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शांति वार्ता के बदले अमेरिका से 'वसूली' के जुगाड़ में है 'पीसमेकर' पाकिस्तान, दो बार पहले भी भर चुका है जेब

आर्थिक तंगहाली से जूझ रहा पाकिस्तान अब शांति वार्ता की मेजबानी के बदले अमेरिका से भारी वित्तीय मदद की उम्मीद लगाए बैठा है. पाकिस्तान चाहता है कि उसे 1980 और 2000 के दशक की तरह फिर से 'डॉलर' मिलें, लेकिन अब वक्त बदल चुका है. अब युद्ध पाकिस्तान के लिए 'कमाई' नहीं बल्कि खजाना खाली करने वाला 'जोखिम' बन गया है.

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नेशनल कैपिटल कमांड के जरिए इकोनॉमी सुधारने का नया मास्टरप्लान में पाकिस्तान. (फाइल फोटो)
नेशनल कैपिटल कमांड के जरिए इकोनॉमी सुधारने का नया मास्टरप्लान में पाकिस्तान. (फाइल फोटो)

आर्थिक तंगहाली से जूझ रहा पाकिस्तान एक बार फिर अपने पुराने कूटनीतिक पैंतरे पर लौट आया है. शहबाज सरकार को पूरी उम्मीद है कि मिडिल ईस्ट में चल रही शांति वार्ता की मेजबानी करने के बदले अमेरिका उसे मोटा 'इनाम' यानी भारी-भरकम वित्तीय मदद देगा. पाकिस्तान का इतिहास गवाह है कि उसने अपनी जमीन और भूगोल का इस्तेमाल हमेशा सौदेबाजी के लिए किया है. ठीक वैसे ही जैसे 1980 के दशक और फिर 2000 की शुरुआत में उसे अमेरिका से अरबों डॉलर मिले थे, इस बार भी पाकिस्तान वैसी ही बड़ी फंडिंग की आस लगाए बैठा है. लेकिन मौजूदा हालात में उसकी ये 'किरायेदारी' चल पाना मुश्किल लग रहा है.

कड़वी सच्चाई तो यह है कि अब वक्त पूरी तरह बदल चुका है. पहले जब भी इस क्षेत्र में युद्ध होते थे, तो पाकिस्तान की झोली अरबों डॉलर की मदद, कर्ज माफी और मुफ्त के अनुदान से भर जाती थी. यानी तब जंग पाकिस्तान के लिए पैसा बनाने का मौका लेकर आती थी. लेकिन 2026 के ताजा हालात इसके एकदम उलट हैं.

पहले की जंगों ने तो तिजोरी भरी थी, लेकिन मौजूदा तनाव उसके खजाने से अरबों डॉलर बाहर निकाल रहा है. जिस खास लोकेशन का फायदा उठाकर पाकिस्तान दुनिया से 'किराया' वसूलता था, वही लोकेशन अब उसके लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गई है. डर के मारे विदेशी निवेशक भाग रहे हैं, डॉलर का भंडार खाली हो रहा है और पुराने कर्जों की किश्तें चुकाना भी मुमकिन नहीं लग रहा. वहां के स्थानीय मीडिया की एक रिपोर्ट भी इसी तरफ इशारा करती है कि पुरानी चालें अब देश की अर्थव्यवस्था को बचाने में नाकाम साबित हो रही हैं.

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'किराये' के बजाय अब 'जोखिम' बना लोकेशन

विशेषज्ञों का साफ मानना है कि पाकिस्तान ने हमेशा मौकों का फायदा तो उठाया, लेकिन कोई ठोस आर्थिक सिस्टम नहीं बनाया. उसने बड़ी-बड़ी मीटिंग्स तो करवाईं और खूब फोटो भी खिंचवाईं, लेकिन उन मौकों को कभी पक्की बिजनेस डील में नहीं बदल पाया. न तो कोई तेल के बड़े कॉन्ट्रैक्ट हुए और न ही कोई बड़ा निवेश आ पाया. नतीजा यह हुआ कि जब तक जंग रही, तब तक पैसा आया, लेकिन मामला शांत होते ही पाकिस्तान की इकोनॉमी फिर से फर्श पर आ गई.  हालांकि, पाकिस्तान के पास मौकों की कमी नहीं है, बस उसे सही दिशा में काम करने की जरूरत है.

अब वहां के गलियारों में यह मांग जोर पकड़ रही है कि मुल्क को 'नेशनल कैपिटल कमांड' (NCC) जैसे एक मजबूत सिस्टम की जरूरत है. इसका मकसद एक ऐसी सिंगल विंडो तैयार करना है, जहां कागजी कार्रवाई महज 90 दिनों में पूरी हो जाए और हर कूटनीतिक मुलाकात सिर्फ फोटो खिंचवाने तक सीमित न रहकर किसी बड़ी बिजनेस डील में बदल सके. आर्थिक जानकारों ने तो 'रेड अलर्ट' तक जारी कर दिया है कि अगर अपनी भौगोलिक स्थिति को कमाई के जरिए में नहीं बदला गया, तो आने वाले वक्त में भारी नुकसान उठाना पड़ेगा. अब देखना यह है कि क्या अमेरिका फिर से पुरानी तरह से मदद का हाथ बढ़ाएगा या इस बार पड़ोसी देश को अपनी कमाई का कोई नया रास्ता खुद ही तलाशना होगा

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