सोने-चांदी की कीमतों ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. पहली बार ऐसा हो रहा है, जब हर दिन सोने-चांदी की कीमतों में 5 फीसदी या उससे ज्यादा की वृद्धि हो रही है. लेकिन ये सबकुछ बिना किसी वजह के नहीं हो रहा है बल्कि इसके पीछे ऐसे कारण छिपे हैं, जो दुनिया को एक नए टर्निंग प्वॉइंट की तरफ ले जा सकते हैं. हो सकता है कि अब सोना यानी गोल्ड डॉलर की बादशाहत को हमेशा के लिए खत्म कर दे.
दुनिया इसे De-Dollarization कह रही है, जिसका आसान भाषा में मतलब होता है, डॉलर पर अपनी निर्भरता को खत्म कर देना या कम से कम कर लेना. अगर ऐसा होता है तो इससे दो चीजें होंगी. पहला- इससे दुनिया में अमेरिका का आर्थिक प्रभुत्व खत्म हो जाएगा. अब तक अमेरिका को इसी बात का घमंड था कि दुनिया में होने वाला अधिकतम व्यापार और यहां तक कि कच्चे तेल की खरीद के लिए सारा भुगतान डॉलर में किया जाता था और क्योंकि पूरी दुनिया में डॉलर का ही बोलबाला था इसलिए अमेरिका एक सुपरपावर बना हुआ था.
लेकिन अब जिस तरह से राष्ट्रपति ट्रंप दुनिया के अलग-अलग देशों पर अपनी धौंस जमा रहे हैं, उसके बाद अधिकतर देशों ने ये तय कर लिया है कि वो डॉलर पर अपनी निर्भरता को खत्म कर देंगे या कम से कम कर लेंगे. दूसरा- अगर वाकई में डॉलर की बादशाहत को कोई खतरा पहुंचता है तो अमेरिका इसे बचाने के लिए वो सबकुछ करेगा, जिसकी अभी कल्पना भी नहीं की जा सकती.
राष्ट्रपति ट्रंप पहले ही कह चुके हैं कि वो किसी भी सूरत में इस De-Dollarisation को बर्दाश्त नहीं करेंगे. उनका एकमात्र लक्ष्य यही है कि दुनिया डॉलर में ही व्यापार करती रहे लेकिन मौजूद हालात में ऐसा होता हुआ नहीं दिख रहा और इसके लिए मैं आपको कुछ जरूरी आंकड़े दिखाना चाहती हूं, जिससे आपको ना सिर्फ De-Dollarisation की ये पूरी कहानी समझ आएगी बल्कि ये भी समझ आ जाएगा कि आखिर सोना और चांदी इतने महंगा क्यों हो रहे हैं.
तो ये पूरा खेल शुरू होता है, US BONDS से जिन्हें US Treasuries भी कहा जाता है. अमेरिका कोे जब उधार की जरूरत होती है तो वो इसके लिए US BONDS की नीलामी करता है और ये कहता है कि इन BONDS को खरीदने वाले देशों को वो हर साल ब्याज भी देगा और कुछ सालों के बाद उन देशों से लिया गया पूरा पैसा वापस भी कर देगा. अब ये देश अमेरिका को उधार देने के लिए उसके US BONDS इसलिए खरीद लेते हैं क्योंकि अमेरिका की अर्थव्यवस्था के सामने डूबने का खतरा नहीं है. बुरी से बुरी स्थिति में भी हर देश को ये पता होता है कि उन्होंने अमेरिका को US BONDS के रूप में जो उधार दिया है, वो उधार ना सिर्फ सुरक्षित रहेगा बल्कि इससे उन्हें हर साल ब्याज भी मिलता रहेगा.
लेकिन अब ये कहानी उल्टी घूमने लगी है और हो ये रहा है कि अमेरिका और चीन जैसे देशों ने अमेरिका से जो US BONDS खरीदे थे, उन्हें इन देशों ने बेचना शुरू कर दिया है और इन्हें बेचकर भारत और चाइना को जो पैसा मिल रहा है, उससे वो सोना खरीद रहे हैं और क्योंकि दुनिया के अलग अलग केंद्रीय बैंकों द्वारा बड़ी मात्रा में सोना खरीदा जा रहा है इसलिए सोने की कीमतों में जबरदस्त वृद्धि हो रही हैं.
