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Taliban History: तालिबान कौन है, काबुल पर उनके कब्जे से इतनी खौफ में क्यों है दुनिया?

राजधानी Kabul पर तालिबान के कब्जे के साथ ही पूरे Afghanistan की सत्ता पर Taliban का नियंत्रण पक्का हो गया है. अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी और उनके प्रशासन के बड़े नेता और अधिकारी देश छोड़कर जा चुके हैं. तालिबान लड़ाके काबुल के प्रमुख जगहों पर कब्जा करते जा रहे हैं. इसी के साथ दुनिया तालिबान के 20 साल पहले के बर्बर शासन को याद कर Save Afghanistan के नारे दे रही है. आखिर ये तालिबान के लोग कौन हैं और इनका इतना खौफ क्यों है?

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तालिबान के कब्जे में अफगानिस्तान तालिबान के कब्जे में अफगानिस्तान
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स्टोरी हाइलाइट्स
  • अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर तालिबान का कब्जा
  • 20 साल बाद फिर तालिबान के हाथ में अफगानिस्तान की सत्ता
  • अफगान राष्ट्रपति देश छोड़कर भागे, सेना के कमांडरों ने किया सरेंडर

पूरी दुनिया मौन होकर देखती रह गई और अफगानिस्तान पूरी तरह से तालिबान के हाथ में चला गया. 15 अगस्त 2021 की सुबह जब भारत में लोग आजादी का जश्न मना रहे थे तब तालिबान के लड़ाके अफगान राजधानी काबुल पर घेरा डाल रहे थे और अफगान नागरिकों की आजादी पर कब्जा पक्का कर रहे थे. पिछले 3 महीनों से जारी लड़ाई में कंधार, हेरात, कुंडूज, जलालाबाद, बल्क समेत अफगानिस्तान के बाकी हिस्से एक-एक कर तालिबान के कब्जे में आते चले जा रहे थे लेकिन राजधानी काबुल में इतनी जल्दी हलचल मचने वाली है इसका अंदाजा शायद ही किसी को था. रविवार की सुबह तालिबान के लोगों ने अचानक काबुल पर घेरा डाला और अफगान सरकार और सेना बिना मुकाबला किए सरेंडर करती दिखी. इस बीच, अमेरिकी डिप्लोमैट्स को आननफानन में काबुल से ले जाते हेलिकॉप्टर की तस्वीर भी पूरी दुनिया ने देखी.

मशीनगनों, रॉकेट लॉन्चर से लैस तालिबान लड़ाके काबुल शहर को घेरते चले गए. बगराम एयरबेस, बगराम जेल पर तालिबान ने कब्जा जमा लिया, काबुल शहर के एंट्री गेट और आसपास के कई अहम इमारतों को एक-एक कर तालिबान लड़ाके कब्जाते चले गए और शाम होते-होते अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी के देश छोड़कर जाने की खबर भी आ गई. इसके बाद तालिबान के प्रवक्ता ने ऐलान कर दिया कि हमारे लड़ाके शहर में घुसकर कानून-व्यवस्था और पुलिस चौकियों को संभालने जा रहे हैं. तालिबान ने हालांकि सेना और आम नागरिकों को सुरक्षा का भरोसा दिलाया कि किसी से बदला नहीं लिया जाएगा लेकिन काबुल से बाहर भागने वालों की लाइन लग गई. शहर से बाहर जाने वाली सड़कों पर भारी ट्रैफिक जाम दिखा. लोग तालिबान के शासन में रहने की बजाय शहर छोड़कर भागते हुए दिखे.

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सत्ता हस्तांतरण के लिए मुल्ला अब्दुल गनी बारादर काबुल में
अफगान सरकार और सेना के सरेंडर करते दिखते ही तालिबान का कमांडर मुल्ला अब्दुल गनी बारादर दोहा से काबुल पहुंच गया. वह सीधे राष्ट्रपति भवन पहुंचा और सत्ता स्थानांतरण को लेकर अफगान राष्ट्रपति गनी से बात की. इसके कुछ देर बाद अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी के देश छोड़कर भागने की खबर आई. खबरों के अनुसार अशरफ गनी और उनके प्रमुख सलाहकार पड़ोसी देश ताजिकिस्तान चले गए. काबुल से भागती गाड़ियां बड़ी संख्या में ताजिकिस्तान, ईरान और बाकी पड़ोसी देशों की सीमाओं की ओर भागती दिखीं. 20 साल पहले तालिबान के बर्बर और मध्ययुगीन शासन को देख चुके लोग कहीं भी बस शरण ले लेना चाहते हैं.

