E20 Impact on Petrol Car Sales: E20 को लेकर छिड़ी बहस का असर अब कागजों से निकलकर कार बाजार तक पहुंचता दिख रहा है. जुलाई के आंकड़े बता रहे हैं कि जिस पेट्रोल कार को भारतीय ग्राहक सबसे किफायती विकल्प मानता रहा है, उससे अब दूरी बनने लगी है. कोई CNG की तरफ देख रहा है, कोई EV का हिसाब लगा रहा है और डीजल, जिसे बाजार ने लगभग विदाई दे दी थी, वह फिर से दरवाजे पर दस्तक दे रहा है. सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि लोग कौन सी कार खरीद रहे हैं. असली सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि पेट्रोल कारों के मुकाबले दूसरे फ्यूल ऑप्शन अचानक इतने करीब आ गए.
पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग के घमासान के बीच जुलाई के आंकड़े बताते हैं कि पेट्रोल कारों की मांग में गिरावट आई है, जबकि CNG, इलेक्ट्रिक और डीजल कारों की तरफ ग्राहकों का रुझान बढ़ रहा है. खास बात यह है कि पहले पेट्रोल कारों का बाजार तेजी से बढ़ रहा था, यहां तक कि वक्त भी ग्राहकों ने जमकर पेट्रोल गाड़ियां खरीदी थी जब पूरी दुनिया पश्चिमी एशिया में छिड़ी जंग से परेशान थी. लेकिन अब पेट्रोल और दूसरे फ्यूल वाली कारों के बीच का अंतर तेजी से कम हो गया है. डीलरों का मानना है कि E20 पेट्रोल को लेकर ग्राहकों के मन में बनी अनिश्चितता इस बदलाव की बड़ी वजहों में से एक है.
क्या कहते हैं आंकड़े?
फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन यानी FADA के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई में पेट्रोल कारों की हिस्सेदारी घटकर 41.68 प्रतिशत रह गई. वहीं CNG, इलेक्ट्रिक और दूसरे फ्यूल ऑप्शन वाली कारों की हिस्सेदारी बढ़कर 40.59 प्रतिशत पहुंच गई. यानी दोनों के बीच अब सिर्फ करीब एक प्रतिशत का अंतर रह गया है. कुछ समय पहले तक यह अंतर तकरीबन 13 प्रतिशत का था. FADA के मुताबिक, अगर मौजूदा रुझान जारी रहता है तो अगले एक-दो महीनों में CNG और इलेक्ट्रिक जैसी कारें पेट्रोल कारों को पीछे छोड़ सकती हैं.
पेट्रोल में 20 प्रतिशत तक इथेनॉल ब्लेंडिंग यानी E20 को लेकर पिछले कुछ समय से लगातार चर्चा हो रही है. ग्राहकों के बीच इस बात को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि भविष्य में इथेनॉल की मात्रा और बढ़ती है तो उनकी कारों के इंजन और फ्यूल सिस्टम पर इसका क्या असर होगा. सरकार भले ही लगातार E20 पेट्रोल के फायदे गिना रही है, लेकिन आमजन के बीच ये सवाल और संशय बना हुआ है.
ऐसे कई मामले सोशल मीडिया पर आए दिन देखने को मिल रहे हैं, जिसमें लोग E20 पेट्रोल से वाहनों को होने वाले नुकसान और माइलेज में गिरावट की शिकायत कर रहे हैं. अब सरकार ने संसद में भी इस बात को मान लिया है कि, E20 पेट्रोल से पुराने वाहनों के माइलेज में तकरीबन 6% की गिरावट हो सकती है. इसके अलावा कुछ रबर पार्ट्स के खराब होने की भी संभावना है.
इसी चिंता के कारण कुछ ग्राहक नई पेट्रोल कार खरीदने से पहले दूसरे विकल्पों पर विचार कर रहे हैं. CNG और इलेक्ट्रिक कारों के अलावा डीजल कारों की मांग में भी दोबारा तेजी देखने को मिली है. डीलरों का कहना है कि फ्यूल को लेकर भविष्य की तस्वीर साफ नहीं होने से ग्राहक खरीदारी का फैसला टाल रहे हैं या दूसरे पावरट्रेन की तरफ जा रहे हैं.