नवंबर 2024 में भारत के पास 21 लाख 52 हजार करोड़ रुपये के US BONDS थे. लेकिन सिर्फ एक साल में नवंबर 2025 तक भारत ने 4 लाख 36 हजार करोड़ रुपये के US BONDS को बेच दिया यानी US BONDS में भारत ने अपनी हिस्सेदारी को 20.3 प्रतिशत घटा लिया। यही काम चीन ने भी किया। चीन ने नवंबर 2024 से नवंबर 2025 के बीच सिर्फ एक साल 7 लाख 91 हजार करोड़ रुपये के US BONDS बेच दिए. इसी तरह ब्राज़ील ने भी सिर्फ एक साल 5 लाख 60 हज़ार करोड़ रुपये के US BONDS बेच दिए जबकि हॉन्ग-कॉन्ग ने 90 हजार 166 करोड़ रुपये के US BONDS बेच दिए और आयरलैंड ने भी 25 हजार करोड़ रुपये के US BONDS बेच दिए.
अब US BONDS बेचने का सीधा सा मतलब ये है कि इन देशों ने डॉलर को बेचकर उन्हें कैश करा लिया और जानते हैं डॉलर को बेचकर इन देशों के केंद्रीय बैंकों ने क्या खरीदा. इन देशों ने इस पैसे से सोना खरीदा और अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी को ऐतिहासिक रूप से बढ़ा लिया. जैसे सिर्फ चीन और भारत की बात करें तो भारत ने साल 2021 से 2025 के बीच 1 लाख 26 हजार किलोग्राम सोना खरीदा . पहले भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में 7 लाख 54 हजार किलोग्राम सोना था और अब यही 8 लाख 80 हजार किलोग्राम हो गया है. भारत की तरह चीन भी डॉलर बेचकर खूब सोना खरीद रहा है. चीन के केंद्रीय बैंक ने चार सालों में 3 लाख 55 हज़ार किलोग्राम सोना खरीदा है. 2021 में चीन के विदेशी मुद्रा भंडार में 19 लाख 48 हजार किलोग्राम सोना था और अब यही सोना 23 लाख 3 हज़ार किलोग्राम हो गया है.
अब यहां आपके मन में ये सवाल होगा कि आखिर ये देश डॉलर को बेच कर सोना क्यों खरीद रहे हैं तो इसके पीछे बहुत सरल विज्ञान है. डॉलर अमेरिका की करेंसी है, जिसमें अब जोखिम का खतरा बहुत अधिक बढ़ गया है जबकि सोने के साथ ऐसा नहीं है. कल को भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी ज्यादा होगी तो ये सोना संकट की घड़ी में ना तो धोखा देगा, ना ही इसे कोई फ्रीज कर पाएगा और ना ही मुश्किल घड़ी में इससे आर्थिक अनिश्चितता के हालात पैदा होंगे. यही सोचकर कई देशों के केन्द्रीय बैंकों ने US BONDS बेचे और इनकी जगह सोना खरीद लिया.
और आज भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी ऐतिहासिक रूप से 15 प्रतिशत से अधिक हो गई है, जो 2024 की पहली तिमाही में सिर्फ 8.4 प्रतिशत हुआ करती थी जबकि चीन के भी विदेशी मुद्रा भंडार में अब सोेने की कुल हिस्सेदारी 7.7 प्रतिशत हो गई है, जो पहले 4.6 प्रतिशत हुआ करती थी.
यहां डॉलर बेचकर सोना खरीदने वाले सभी देश रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को जरूर धन्यवाद देंगे क्योंकि रूस वही देश है, जिससे दुनिया को ये पता चला कि संकट की घड़ी में अमेरिका डॉलर को फ्रीज़ कर सकता है लेकिन वो गोल्ड को फ्रीज नहीं कर सकता. इसलिए जितना ज्यादा गोल्ड विदेशी मुद्रा भंडार में रहेगा, उतना ही वो देश खुद को मुश्किल समय के लिए तैयार कर पाएगा और भारत और चीन ने ऐसा ही किया है.
हालांकि यहां डॉलर बेचकर सोना खरीदने से सोने के दाम तो ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गए हैं लेकिन इसी दौरान डॉलर की सेहत में अब लगातार गिरावट आ रही है और आप ये भी कह सकते हैं कि डॉलर को De-Dollarisation का फ्लू हो गया है.