काबुल में अफरा-तफरी का माहौल
देश को मंझधार में छोड़कर भले ही राष्ट्रपति अशरफ गनी के लोग भाग गए हों लेकिन सेना, एयरफोर्स के लोगों के लिए तालिबान के शासन में रहना मौत के खेल से कम बिल्कुल नहीं है. तालिबान के खिलाफ मोर्चा संभाले उपराष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह ने ट्वीट किया कि तालिबान के साथ मिलकर काम करना किसी भी सूरत में संभव नहीं. वहीं एयरफोर्स के पायलट मेजर रहमान रहमानी ने कहा कि आज अगर तालिबान के लोग सेना और पुलिस के लोगों पर जुल्म ना भी करें तो छह महीने बाद ये घर-घर जाएंगे और उनके खिलाफ जंग लड़ने वालों का कत्लेआम करेंगे, उनकी औरतों-बच्चियों के साथ बर्बरता करेंगे. इनके सामने सरेंडर करने की जगह जान दे देना सही है. अफगान की महिला फिल्ममेकर साहरा करीमी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर लाइव हुआ जिसमें वह तालिबान की एंट्री के बाद काबुल छोड़कर जाती दिखीं और दुनिया से अफगान लोगों को बचाने की गुहार लगाती दिखीं.

कैसे शुरू हुई अफगानिस्तान की मुसीबत?
इतिहास शायद ही किसी मुल्क की किस्मत में इतने अजीबो-गरीब तरीके से वक्त के पन्ने पलटता हो, जितना अफगानिस्तान की पहाड़ी-पथरीली जमीन ने देखी है. कभी रूस के समर्थन से चल रहे जहीर शाह के शासन में आधुनिकता की ओर बढ़ रहा अफगानिस्तान 1990 के दशक में तालिबान के मध्ययुगीन शासन को भी देख चुका है. इसके बाद 9/11 के हमले के बाद अमेरिकी और नाटो देशों की सेनाओं ने तालिबान के शासन से मुक्ति दिलाई तो बीस साल में अपने पैरों पर खड़ा होना मुल्क सीख ही रहा था कि तालिबान ने फिर सिर उठा लिया. अप्रैल 2021 में अमेरिका ने ऐलान किया कि सितंबर तक उसके सैनिक लौट जाएंगे, इसके बाद तालिबान ने हमला तेज किया और आज नतीजा सबके सामने है.

जहां-जहां तालिबान का कब्जा होता गया वहां फिर वही शरिया कानून, कोड़े मारने की सजा, सड़कों पर कत्लेआम और दाढ़ी बढ़ाने, संगीत सुनने, महिलाओं पर पाबंदियों जैसे मध्ययुगीन फरमानों का दौर लौटता गया. पूरे देश पर अब फिर तालिबान का कब्जा है और लोग खौफ से फिर घर-बार छोड़कर पड़ोसी मुल्कों में भागने को मजबूर हैं.

कौन है तालिबान? इसकी ताकत क्या है?
अफगानिस्तान से रूसी सैनिकों की वापसी के बाद 1990 के दशक की शुरुआत में उत्तरी पाकिस्तान में तालिबान का उभार हुआ था. पश्तो भाषा में तालिबान का मतलब होता है छात्र खासकर ऐसे छात्र जो कट्टर इस्लामी धार्मिक शिक्षा से प्रेरित हों. कहा जाता है कि कट्टर सुन्नी इस्लामी विद्वानों ने धार्मिक संस्थाओं के सहयोग से पाकिस्तान में इनकी बुनियाद खड़ी की थी. तालिबान पर देववंदी विचारधारा का पूरा प्रभाव है. तालिबान को खड़ा करने के पीछे सऊदी अरब से आ रही आर्थिक मदद को जिम्मेदार माना गया था. शुरुआती तौर पर तालिबान ने ऐलान किया कि इस्लामी इलाकों से विदेशी शासन खत्म करना, वहां शरिया कानून और इस्लामी राज्य स्थापित करना उनका मकसद है. शुरू-शुरू में सामंतों के अत्याचार, अधिकारियों के करप्शन से आजीज जनता ने तालिबान में मसीहा देखा और कई इलाकों में कबाइली लोगों ने इनका स्वागत किया लेकिन बाद में कट्टरता ने तालिबान की ये लोकप्रियता भी खत्म कर दी लेकिन तब तक तालिबान इतना पावरफुल हो चुका था कि उससे निजात पाने की लोगों की उम्मीद खत्म हो गई. 

