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कई भाषाओं के जानकार, वफादार और AI के पैरोकार... ईरान में खामेनेई की जगह लेने वाले अराफी कैसे आदमी हैं?

अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद ईरान ने संविधान का अनुच्छेद 111 लागू कर तीन सदस्यीय अंतरिम परिषद बना दी है, जिसमें राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन, न्यायपालिका प्रमुख घोलामहोसैन मोहसिनी एजई और गार्जियन काउंसिल से चुने गए अयातुल्लाह अलीरेजा अराफी शामिल हैं. यह परिषद स्थायी सुप्रीम लीडर चुने जाने तक देश की पूरी कमान संभालेगी.

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अराफी को धार्मिक और तकनीकी रूप से एक शिक्षित और भरोसेमंद नेता माना जाता है. (Photo: X/Social Media)
अराफी को धार्मिक और तकनीकी रूप से एक शिक्षित और भरोसेमंद नेता माना जाता है. (Photo: X/Social Media)

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत की पुष्टि के बाद ईरान ने अपने संविधान के अनुच्छेद 111 को लागू कर दिया है. न्यूज एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस कानून के तहत अगर देश में अचानक सुप्रीम लीडर नहीं रहता, तो तीन सदस्यों की एक अस्थायी परिषद बनाई जाती है, जो स्थायी उत्तराधिकारी चुने जाने तक सभी सर्वोच्च अधिकार संभालती है.

ईरान में अब क्या हो रहा है?

ईरान के संविधान के अनुसार इस अंतरिम परिषद में मौजूदा राष्ट्रपति, न्यायपालिका प्रमुख और गार्जियन काउंसिल से चुना गया एक धार्मिक विधि विशेषज्ञ शामिल होता है. अयातुल्लाह अलीरेजा अराफी को गार्जियन काउंसिल के प्रतिनिधि के रूप में इस तीसरे अहम पद पर नियुक्त किया गया है. इससे वह इस समय ईरान के तीन सबसे ताकतवर लोगों में शामिल हो गए हैं.

अब यह आपातकालीन तीन सदस्यीय नेतृत्व पूरा हो चुका है. अराफी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और न्यायपालिका प्रमुख घोलामहोसैन मोहसिनी एजई के साथ मिलकर देश का नेतृत्व करेंगे. पहले जो सभी अधिकार अकेले खामेनेई के पास थे, अब अस्थायी रूप से इन तीनों के पास रहेंगे.

कौन हैं अलीरेजा अराफी?

अब यह जान लेते हैं कि ईरान के नए अंतरिम सुप्रीम लीडर अलीरेजा अराफी कौन हैं. 1959 में जन्मे 67 वर्षीय अराफी ईरान के धार्मिक ढांचे में एक बड़ा नाम माने जाते हैं. इस नियुक्ति से पहले भी उनके पास तीन अहम पद थे. वे देशभर की इस्लामी सेमिनरी प्रणाली के निदेशक हैं, गार्जियन काउंसिल के सदस्य हैं और असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स के भी सदस्य हैं.

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कई भाषाओं के जानकार, AI के पैरोकार

क़ोम की पारंपरिक धार्मिक व्यवस्था से जुड़े होने के बावजूद अराफी को थोड़ा अलग तरह का नेता माना जाता है. उन्हें शिक्षित, कई भाषाएं जानने वाला और तकनीक की समझ रखने वाला धर्मगुरु बताया जाता है. वह एआई जैसी नई तकनीकों के जरिए इस्लामी विचारधारा को दुनिया भर में फैलाने की जरूरत पर भी बोलते रहे हैं.

आईआरजीसी और नेतृत्व के भरोसेमंद

इस उथल-पुथल भरे दौर में अराफी की नियुक्ति को व्यवस्था की निरंतरता का संकेत माना जा रहा है. अल-मुस्तफा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के प्रमुख के रूप में काम कर चुके अराफी को आईआरजीसी और राजनीतिक नेतृत्व का भरोसेमंद वफादार माना जाता है, जो मौजूदा नीतियों में कोई बड़ा बदलाव नहीं करेंगे, खासकर जब देश युद्ध जैसी स्थिति का सामना कर रहा है.

अराफी और उनके दो सह-नेता स्थायी व्यवस्था नहीं हैं. उनका मुख्य काम देश को संभालना और अमेरिका व इजरायल के खिलाफ चल रहे संघर्ष के दौरान हालात को नियंत्रित रखना है, जब तक कि 88 सदस्यीय असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स खामेनेई के स्थायी उत्तराधिकारी का चुनाव नहीं कर लेती.

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