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इजरायल ने तुर्की को बताया 'अगला ईरान', घबराए एर्दोगन को उठाना पड़ा ऐसा कदम

तुर्की अपने पहले स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर 'मुगेम' को अगले साल के अंत तक तैयार कर रहा है, जो भूमध्य सागर में उसकी नौसैनिक ताकत को बढ़ाएगा. यह 60,000 टन का युद्धपोत बहुत विशाल बन रहा है जिसमें 60 विमान तैनात किए जा सकेंगे.

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एर्दोगन अपनी नौसेना की ताकत बढ़ा रहे हैं
एर्दोगन अपनी नौसेना की ताकत बढ़ा रहे हैं

जब दुनिया का ध्यान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अमेरिका की नाकेबंदी पर टिका हुआ है, तब तुर्की अपने पहले स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर ‘मुगेम’ को बनाने में बिजी है. तुर्की की नौसेना के कमांडर एडमिरल एर्कुमेंट तत्लीओग्लू ने पिछले हफ्ते कहा कि यह एयरक्राफ्ट कैरियर अगले साल के अंत तक बनकर तैयार हो जाएगा जिससे इसकी चर्चा शुरू हो गई है. चर्चा इसलिए भी तेज है क्योंकि यह तय समय से एक साल पहले ही पूरा हो रहा है जो दिखाता है कि तुर्की इजरायल के बढ़ते खतरे के बीच खुद को भविष्य के लिए तेजी से तैयार कर रहा है.

यह एयरक्राफ्ट कैरियर तुर्की का अब तक का सबसे बड़ा युद्धपोत होगा. लगभग 60,000 टन के इस जहाज की लंबाई 285 मीटर होगी. यह चार्ल्स डी गौले (261 मीटर, 42,500 टन) से भी बड़ा होगा, जो अब तक भूमध्य सागर का सबसे शक्तिशाली प्रमुख युद्धपोत माना जाता रहा है. इसमें 60 विमान तैनात किए जा सकेंगे और इसे शॉर्ट टेक-ऑफ सिस्टम के साथ डिजाइन किया गया है.

इस प्रोजेक्ट का उद्घाटन अगस्त 2025 में तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन ने किया था. ईरान पर अमेरिका और इजरायली हमलों के बीच तुर्की का इस प्रोजेक्ट में तेजी लाना बताता है कि तुर्की अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाकर अन्य देशों के खिलाफ मजबूत प्रतिरोधक शक्ति स्थापित करना चाहता है.

तुर्की और इजरायल के बीच हाल के दिनों में तनाव काफी बढ़ गया है. इजरायल में सरकार और विपक्ष दोनों के नेता अपने बयानों में लगातार तुर्की की तुलना ईरान से करने लगे हैं.

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इजरायल के लोकप्रिय विपक्षी नेता नेफ्ताली बेनेट जो अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं, ने फरवरी में अमेरिका में एक सम्मेलन में कहा था कि तुर्की 'अगला ईरान' है.

पूर्वी भूमध्य सागर में अलग-थलग पड़ा तुर्की

इजरायल-ईरान और अमेरिका के बीच दो दौर के युद्ध के बाद तुर्की ने अपनी एयर डिफेंस, मानव रहित प्लेटफॉर्म और पांचवीं पीढ़ी के कान फाइटर जेट प्रोजेक्ट में तेजी ला दी है.

तुर्की की नौसैनिक शक्ति पर विशेषज्ञ मैसून यासर का कहना है कि ग्रीस और साइप्रस के साथ इजरायल की बढ़ती साझेदारी से तुर्की चिंतित है और इसी वजह से वो अपनी नौसैनिक क्षमताओं को बढ़ाने पर काम कर रहा है.

यासार के मुताबिक, भले ही ऐसे विमानवाहक पोत आमतौर पर खुले समुद्र के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन तुर्की ‘मुगेम’ को क्षेत्र में संभावित दुश्मनों को रोकने के एक साधन के रूप में देख सकता है.

उन्होंने कहा, 'ग्रीक साइप्रस और इजरायल के बीच बढ़ते रिश्तों ने इस गठबंधन को काफी मजबूत बना दिया है और उनका रुख आक्रामक होता जा रहा है. तुर्की पूर्वी भूमध्य सागर में अलग-थलग पड़ता जा रहा है. यह विमानवाहक पोत तुर्की के लिए एक अतिरिक्त क्षमता के साथ-साथ रणनीतिक जरूरत भी है.'

तुर्की में विमानवाहक पोत बनाने का विचार नया नहीं है. इसकी शुरुआत 1990 के दशक की शुरुआत में हुई थी.

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तुर्की नौसेना के पूर्व एडमिरल यान्की बागसियोग्लू ने बताया कि 1993 में खुले समुद्र में तैनाती की एक अवधारणा तैयार की गई थी, जिसमें हल्के विमानवाहक पोत, एम्फीबियस असॉल्ट जहाज और ट्रांसअटलांटिक शक्ति प्रदर्शन शामिल थे.

उन्होंने कहा कि 2017 के आसपास नौसेना के भविष्य पर एक स्टडी के बाद यह प्रोजेक्ट आकार लेने लगा. उन्होंने कहा, 'अब हमें विमानवाहक पोत की जरूरत प्रमुखता से है.'

शुरुआत में तुर्की की योजना थी कि वो टीसीजी अनादोलू जैसे जहाजों के लिए F-35 लड़ाकू विमान खरीदे. लेकिन 2019 में अमेरिका ने उसे इस प्रोग्राम से बाहर कर दिया, इसलिए उसे दूसरे विकल्प ढूंढने पड़े.

फिलहाल तुर्की की सेना किजीलेल्मा जैसे स्टेल्थ क्षमता वाले ड्रोन फाइटर जेट, हरजीत और संभावित नौसैनिक संस्करण वाले कान फाइटर जेट का इस्तेमाल करने की योजना बना रही है. इसके अलावा बायरक्तर TB3, जो पहले से ही टीसीजी अनादोलू पर AI-सहायता प्राप्त शॉर्ट टेक-ऑफ क्षमता के साथ तैनात है, उसे भी इस्तेमाल किया जाएगा.

बढ़ेती तुर्की की ताकत

तुर्की के पूर्व राजदूत अल्पर कोस्कुन का कहना है कि यह प्रोजेक्ट दिखाता है कि तुर्की यूरोपीय सुरक्षा ढांचे में मजबूत रक्षा उद्योग क्षमता के साथ अच्छी स्थिति में है.

उन्होंने कहा कि यह विमानवाहक पोत नाटो में तुर्की की स्थिति को मजबूत करेगा, खासकर तब जब अमेरिका अपने सहयोगियों से अधिक योगदान की मांग कर रहा है और यूरोप से दूरी बनाने के संकेत दे रहा है.

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उन्होंने कहा, 'इससे तुर्की की डील करने की ताकत बढ़ेगी लेकिन उसे इसकी कीमत भी चुकानी पड़ेगी. इससे क्षेत्र में तनाव भी बढ़ सकता है और नए खतरे की धारणा पैदा हो सकती है.'

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