"माननीय अध्यक्ष महोदय, आदरणीय सदस्य माननीय विष्णु पांडे, मैं अभी इसी वक्त उनको चुनौती देता हूं कि किसी भी स्तर पर, किसी भी जगह पर जाकर विषय वो तय करेंगे." शब्द यही थे. हिंदी में. एकबारगी पढ़कर यही लगता है कि ये भारत के किसी सदन की कार्यवाही का हिस्सा है. लेकिन ये आधा सच है. ये बहस भारत की नहीं है.
भारत से हजारों किलोमीटर दूर इस देश की संसद में सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष के बीच हुई बहस भारत में चर्चा का विषय बन गई. यू तों ये बहस उस देश के मुद्दों पर ही थी. लेकिन हिंदी में हुई इस बातचीत को सुनकर ऐसा लगता है कि जैसे ये भारत के संसद की बात हो.
पक्ष-विपक्ष के बीच हिंदी में ये टकराव गुयाना की संसद में हुई है. गुयाना में भारत के उच्चायुक्त ने इस वीडियो को एक्स पर पोस्ट किया है.
दरअसल गुयाना की संसद में हिंदी में हुई इस चर्चा ने सबका ध्यान खींचा है.
यहां गुयाना के कृषि राज्य मंत्री और भारतीय मूल के सांसद विकास रामकिसून पर विपक्षी सदस्यों ने हिंदी बोलने की क्षमता पर सवाल उठाया.
विपक्षी सांसद विष्णु पांडे समेत दूसरे सांसदों ने दावा किया कि रामकिसून को हिंदी नहीं आती या उनकी समझ कम है.
🚨 Hindi dominates Guyana Parliament
— Megh Updates 🚨™ (@MeghUpdates) February 10, 2026
After the Opposition questioned his Hindi-speaking ability, MP Vikash Ramkisoon HIT BACK in fluent Hindi, saying: “Main unhe chunauti deta hoon, vishay woh tay karenge, aur main abhi bina kagaz ke debate karoonga.” 🔥 pic.twitter.com/FkbIek5dbp
इस आरोप पर रामकिसून उखड़ गए. स्पीकर से अनुमति लेकर रामकिसून ने तुरंत शुद्ध हिंदी में जवाब दिया, "माननीय अध्यक्ष महोदय, आदरणीय सदस्य माननीय विष्णु पांडे, मैं अभी इसी वक्त उनको चुनौती देता हूं कि किसी भी स्तर पर, किसी भी जगह पर जाकर, विषय वो तय करेंगे और जितनी भी बहस वह करना चाहते हैं, वो तय करेंगे, मैं जाकर बिना कागज देखकर डिबेट करूंगा."
रामकिसून की इस चुनौती से गुयाना की संसद में सन्नाटा छा गया.
भारत और गुयाना के रिश्ते
गुयाना दक्षिण अमेरिका के उत्तर-पूर्वी तट पर स्थित एक छोटा देश है, यहां की लगभग 40% आबादी भारतीय मूल की है. गुयाना भारत से लगभग 14,000 से 15,000 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.
यहां की संस्कृति में भारतीय प्रभाव बहुत गहरा है. नवंबर 2024 में पीएम नरेंद्र मोदी ने गुयाना की संसद को संबोधित किया था. यहां के संसद और सार्वजनिक जीवन में हिंदी का प्रयोग कई बार देखने को मिलता है.
भारत से लगभग 210 साल पहले बिहार उत्तर प्रदेश के लोग बतौर गिरमिटिया मजदूर बनकर गुयाना पहुंचे थे. तब अंग्रेजी सरकार कृषि कार्यों के लिए उन्हें गुयाना लेकर गई थी. 1917 तक उत्तर प्रदेश और बिहार से लगभग 2.4 लाख भारतीय चीनी बागानों में काम करने के लिए गुयाना पहुंचे थे. संघर्षों की सतत कहानियां, जीवटता और कठिन परिश्रम से इन भारतीयों ने गुयाना की जमीन पर अपनी छाप छोड़ी और उस देश की मुख्यधारा में शामिल हो गए. सबसे अहम बात यह रही कि तमाम दुश्वारियों के बावजूद उन्होंने अपनी सांस्कृतिक विरासत को जिंदा रखा.