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मुल्ला बरादर से हिब्तुल्लाह तक, ये 4 चेहरे संभालते हैं तालिबान का सामरिक-राजनीतिक नेतृत्व

तालिबान के नेता मुल्ला अब्दुल गनी बरादर (Mullah Abdul Ghani Baradar), हिबतुल्लाह अखुंदजादा (Haibatullah Akhundzada), सिराजुद्दीन हक्कानी और मुल्ला याकबू...ये वो नाम हैं जिन्हें आप अगर गूगल सर्च करें तो इनके वर्तमान और अतीत के पन्ने आपके सामने खुल कर आ जाएंगे.

तालिबान का राजनीतिक प्रमुख मुल्ला बरादर (बीच में) अफगानिस्तान का राष्ट्रपति बन सकता है. (फाइल फोटो-PTI) तालिबान का राजनीतिक प्रमुख मुल्ला बरादर (बीच में) अफगानिस्तान का राष्ट्रपति बन सकता है. (फाइल फोटो-PTI)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • मुल्ला उमर का साथी रहा है मुल्ला बरादर
  • 8 सालों तक पाकिस्तान की जेल में रहा
  • हिब्तुल्लाह अखुंजादा तालिबान का सर्वोच्च नेता

अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद दुनियाभर में लोग उन चेहरों को जानना चाह रहे हैं जिनके नेतृत्व में तालिबानी हमलावरों ने अफगानिस्तान की चुनी हुई सरकार को हटा दिया, बड़ी ही आसानी से बेदखल कर दिया और काबुल की सत्ता पर काबिज हो बैठे. 

मुल्ला अब्दुल गनी बरादर (Mullah Abdul Ghani Baradar), हिबतुल्लाह अखुंदजादा (Haibatullah Akhundzada), सिराजुद्दीन हक्कानी, मुल्ला याकबू...ये वो नाम हैं जिन्हें आप अगर गूगल सर्च करें तो इनके वर्तमान और अतीत के पन्ने आपके सामने खुल कर आ जाएंगे.

अभी तालिबान का नेतृत्व इन्हीं के हाथों में है. चर्चा तो यह भी है कि मुल्ला अब्दुल गनी बरादर राष्ट्रपति अशरफ गनी के पद छोड़ने के बाद अफगानिस्तान के अगले राष्ट्रपति हो सकते हैं. काबुल में तो सत्ता हस्तांतरण की तैयारियों जोरों पर है. आइए हम इन नामों और चेहरों को जानते हैं जिनके हाथों में संकट से घिरे अफगानिस्तान का भविष्य हो सकता है.  

मुल्ला अब्दुल गनी बरादर

15 अगस्त को भारत अपनी आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना कर फारिग ही हुआ था कि काबुल से तालिबानियों के कूच की खबरें आने लगी. दो से तीन घंटे गुजरते गुजरते काबुल का पतन (Fall of Kabul) हो चुका था. खबरें आई कि राष्ट्रपति गनी का विमान उनके अंगरक्षकों के साथ अज्ञात ठिकाने की ओर उड़ चुका है और मुल्ला अब्दुल गनी बरादर को सत्ता सौंपने की तैयारियां चल रही है. 

कौन है मुल्ला अब्दुल गनी बरादर जिसने कुख्यात आतंकी मुल्ला उमर की विरासत संभाल रखी है? मुल्ला बरादर तालिबान के संस्थापकों में से एक माना जाता है. 1990 के दशक में जब अफगानिस्तान गृह युद्ध की आग में जल रहा था तो बरादर ने एक आंख वाले मुल्ला उमर और कुछ अन्य लोगों के साथ मिलकर तालिबान को खड़ा किया. मुल्ला बरादर की जवानी कंधार में ही गुजरी थी जहां पर तालिबान पनपा है. 

सोवियत फौजों की आमद ने बदल दी जिंदगी

1970 के दशक में जब सोवियत रूस (USSR) की फौजें अफगानिस्तान आईं तो लाखों अफगानियों की तरह मुल्ला बरादर की जिंदगी भी हमेशा के लिए बदल गई और उसने हथियार उठा लिया. माना जाता है कि मुल्ला बरादर और मुल्ला उमर साथ साथ मिलकर अफगानिस्तान में लड़े हैं. 

चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ तालिबान का नेता मुल्ला बरादर (फोटो-पीटीआई)

रिपोर्ट के अनुसार 2001 में जब 9/11 के बाद अमेरिका और नाटो की  सेनाओं ने अफगानिस्तान में तालिबान का खात्मा कर दिया तो मुल्ला बरादर तालिबानी आतंकियों के एक छोटे से समूह के साथ तत्कालीन अफगान नेता हामिद करजई के साथ समझौता करने गया था. लेकिन बात नहीं बनी. 

8 साल पाकिस्तान में जेल में रहा

मुल्ला बरादर को 2010 में पाकिस्तान में गिरफ्तार कर लिया गया. पाकिस्तान की सरकार ने उसे लंबे समय तक अपने यहां जेल में रखा. आखिरकार 2018 में अमेरिका के दबाव में पाकिस्तान ने उसे रिहा कर दिया. 

इसके बाद मुल्ला बरादर कतर चला गया. यहां पर इसे तालिबान का राजनीतिक नेता नियुक्त किया गया. तालिबान ने यहां अपना दफ्तर बनाया और यहीं से मुल्ला बरादर अमेरिका और पाकिस्तान से राजनीतिक समझौते कर रहा था. 
 