रूस-अमेरिका के कोल्ड वॉर का बना शिकार!
शुरुआती दौर में अफगानिस्तान में रूसी प्रभाव खत्म करने के लिए तालिबान के पीछे अमेरिकी समर्थन माना गया लेकिन 9/11 के हमले ने अमेरिका को कट्टर विचारधार की आंच महसूस कराई और वो खुद इसके खिलाफ जंग में उतर गया. लेकिन काबुल-कंधार जैसे बड़े शहरों के बाद पहाड़ी और कबाइली इलाकों से तालिबान को खत्म करने में अमेरिकी और मित्र देशों की सेनाओं को पिछले 20 साल में भी सफलता नहीं मिली. खासकर पाकिस्तान से सटे इलाकों में तालिबान को पाकिस्तानी समर्थन ने जिंदा रखा और आज अमेरिकी सैनिकों की वापसी के साथ ही तालिबान ने फिर सिर उठा लिया और तेजी से पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा जमा लिया.

कौन है तालिबान का नेता?
तालिबान कट्टर धार्मिक विचारों से प्रेरित कबाइली लड़ाकों का संगठन है. इसके अधिकांश लड़ाके और कमांडर पाकिस्तान-अफगानिस्तान के सीमा इलाकों में स्थित कट्टर धार्मिक संगठनों में पढ़े लोग, मौलवी और कबाइली गुटों के चीफ हैं. घोषित रूप में इनका एक ही मकसद है पश्चिमी देशों का शासन से प्रभाव खत्म करना और देश में इस्लामी शरिया कानून की स्थापना करना. पहले मुल्ला उमर और फिर 2016 में मुल्ला मुख्तर मंसूर की अमेरिकी ड्रोन हमले में मौत के बाद से मौलवी हिब्तुल्लाह अखुंजादा तालिबान का चीफ है. वह तालिबान के राजनीतिक, धार्मिक और सैन्य मामलों का सुप्रीम कमांडर है. हिब्तुल्लाह अखुंजादा कंधार में एक मदरसा चलाता था और तालिबान की जंगी कार्रवाईयों के हक में फतवे जारी करता था. 2001 से पहले अफगानिस्तान में कायम तालिबान की हुकूमत के दौरान वह अदालतों का प्रमुख भी रहा था. उसके दौर में तालिबान ने राजनीतिक समाधान के लिए दोहा से लेकर कई विदेशी लोकेशंस पर वार्ता में भी हिस्सा लेना शुरू किया.

सत्ता हस्तांतरण की बातचीत के लिए काबुल पहुंचा तालिबान कमांडर मुल्ला अब्दुल गनी बारादर तालिबान में दूसरी रैंक पर है और इसी के अफगानिस्तान का राष्ट्रपति बनने की सबसे ज्यादा संभावना जताई जा रही है. यह तालिबान का राजनीतिक प्रमुख है और दोहा में लगातार अफगानिस्तान को लेकर तालिबान की ओर से बातचीत में शामिल होता रहा है. यह 1994 में बने तालिबान के 4 संस्थापक सदस्यों में से एक था और संस्थापक मुल्ला उमर का सहयोगी रहा है. यह कई लड़ाइयों को कमांड कर चुका है.

20 साल बाद इतना मजबूत कैसे हो गया तालिबान?
साल 2001 से शुरू हुई अमेरिकी और मित्र सेनाओं की कार्रवाई में पहले तालिबान सिर्फ पहाड़ी इलाकों तक ढकेल दिया गया लेकिन 2012 में नाटो बेस पर हमले के बाद से फिर तालिबान का उभार शुरू हुआ. 2015 में तालिबान ने सामरिक रूप से महत्वपूर्ण कुंडूज के इलाके पर कब्जा कर फिर से वापसी के संकेत दे दिए. ये ऐसा वक्त था जब अमेरिका में सेनाओं की वापसी की मांग जोर पकड़ रही थी. अफगानिस्तान से अमेरिका की रूचि कम होती गई और तालिबान मजबूत होता गया. इसी के साथ पाकिस्तानी आतंकी संगठनों, पाकिस्तान की सेना और आईएसआई की खुफिया मदद से पाक सीमा से सटे इलाकों में तालिबान ने अपना बेस मजबूत किया.

अफगानिस्तान से लौटने की अपनी कोशिशों के तहत 2020 में अमेरिका ने तालिबान से शांति वार्ता शुरू की और दोहा में कई राउंड की बातचीत भी हुई. एक तरफ तालिबान ने सीधे वार्ता का रास्ता पकड़ा तो दूसरी ओर बड़े शहरों और सैन्य बेस पर हमले की बजाय छोटे-छोटे इलाकों पर कब्जे की रणनीति पर काम करना शुरू किया. अप्रैल 2021 में अमेरिकी सेनाओं की वापसी के बाइडेन के ऐलान के बाद तालिबान ने मोर्चा खोल दिया और 90 हजार लड़ाकों वाले तालिबान ने 3 लाख से अधिक अफगान फौजों को सरेंडर करने को मजबूर कर दिया. अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी, उनके प्रमुख सहयोगियों, तालिबान से लड़ रहे प्रमुख विरोधी कमांडर अब्दुल रशीद दोस्तम और कई वॉरलॉर्ड्स को ताजिकिस्तान और ईरान में शरण लेना पड़ा है.