बढ़ रहा पेट्रोल कारों का स्टॉक
पेट्रोल कारों की मांग में बदलाव का सीधा असर डीलरशिप के स्टॉक पर भी पड़ा है. FADA के अनुसार, अब 25 प्रतिशत से ज्यादा डीलर इन्वेंट्री 60 से 70 दिन या उससे ज्यादा पुरानी हो चुकी है. सामान्य तौर पर कारों का स्टॉक करीब 30 से 33 दिनों में निकल जाना चाहिए. FADA के मुताबिक आइडियल सिचुएशन में डीलरशिप पर करीब 21 दिनों का स्टॉक होना बेहतर माना जाता है.
जुलाई में कंपनियों ने डीलरों को कुल 4.69 लाख कारें भेजीं, जबकि रिटेल सेल करीब 4.16 लाख यूनिट रही. यानी कंपनियों की तरफ से डीलरों को भेजी गई कारों और ग्राहकों को बेची गई कारों के बीच 52 हजार से ज्यादा यूनिट का अंतर रहा. यही वजह है कि डीलरशिप पर गाड़ियों का स्टॉक बढ़ता चला गया.
डीजल कारों की फिर बढ़ी मांग
एक समय ऐसा लग रहा था कि भारतीय कार बाजार से डीजल इंजन लगभग खत्म हो जाएगा. मारुति सुजुकी जैसी दिग्गज कार निर्माता कंपनी, जिसका कब्जा अभी भी लगभग आधे बाजार पर है. उसने भी अप्रैल 2020 से देश में डीजल कारों का प्रोडक्शन बंद कर दिया था. लेकिन अब तस्वीर कुछ बदलती नजर आ रही है. जुलाई में डीजल कारों का मार्केट शेयर 17.73 प्रतिशत रहा है, जो पिछले साल के जुलाई के मुकाबले करीब 1.4 प्रतिशत ज्यादा है. इस बढ़ती मांग को भी E20 को लेकर मचे घमासान से जोड़कर देखा जा रहा है.
डीजल में इथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर अभी पेट्रोल जैसा मुद्दा नहीं है, इसलिए कुछ ग्राहक डीजल कारों को ज्यादा भरोसेमंद विकल्प मान रहे हैं. हालांकि, सरकार अब डीजल में आइसोब्यूटेनॉल की ब्लेंडिंग की दिशा में भी तैयारी कर रही है. लेकिन फिलहाल इसकी कोई टाइमलाइन नहीं है. केंद्रीय सड़क परिवहन राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी कई बार कह चुके हैं कि, डीजल में आइसोब्यूटेनॉल के ब्लेंडिंग की टेस्टिंग चल रही है.
FADA के एक इंटर्नल सर्वे से भी बाजार में बनी स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है. पहले आमतौर पर सिर्फ 5 से 10 प्रतिशत कारों का स्टॉक लंबे समय तक डीलरशिप पर पड़ा रहता था. अब यह आंकड़ा बढ़कर करीब 25 प्रतिशत हो गया है. इस स्थिति के पीछे दो बड़ी वजहें मानी जा रही हैं. पहली वजह यह है कि कार कंपनियां और डीलर बदलते डिमांड के हिसाब से उत्पादन और गाड़ियों की सप्लाई को तेजी से एडजस्ट नहीं कर पाए. दूसरी वजह यह है कि ग्राहकों की पसंद में बदलाव उम्मीद से ज्यादा तेजी से हुआ है.
आगे की क्या होगी स्ट्रेटजी
इंडियन ऑटो इंडस्ट्री फेस्टीव सीजन के मुहाने पर खड़ा है. अगस्त के आखिरी हफ्ते यानी रक्षाबंधन से फेस्टीव सीजन की शुरुआत माना जाता है. कार कंपनियों के लिए बीता जुलाई महीना काफी बेहतर रहा है और इसी पेस को देखते हुए कार कंपनियों को फेस्टीव सीजन में ग्रोथ की भी उम्मीद है. लेकिन अगर आगे भी पेट्रोल कारों की मांग में यही स्थिति रहती है तो कंपनियों को अपनी प्रोडक्शन स्ट्रेटजी में बदलाव करना पड़ सकता है. बाजार की मौजूदा स्थिति को देखते हुए CNG और इलेक्ट्रिक कारों की तरफ ज्यादा फोकस बढ़ाया जा सकता है.
अश्विन सत्यदेव