अमेरिका ने ईरान को तोड़ने के लिए लगभग हर हथकंडा अपनाया है. कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए, उसकी अर्थव्यवस्था को पंगु किया, उसके परमाणु ठिकानों पर हमले किए और उसके दुश्मनों को खुला समर्थन दिया. इसके बावजूद शिया मुस्लिम देश ईरान झुकने को तैयार नहीं है.
डोनाल्ड ट्रंप ने खुले तौर पर ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई को धमकी दी लेकिन न तो ईरान ने सरेंडर किया और न ही उसका रुख बदला. सवाल ये है कि आखिर क्यों?
संकटों से घिरा ईरान, फिर भी झुकने से इनकार
आज का ईरान हर तरह के संकट से जूझ रहा है. पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों ने उसकी अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है. महंगाई और बेरोजगारी से लोग सड़कों पर हैं. व्यक्तिगत आजादी पर दशकों से पाबंदियां हैं, जिनके खिलाफ समय-समय पर बड़े प्रदर्शन होते रहे हैं.
महिलाओं को हिजाब न पहनने पर सख्त सजा, छात्रों की गिरफ्तारियां, प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी और अल्पसंख्यकों का दमन... ये सब ईरानी शासन की सच्चाई है. इसके बावजूद, अमेरिका और इजरायल के लगातार दबाव और पिछले साल हुए बम हमलों के बाद भी ईरान ने घुटने नहीं टेके.
ये समर्थन नहीं, हकीकत को समझने की कोशिश
ये रिपोर्ट ईरानी शासन का महिमामंडन नहीं करती. ये वही शासन है जिसने अपने ही नागरिकों पर अत्याचार किए हैं. लेकिन भू-राजनीति सिर्फ अच्छे-बुरे की कहानी नहीं होती. आज की दुनिया में ईरान उन गिने-चुने देशों में शामिल है जो अमेरिका को आंख में आंख डालकर उसकी धमकियों को खारिज करने की हिम्मत रखते हैं. वो भी तब, जब उसके पास अमेरिका या इजरायल जैसी सैन्य ताकत नहीं है. असल में ये टकराव दो ताकतवर बुलियों के बीच का है.
अमेरिका ईरान पर सीधा हमला क्यों नहीं कर रहा?
खामनेई तक पहुंच आसान नहीं
इसका पहला कारण ये है कि खामनेई तक पहुंच आसान नहीं. पिछले साल जून में हुए 12 दिन के युद्ध के दौरान अमेरिका और इजरायल ने ईरान के कई शीर्ष जनरलों और परमाणु वैज्ञानिकों को मार गिराया. खामेनेई को मारने की धमकी भी दी गई, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
असल वजह ये है कि खामेनेई इस समय इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की कड़ी सुरक्षा में छिपे हुए हैं. ये कोई वेनेजुएला जैसा ऑपरेशन नहीं, जहां कुछ सुरक्षाकर्मियों को हटाकर काम पूरा हो जाए.
मिडिल ईस्ट का भूगोल अमेरिका के खिलाफ
अमेरिका के पास मिडिल ईस्ट में 40 हजार से ज्यादा सैनिक हैं, लेकिन हमला करना इतना आसान नहीं. सऊदी अरब अमेरिका पर दबाव बना रहा है कि वह ईरान पर हमला न करे. कतर और ओमान दोनों देश अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत के लिए सक्रिय हैं. अगर ईरान पर हमला हुआ तो खाड़ी देशों पर सीधा खतरा आएगा क्योंकि वे अमेरिका के सैन्य ठिकानों की मेजबानी करते हैं. बहरीन और कुवैत भी इस कूटनीतिक कोशिश में शामिल हैं.
खामेनेई के बाद कौन?
मान लीजिए अमेरिका हमला करता है और खामेनेई सत्ता से हट जाते हैं, तो अगला सवाल है कि ईरान को कौन संभालेगा? डोनाल्ड ट्रंप खुद मान चुके हैं कि निर्वासित क्राउन प्रिंस रेजा पहलवी के पास ईरान में जमीनी समर्थन नहीं है. सत्ता में खालीपन पैदा हुआ तो ईरान इराक, सीरिया या अफगानिस्तान जैसी अराजकता में जा सकता है और अमेरिका इस जोखिम को समझता है.
अमेरिका की धमकियां और अंदरूनी उलझन
अमेरिका ने पहले दावा किया कि ईरान में 12 हजार लोग मारे गए फिर खुद ही बयान से पीछे हट गया. ट्रंप ने कहा कि गिरफ्तार प्रदर्शनकारियों को फांसी नहीं दी जाएगी. लेकिन, दूसरी तरफ पेंटागन ने यूएसएस अब्राहम लिंकन एयरक्राफ्ट कैरियर को मिडिल ईस्ट की ओर भेज दिया. जनवरी 16 तक ट्रंप ने ईरान पर हमला टाल दिया है, लेकिन साफ किया है कि ये फैसला स्थायी नहीं है. देखा जाए तो तेल, इजरायल और क्षेत्रीय स्थिरता, ये तीन फैक्टर अमेरिका को लगातार उलझाए हुए हैं.
अगर हमला हुआ तो ईरान क्या कर सकता है?
ईरान ने साफ चेतावनी दी है कि किसी भी हमले का 'तुरंत और कड़ा जवाब' दिया जाएगा.
ईरान की ताकत
2,000 किलोमीटर तक मार करने वाली बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलें
इराक, सीरिया, कतर (अल उदैद बेस), बहरीन में अमेरिकी ठिकानों को निशाना
होर्मुज जलडमरूमध्य को बाधित करने की क्षमता, जहां से दुनिया का 20% तेल गुजरता है
साइबर हमले
शिया मिलिशिया और हूती जैसे प्रॉक्सी ग्रुप्स हालांकि अमेरिकी नौसेना ईरान से कहीं ज्यादा ताकतवर है, लेकिन नुकसान सीमित नहीं रहेगा.
झुकेगा नहीं ईरान, बदलाव अंदर से ही आएगा
ईरान का शासन किसी भी तरह की सहानुभूति का हकदार नहीं है. लेकिन ये भी सच है कि ईरान अमेरिका के दबाव में नहीं झुक रहा. विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर बदलाव आया, तो वो बाहर से नहीं, बल्कि ईरानी जनता के भीतर से आएगा जैसे 1979 की क्रांति में हुआ था. ईरान को झुकाया नहीं जा सकता. उसे बदलना है, तो वो बदलाव अंदर से ही आएगा.