अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिश्ते कभी स्थायी नहीं होते, लेकिन फायदे हमेशा स्थायी रहते हैं. साल 2025 से 2026 के बीच घटी घटनाओं ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि वैश्विक कूटनीति में कोई भी कदम बिना किसी कीमत के नहीं होता. भारत के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान जिस तरह दबाव में आया और फिर अमेरिका की मदद से बाहर निकला, उसी का एक साल बाद जवाब उसने अमेरिका को ईरान युद्ध में दिया. यह पूरी कहानी एक तरह से तुम मेरी मदद करो, मैं तुम्हारी मदद करूंगा जैसे समझौते को दिखाती है.
साल 2025 में जब भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों और एयरबेस पर लगातार हमले किए, तब पाकिस्तान के लिए स्थिति बेहद गंभीर हो गई थी. उसके कई अहम सैन्य ठिकाने निशाने पर थे और नुकसान बढ़ता जा रहा था. ऐसे में पाकिस्तान के पास ज्यादा विकल्प नहीं बचे थे. उसे किसी तरह इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए एक मजबूत सहारे की जरूरत थी.
इसी दौरान पाकिस्तान ने अमेरिका का रुख किया. उस समय अमेरिका दोनों देशों के संपर्क में था और हालात को संभालने की कोशिश कर रहा था. पाकिस्तान ने अमेरिका से लगातार संपर्क साधा. रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तान ने 50 से ज्यादा बार कॉल, ईमेल और मीटिंग्स के जरिए ट्रंप प्रशासन से संपर्क किया. इसका मकसद सिर्फ एक था, किसी तरह युद्धविराम कराया जाए.
50 से ज्यादा बार संपर्क कर पाकिस्तान ने मांगा था युद्धविराम
आखिरकार एक समय ऐसा आया जब पाकिस्तान ने सीधे भारत से संपर्क किया और युद्धविराम की दिशा में कदम बढ़ाया गया. हालांकि इस दौरान अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुद को शांति दूत के रूप में पेश किया और इस पूरे घटनाक्रम का श्रेय लेने की कोशिश की. इस घटनाक्रम के बाद पाकिस्तान ने अपनी रणनीति पूरी तरह बदल दी. जो पाकिस्तान पहले अमेरिका के लिए एक अविश्वसनीय सहयोगी माना जाता था, वह धीरे-धीरे ट्रंप के करीब आने लगा. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने ट्रंप के साथ रिश्ते मजबूत करने के लिए हर संभव कोशिश की.
पाकिस्तान ने न सिर्फ ट्रंप को भारत-पाकिस्तान संघर्ष खत्म कराने का श्रेय दिया, बल्कि उनके नाम को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए भी प्रस्तावित किया. हालांकि यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका, लेकिन इससे यह साफ हो गया कि पाकिस्तान अमेरिका को खुश करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है. इस दौरान दोनों देशों के बीच कई स्तरों पर सहयोग बढ़ा. पाकिस्तान ने खुद को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अमेरिका के करीब दिखाने की कोशिश की. इससे उसकी छवि में भी कुछ सुधार हुआ और उसे वैश्विक स्तर पर अलग-थलग पड़ने से राहत मिली.
ईरान युद्ध में फंसे ट्रंप को चाहिए था बाहर निकलने का रास्ता
अब कहानी साल 2026 में पहुंचती है। अप्रैल 2026 में ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध अपने दूसरे महीने में पहुंच चुका था. शुरुआत में ट्रंप को लगा था कि ईरान जल्दी हार मान लेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. ईरान ने जवाबी हमले तेज कर दिए और मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाना शुरू कर दिया. युद्ध लंबा खिंचता जा रहा था और अमेरिका पर इसका दबाव बढ़ता जा रहा था. युद्ध का खर्च तेजी से बढ़ रहा था और अमेरिका के अंदर भी इसका विरोध बढ़ने लगा था. ट्रंप के खिलाफ महाभियोग की मांगें भी उठने लगी थीं. ऐसे में ट्रंप को एक रास्ता चाहिए था जिससे वह इस युद्ध से बाहर निकल सकें.
