
2026 की शुरुआत दुनिया के लिए किसी रियलिटी शो से कम नहीं रही. साल के शुरुआती दिनों में ही एक सनसनीखेज घटना सामने आई, जब अमेरिकी स्पेशल फोर्सेज के एक ऑपरेशन में वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को अगवा कर लिया गया. इस ऑपरेशन को डोनाल्ड ट्रंप ने 'ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व' नाम दिया.
इस कार्रवाई के करीब दो हफ्ते बाद भी यह साफ नहीं था कि अमेरिका अब अगला हमला किस देश पर करेगा. क्या निशाने पर ईरान होगा, जो लंबे समय से अमेरिका का दुश्मन रहा है. या फिर ग्रीनलैंड, जो नाटो सदस्य डेनमार्क का हिस्सा है.
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की आक्रामक बयानबाजी ने यूरोप को बुरी तरह चिंतित कर दिया है. हालात ऐसे बन गए हैं कि अब कुछ यूरोपीय नेताओं को रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी पहले से कम खतरनाक लगने लगे हैं.
यह भी पढ़ें: ग्रीनलैंड पर ट्रंप करना चाहते हैं कब्जा... लेकिन क्या इससे खुश हैं अमेरिकन? सर्वे में चौंकाने वाला खुलासा
16 जनवरी को जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने विदेश नीति में बड़े बदलाव का संकेत दिया. उन्होंने यूरोपीय संघ से रूस के साथ रिश्तों को फिर से संतुलित करने की बात कही. हैरानी की बात यह है कि महज एक महीने पहले तक मर्ज पुतिन पर सोवियत संघ को दोबारा खड़ा करने का आरोप लगा रहे थे. तब उन्होंने कहा था कि अगर यूक्रेन गिरा, तो पुतिन यहीं नहीं रुकेंगे.
लेकिन 2026 में हालात बदल चुके हैं. अब ट्रंप ऐसे नेता के तौर पर दिख रहे हैं, जो रुकने वाले नहीं हैं.

ट्रंप की नई सोच को लोग 'डोनरो डॉक्ट्रिन' कह रहे हैं. यह नाम 1823 की मुनरो डॉक्ट्रिन से जुड़ा है, जिसमें अमेरिका ने पूरे अमेरिकी महाद्वीप को अपना प्रभाव क्षेत्र बताया था. ट्रंप के नजरिए में अमेरिका उनका 'बैकयार्ड' है, जबकि ग्रीनलैंड 'फ्रंटयार्ड.'
ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड नहीं लिया, तो रूस या चीन इसे हासिल कर लेंगे, और ऐसा होने नहीं दिया जाएगा. ट्रंप का मानना है कि ग्रीनलैंड उनके 'गोल्डन डोम' मिसाइल डिफेंस सिस्टम के लिए बेहद जरूरी है. शीत युद्ध के दौर से ही अमेरिका ने वहां मिसाइल ट्रैकिंग रडार लगा रखे हैं, ताकि रूस से आर्कटिक के रास्ते आने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों पर नजर रखी जा सके.
ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, जो आकार में भारत के करीब दो-तिहाई के बराबर है. इसके पीछे कई वजहें गिनाई जाती हैं. यह खनिजों और रेयर अर्थ मेटल्स से भरपूर है. इसके अलावा यह नॉर्थवेस्ट पैसेज के पश्चिमी सिरे पर स्थित है.
यह भी पढ़ें: ग्रीनलैंड पर तकरार बढ़ी, चिढ़े बैठे ट्रंप ने 8 देशों पर लगाया 10% टैरिफ, फ्रांस बोला- धमकियों से नहीं डरते
जैसे-जैसे बर्फ पिघलेगी, आने वाले वर्षों में यह समुद्री रास्ता खुल सकता है, जिससे पूर्वी एशिया और यूरोप के बीच जहाजों की यात्रा का समय काफी कम हो जाएगा. इससे पारंपरिक हिंद महासागर मार्ग की जरूरत भी घट सकती है. अमेरिका पहले से ही इस रास्ते के दूसरे सिरे अलास्का में मौजूद है.