हिबतुल्लाह अखुंदजादा

तालिबान की मौजूदा कमान हिबतुल्लाह अखुंदजादा के पास है. अखुंदजादा तालिबान का सुप्रीम नेता है. साल 2016 में जब अमेरिकी ड्रोन हमले में तालिबान का तत्कालीन सरगना मुल्ला मंसूर अख्तर मारा गया था तो उसके बाद अखुंदजादा ने तालिबान की बागडोर अपने हाथ में ले ली. 

तालिबान में कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ने से पहले अखुंदजादा एक छोटा सा मजहबी नेता था. लेकिन तालिबान की बागडोर संभालने के बाद इसने गजब की नेतृत्व शक्ति दिखाई. 

हिबतुल्लाह अखुंदजादा (फोटो-रॉयटर्स)

तालिबानी लड़ाकों को एक किया

उसने तालिबान की बिखरी हुई ताकत को एक किया और पस्त हो चुके तालिबानी लड़ाकों में हौसले का संचार किया. बता दें कि जब तालिबानी लड़ाकों को ये बात पता चली थी कि मुल्ला उमर की मौत को छिपाया गया है तो इस संगठन में काफी गुटबाजी हुई. इससे इस आतंकी संगठन की शक्ति काफी कमजोर हुई. अखुंदजादा के पास इसे एक करने की चुनौती थी, जो उसने सफलतापूर्वक किया. इसी के तैयार किए हुए आतकियों ने 4 से 5 साल के अंदर अफगानिस्तान सेना को समर्पण करने पर मजबूर कर दिया. पूरी लड़ाई में तालिबानी आतंकियों के सामने कभी भी अफगानी सेना टक्कर देती हुई नहीं दिखी. 

इसके लिए हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने न सिर्फ सामरिक लड़ाई का सहारा लिया बल्कि अपने कूटनीतिक कौशल के बल अफगान सेना के कई कमांडरों को चुपचाप अपने साथ मिला लिया. 

अल जवाहिरी की सरपरस्ती और वफादारी हासिल की

मजहबी छवि होने की वजह से तालिबानी लड़ाकों पर इसकी अपील का बड़ा असर है. तालिबानी इसका अदब करते हैं. तालिबान चीफ बनने के बाद अखुंदजादा ने अल कायदा प्रमुख अयमान अल जवाहिरी की सरपरस्ती और वफादारी हासिल की. जवाहिरी ने इसकी तारीफ की और इसे 'वफादारों का अमीर' कहा.

गजनी प्रांत में तालिबानी लड़ाके (फोटो- पीटीआई)

अल-जवाहिरी की तारीफ ने तालिबानी जिहादियों के बीच अखुंदजादा का रुतबा बढ़ा दिया और इसके नेतृत्व की स्वीकार्यता और मजबूती मिली. अभी तालिबान के राजनीतिक, धार्मिक और युद्ध के मामलों पर अंतिम फैसला अखुंदजादा ही करता है. अखुंदजादा फिलहाल में इस्लामी त्योहारों पर मजहबी तकरीरें करता है. 

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सिराजुद्दीन हक्कानी

सिराजुद्दीन हक्कानी तालिबान का डिप्टी लीडर है और उसी हक्कानी नेटवर्क का प्रमुख है जो पिछले 20 सालों से अमेरिका और नाटो की सेनाओं पर अफगानिस्तान में फिदायीन हमले करता आया है. सिराजुद्दीन हक्कानी सोवियत के खिलाफ लड़ने वाले अहम कमांडरों में से एक जलालुद्दीन हक्कानी का बेटा है. 

फिदायीन हमलों के लिए कुख्यात हक्कानी नेटवर्क

बता दें कि हक्कानी नेटवर्क अमेरिका से ऑपरेट करता है. इस संगठन ने पिछले बीस सालों में काबुल में कई बड़े हमले किए हैं और अफगानिस्तान की सेना को नाकों चने चबवा दिए हैं. हक्कानी नेटवर्क का उद्देश्य अफगानिस्तान की सत्ता हासिल करना है. इस आतंकी संगठन ने अफगानिस्तान के कई बड़े नेताओं की हत्या की है और करवाई है. 
 
मुल्ला याकूब ने तैयार किए कमांडर

तालिबान पर नजर रख रहे लोग मुल्ला उमर को जरूर जानते होंगे. मुल्ला याकूब इसी मुल्ला उमर का बड़ा बेटा है. पाकिस्तान के मदरसों में पढ़ा लिखा मुल्ला याकूब इस समय तालिबान के शक्तिशाली मिलिट्री कमीशन का सदर है. इस कमीशन के तहत कई कमांडर आते हैं जिनकी जिम्मेदारी ग्रुप के कमांडरों को रणनीतिक हमले के लिए तैयार करना और उसे अंजाम तक पहुंचाना था. मुल्ला याकूब बड़े ऑपरेशन के लिए इसका इस्तेमाल करता था. 

मुल्ला उमर का बेटा होने की वजह से तालिबान में इसे बड़ी इज्जत हासिल थी और इसे एक ऐसे चेहरे के तौर पर देखा जाता था जिसमें तालिबानी को एक करने की ताकत थी क्योंकि इसके पिता से तालिबानी लड़ाकों का जुड़ाव था. हालांकि कुछ तालिबान पर नजर रखने वाले कुछ सामरिक विशेषज्ञों का मानना है कि तालिबान में इसकी नियुक्ति महज दिखावा है. 

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