लाख तक वर्कफोर्स इससे प्रभावित होने का अनुमान है. अगर ऐसा होता है, तो ये ऑटो इंडस्ट्री के इतिहास की सबसे बड़ी रिस्ट्रक्चरिंग होगी.
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फॉक्सवैगन ना सिर्फ जॉब्स में कटौती करने वाली है बल्कि कंपनी अपना निवेश भी कम कर रही है. रिपोर्ट्स की मानें, तो फॉक्सवैगन अगले 5 सालों में अपने निवेश में लगभग 15 फीसदी की कटौती करने पर विचार कर रही है. इस कटौती के बाद कंपनी का कुल निवेश घटकर 130 अरब यूरो तक आ जाएगा.
फॉक्सवैगन इस वक्त कई चुनौतियों से घिरी हुई है. चीनी प्लेयर्स से कंपनी ने घरेलू और ग्लोबल दोनों ही मार्केट में कड़ी टक्कर मिल रही है. वहीं यूरोप में मांग भी घट रही है और अमेरिका दुनिया के तमाम देशों की तरह ही यूरोपीय कंपनियों पर भी टैरिफ लगा रहा है.
एक वक्त पर फॉक्सवैगन चीनी मार्केट सबसे ज्यादा कारें बेच रहा था. साल 2024 में बीवाईडी ने इसे पीछे कर दिया है. इसके बाद से कंपनी की सेल लगातार गिर रही है. रिपोर्ट्स बताती हैं कि चीनी मार्केट में गैर-चीनी कंपनियों की सेल तेजी से कम हुई है. साल 2020 में ऐसी कंपनियों की मार्केट हिस्सेदारी 57 परसेंट थी, जो घटकर 32 परसेंट पर पहुंच गई है.
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ये प्रेशर सिर्फ चीन तक अब सीमित नहीं है. यूरोपी मार्केट में पिछले कुछ सालों में बीवाईडी, चेरी, SAIC और लीपमोटर्स जैसी कंपनियों की हिस्सेदारी दोगुनी हुई है. इससे फॉक्सवैगन को उसके घरेलू मार्केट में ही टक्कर मिल रही है. कंपनी की लीडरशिप ने भी माना है कि मौजूदा बिजनेस मॉडल दबाव में है. बढ़ती लागत और कम हुई मांग से कंपनी के प्रॉफिट पर असर पड़ रहा है.
आजतक ऑटोमोबाइल डेस्क