अफगानिस्तान के आम लोगों में फिर वही खौफ!
तालिबान के कब्जे के साथ ही काबुल में अफरातफरी मच गई है. लोग शहर छोड़कर भाग रहे हैं. 20 साल बाद सत्ता में लौटे तालिबान को लेकर लोगों में खौफ क्यों है यह जानने के लिए 23 साल पीछे चलना होगा. 1998 में जब तालिबान ने अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर कब्जा कर देश पर शासन शुरू किया तो कई फरमान जारी किए. पूरे देश में शरिया कानून लागू कर दिया गया और न मानने वालों को सरेआम सजा देना शुरू किया. विरोधी लोगों को चौराहों पर लटकाया जाने लगा. हत्या और यौन अपराधों से जुड़े मामलों में आरोपियों की सड़क पर हत्या की जाने लगी. चोरी करने के आरोप में पकड़े गए लोगों के शरीर के अंग काटना, लोगों को कोड़े मारने जैसे नजारे सड़कों पर आम हो गए.

मर्दों को लंबी दाढ़ी रखना और महिलाओं को बुर्का पहनने और पूरा शरीर ढंक कर निकलना अनिवार्य कर दिया गया. घरों की खिड़कियों के शीशे काले रंग से रंगवा दिए गए. टीवी, संगीत और सिनेमा बैन कर दिए गए. 10 साल से अधिक उम्र की लड़कियों के स्कूल जाने पर रोक लगा दी गई. बामियान में बुद्ध की ऐतिहासिक मूर्ति को तोड़कर तालिबान ने धार्मिक कट्टरता भी दुनिया को दिखाई. तालिबान के इस शासन को मान्यता देने वाले तीन देश थे- पाकिस्तान, सऊदी अरब और यूएई.

दुनिया मूकदर्शक बनकर देखती रह गई!
तालिबान की मुख्य ताकत है कट्टर धार्मिक संस्थाएं, मदरसे जो उनके विचार को सपोर्ट कर रहे हैं. यहीं से तालिबान लड़ाके तैयार हो रहे हैं. लेकिन इन सबसे ज्यादा पाकिस्तानी सेना और आईएसआई की सीक्रेट मदद तालिबान के लिए मददगार साबित हुई है. अफगानिस्तान को लेकर अंतरराष्ट्रीय रूख भी असमंजस वाला है. अमेरिका और मित्र देशों की सेनाओं की वापसी के ऐलान ने अफगानिस्तान को जैसे थाली में परोसकर तालिबान के सामने पेश कर दिया. रूस तालिबान को लेकर बहुत स्पष्ट नहीं है. अमेरिकी प्रभुत्व खत्म करने के लिए तालिबान के उभार से जहां रूस खुश है वहीं पड़ोस के ताजिकिस्तान-उजबेकिस्तान जैसे रूसी प्रभाव वाले देशों के लिए खतरे के रूप में भी वह तालिबान को देख रहा है. पाकिस्तान तालिबान के पीछे है और ऐसे में चीन को भी तालिबान शासन में अफगानिस्तान में प्रभाव बढ़ने की संभावना दिख रही है.

भारत की स्थिति काफी संवेदनशील है. भारत पिछले 20 साल में अरबों डॉलर अफगानिस्तान के विकास में निवेश कर चुका था. स्कूल, अस्पताल, बिजली-गैस संयंत्रों समेत कई बड़ी परियोजनाओं पर भारत ने काफी खर्च किया लेकिन अब तालिबान शासन आने से ये सब खत्म हो चुका है. एयर इंडिया के कई विमानों से भारतीयों को स्वदेश लाया जा रहा है. डिप्लोमैट्स को सुरक्षित निकालना बड़ी चुनौती है. तालिबान के पिछले शासन में कंधार विमान कांड की आंच भारत भुगत चुका है.

दुनिया देखती रह गई और तालिबान ने हथियारों के दम पर अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया. अफगानिस्तान के 3 करोड़ 84 लाख लोगों की आजादी, मानवाधिकार के मसले सब बर्बरियत के आगे सरेंडर कर गए. अब लोग इस बात को देखने को उत्सुक हैं कि आने वाले दिनों में क्या तालिबान फिर 20 साल पुरानी बर्बरियत का शासन दिखाएगा या बदले हुए वक्त में उसके कामकाज के तरीकों में कोई बदलाव आएगा और क्या तालिबान शासन में फंसे लोगों की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय कोई कदम उठाने की जहमत करेगा? 

 

  • क्या अफगानिस्तान में तालिबान शासन को भारत को मान्यता देनी चाहिए?

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