हालांकि सवाल यह उठता है कि अमेरिका इन सभी रणनीतिक फायदों को डेनमार्क से समझौता करके भी हासिल कर सकता है. डेनमार्क का कहना है कि अमेरिका ने उल्टा ग्रीनलैंड में अपने कई पुराने सैन्य अड्डे बंद कर दिए हैं. फिलहाल सिर्फ पिटुफिक स्पेस बेस ही सक्रिय है.
ऐसे में ट्रंप के ग्रीनलैंड को सीधे खरीदने या कब्जाने की जिद के पीछे एक ही वजह बचती है - मैनिफेस्ट डेस्टिनी. यह 19वीं सदी की वह सोच थी, जिसके मुताबिक अमेरिका का विस्तार होना तय और जायज माना जाता था.

यह विचार राष्ट्रपति जेम्स के पोल्क के दौर में उभरा. उनके कार्यकाल में अमेरिका ने करीब 10 लाख वर्ग मील जमीन जोड़ी. उन्होंने ब्रिटेन से ओरेगन लिया और मेक्सिको से टेक्सास और कैलिफोर्निया जीतकर अमेरिका को समुद्र से समुद्र तक फैला दिया.
असल में अमेरिका अपने इतिहास में एक तरह का रियल एस्टेट साम्राज्य भी रहा है. उसने अपने कुल क्षेत्रफल का करीब 40 फीसदी हिस्सा खरीद के जरिए हासिल किया. 1803 में फ्रांस से लुइसियाना 15 मिलियन डॉलर में खरीदा गया. 1867 में रूस से अलास्का 7.2 मिलियन डॉलर में लिया गया.
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने ग्रीनलैंड की रणनीतिक अहमियत को समझा. यह ग्रीनलैंड-आइसलैंड-ब्रिटेन गैप पर स्थित है, जहां से होकर सोवियत जहाज अटलांटिक महासागर में जाते थे. अमेरिका ने डेनमार्क को ग्रीनलैंड खरीदने का गुप्त प्रस्ताव दिया, लेकिन उसे ठुकरा दिया गया. इसके बाद अमेरिका ने वहां सैन्य ठिकाने बनाए.
यह भी पढ़ें: ग्रीनलैंड में PM की अगुवाई में ट्रंप के खिलाफ सड़कों पर उतरे लोग, ‘अमेरिकी कब्जे’ के दावे पर उबाल
अब जब शीत युद्ध के बाद की दुनिया में फिर से महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है, मैनिफेस्ट डेस्टिनी की सोच लौटती दिख रही है. ट्रंप के लिए ग्रीनलैंड सिर्फ रणनीतिक जरूरत नहीं, बल्कि विरासत का सवाल है. एक रिपब्लिकन सांसद तो ग्रीनलैंड को अमेरिका में मिलाने का बिल भी पेश कर चुका है. यह सब ऐसे समय में हो रहा है, जब अमेरिका अपने इतिहास के सबसे अहम पड़ाव की ओर बढ़ रहा है.
4 जुलाई 2026 को अमेरिका अपनी आजादी के 250 साल पूरे करेगा. इस मौके पर बड़े समारोह की योजना है. ट्रंप इन आयोजनों की अगुवाई करेंगे. व्हाइट हाउस में एक भव्य नया स्टेट बॉलरूम भी बनाया जा रहा है.
ऐसे में अगर ट्रंप 4 जुलाई को ग्रीनलैंड को अमेरिका का 51वां राज्य घोषित कर देते हैं, तो यह उनके लिए एक ऐतिहासिक घोषणा हो सकती है. इससे वे खुद को 21वीं सदी के जेम्स पोल्क के तौर पर पेश कर सकेंगे. एक न्यूयॉर्क के अरबपति रियल एस्टेट कारोबारी के लिए इससे बड़ी विरासत शायद और कोई नहीं हो सकती