पिछले एक साल में डॉलर की वैल्यू में 11 प्रतिशत की कमी आई है. आज भी 'डॉलर' चार सालों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है. राष्ट्रपति ट्रंप अमेरिका को फिर से ग्रेट बनाने चले थे लेकिन कड़वा सच ये है कि राष्ट्रपति ट्रम्प के कार्यकाल में डॉलर को सबसे ज़्यादा चोट पहुंची है.
यहां अमेरिका की एक और समस्या ये है कि पहले दुनिया का 80 प्रतिशत व्यापार डॉलर में हुआ करता था लेकिन अब आज की तारीख में दुनिया का 54 प्रतिशत व्यापार ही डॉलर में हो रहा है और ये आंकड़े अभी और तेजी से नीचे आएंगे.
ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि कई देश अब डॉलर की जगह दूसरी मुद्राओं में व्यापार कर रहे हैं जैसे, चीन, रूस ईरान, ब्राजील और आसियान देशों के साथ 570 लाख करोड़ रुपये का व्यापार युआन में कर रहा है, जो चीन की अपनी करेंसी है. ब्रिक्स देशों में भी ब्राजील, रूस, भारत और दक्षिण अफ्रीका भी कुछ मामलों में डॉलर की जगह अपनी मुद्राओं में व्यापार कर रहे हैं और ये बात राष्ट्रपति ट्रम्प को बहुत परेशान कर रही है.
बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि जिस डॉलर से दुनिया अपनी निर्भरता को कम कर रही है, उसी डॉलर ने अमेरिका को दुनिया की सबसे बड़ी सुपरपावर बनाया है और इसकी शुरुआत दूसरे विश्व युद्ध के बाद हुई थी. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका ने कई देशों से ये कहा कि अगर वो डॉलर को अपनाते हैं तो इन देशों को आसान शर्तों के साथ कर्ज या उधार दिया जाएगा.
उस वक्त 1944 में Bretton Woods में एक बैठक हुई थी, जिसमें अमेरिका ने डॉलर की वैल्यू को सोने से जोड़ दिया था. इससे लोगों को ये लगा कि अगर उन्हें डॉलर के बदले में सोना मिल जाएगा या सोने के बदले में डॉलर मिल जाएगा तो इससे उनकी आर्थिक मुश्किलें कम हो जाएंगी और इसके बदले में डॉलर का इस्तेमाल करने पर उन्हें अमेरिका का भी साथ मिलेगा.
इसी नीति के बाद ना सिर्फ कर्ज देने के लिए डॉलर का इस्तेमाल हुआ बल्कि व्यापार में भी डॉलर की पहुंच काफी बढ़ गई और फिर 1971 में एक बड़ा टर्निंग पॉयंट आया जब अमेरिका ने ये ऐलान किया कि वो डॉलर के बदले में अब सोना नहीं देगा. इससे दुनिया डॉलर पर और ज्यादा निर्भर हो गई और डॉलर पूरी दुनिया की एक कॉमन करेंसी बन गया और दुनिया का हर देश अमेरिकी डॉलर पर निर्भर रहने लगा और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार करने के लिए हर देश को अपने विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर जमा करके रखने पड़े और आज भी ये व्यवस्था चली आ रही है.
लेकिन अब ब्रिक्स जैसे संगठन डॉलर से अपनी निर्भरता को कम करना चाहते हैं और यही बात पूरी दुनिया को एक नए संकट की आहट का अहसास भी करा रही है और यहां देखना यही है कि इस बार डॉलर को दुनिया की करेंसी बनाए रखने के लिए राष्ट्रपति ट्रम्प क्या करेंगे और क्या इस De-Dollarisation के कारण दुनिया में कोई युद्ध भी छिड़ सकता है. ये हम नहीं कह रहे बल्कि ये बातें तो राष्ट्रपति ट्रम्प ने कही है. न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक अब तक राष्ट्रपति ट्रम्प एक साल में 34 बार ये कह चुके हैं, जो देश डॉलर के खिलाफ अभियान चलाएंगे, उन देशों पर वो कड़े प्रतिबंध लागू करेंगे और अमेरिका ऐसे देशों को अपने हितों के खिलाफ मानेगा.
अब क्योंकि कई देशों के केंद्रीय बैंक पहले से अधिक सोना खरीद रहे हैं और दुनिया में राष्ट्रपति ट्रंप की टैरिफ नीति के कारण डर का माहौल है इसलिए बड़े बड़े निवेशक भी अपना ज्यादा से ज्यादा पैसा सोने में लगा रहे हैं और इस वजह से सोने की कीमतों में ऐतिहासिक वृद्धि हो रही है.