यहीं पर पाकिस्तान की भूमिका फिर से सामने आती है. ट्रंप को पता था कि पाकिस्तान के ईरान के साथ संबंध हैं और दोनों देशों के बीच संपर्क बना हुआ है. साथ ही पाकिस्तान की ईरान के साथ लंबी सीमा भी है, जो इस मामले में अहम भूमिका निभा सकती थी. रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रंप ने पाकिस्तान पर दबाव डाला कि वह ईरान के साथ युद्धविराम कराने में मदद करे. पाकिस्तान ने इस जिम्मेदारी को स्वीकार किया और बैकचैनल कूटनीति के जरिए काम शुरू किया.
पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर और आईएसआई प्रमुख आसिम मलिक ने इस प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाई. उन्होंने अमेरिका और ईरान दोनों के साथ संपर्क बनाए रखा और बातचीत को आगे बढ़ाने की कोशिश की. हालांकि इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान की भूमिका पूरी तरह स्वतंत्र नहीं थी. एक रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का एक सोशल मीडिया पोस्ट भी विवाद में आ गया. इस पोस्ट में अमेरिका से ईरान पर हमले रोकने की अपील की गई थी, लेकिन इसमें ड्राफ्ट शब्द भी शामिल था, जिससे यह संकेत मिला कि यह संदेश किसी और देश द्वारा तैयार किया गया था.
पाकिस्तान ने निभाई मध्यस्थ की भूमिका, बैकचैनल से बनी बात
बाद में यह भी सामने आया कि इस पोस्ट को व्हाइट हाउस की मंजूरी के बाद ही जारी किया गया था. इससे यह साफ हो गया कि इस पूरी प्रक्रिया में अमेरिका का नियंत्रण काफी हद तक बना हुआ था. अमेरिका की रणनीति साफ थी. ट्रंप को लगता था कि अगर ईरान को युद्धविराम का प्रस्ताव किसी मुस्लिम देश के जरिए मिलेगा, तो उसके स्वीकार करने की संभावना ज्यादा होगी. इसी वजह से पाकिस्तान को इस भूमिका में आगे किया गया. इस बीच चीन की भूमिका भी अहम रही. पाकिस्तान ने चीन से भी संपर्क किया और उसका समर्थन हासिल करने की कोशिश की. चीन, जो ईरान का करीबी सहयोगी है, उसने भी अंत में हस्तक्षेप किया और ईरान को बातचीत के लिए तैयार किया.
इस पूरी प्रक्रिया के बाद युद्धविराम का रास्ता साफ हुआ. ट्रंप को इससे राहत मिली और उन्हें अपनी छवि सुधारने का मौका मिला. वहीं पाकिस्तान को भी एक बड़ी कूटनीतिक सफलता के रूप में इसका फायदा मिला. लेकिन इस पूरी कहानी का असली मतलब इससे कहीं ज्यादा गहरा है. साल 2025 में जब पाकिस्तान मुश्किल में था, तब उसने अमेरिका से मदद मांगी थी. और साल 2026 में जब अमेरिका को जरूरत पड़ी, तो पाकिस्तान ने उसकी मदद की.
एक साल बाद पूरा हुआ कूटनीतिक हिसाब, दोनों ने साधे अपने फायदे
यह एक तरह का कूटनीतिक लेन-देन था, जिसमें दोनों देशों ने अपने-अपने हित साधे. यह दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी से ज्यादा अहमियत हितों की होती है. इस घटनाक्रम ने यह भी साफ कर दिया कि वैश्विक स्तर पर देशों के बीच संबंध कितने जटिल और बदलते हुए होते हैं. एक समय जो देश एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करते, वही समय आने पर एक-दूसरे के सबसे बड़े सहयोगी बन जाते हैं. पाकिस्तान और अमेरिका के बीच यह नई नजदीकी आने वाले समय में और क्या मोड़ लेती है, यह देखना दिलचस्प होगा. फिलहाल इतना जरूर है कि ऑपरेशन सिंदूर से शुरू हुई यह कहानी ईरान युद्ध तक पहुंचते-पहुंचते एक नए अध्याय में बदल चुकी है.