अफ्रीका के कांगो देश में एक बार फिर इबोला वायरस का प्रकोप शुरू हो गया है. अफ्रीका के सबसे बड़े स्वास्थ्य संगठन अफ्रीका सीडीसी ने शुक्रवार को इसकी पुष्टि की है. अब तक 246 संदिग्ध मामले सामने आए हैं और 65 लोगों की मौत हो चुकी है.
यह कांगो में इबोला का 17वां प्रकोप है. यह बीमारी बहुत खतरनाक होती है और जल्दी फैलती है. इसके साथ ही पड़ोसी देश युगांडा और दक्षिण सूडान तक फैलने का भी डर है. लोगों के बीच दहशत फैल गई है.
इबोला एक बहुत खतरनाक वायरस से होने वाली बीमारी है. यह बीमारी दुर्लभ है लेकिन बहुत गंभीर और अक्सर जानलेवा होती है. यह एक इंसान से दूसरे इंसान में शरीर के तरल पदार्थों जैसे खून, उल्टी या वीर्य के संपर्क में आने से फैलती है. इसका कोई पक्का इलाज अभी तक नहीं है लेकिन वैक्सीन उपलब्ध है.
अभी क्या हुआ है?
यह प्रकोप कांगो के इटूरी प्रांत में फैला है जो देश के पूर्वी हिस्से में एक बहुत दूरदराज का इलाका है. यह राजधानी किंशासा से 1000 किलोमीटर से भी ज्यादा दूर है. अफ्रीका सीडीसी ने बताया कि मुख्य रूप से मोंगवालू और रवाम्पारा स्वास्थ्य क्षेत्रों में मामले और मौतें सामने आई हैं.
20 नमूनों में से 13 में इबोला वायरस की पुष्टि हो चुकी है. इटूरी की राजधानी बुनिया में भी कुछ संदिग्ध मामले मिले हैं जिनकी जांच जारी है.
यह इलाका इतना खतरनाक क्यों है?
इटूरी प्रांत कई वजहों से बहुत मुश्किल इलाका है. यहां सड़कें बहुत खराब हैं जिससे मदद पहुंचाना मुश्किल होता है. यहां सोने की खदानें हैं जिनकी वजह से बहुत सारे मजदूर आते-जाते रहते हैं और बीमारी फैलने का खतरा बढ़ जाता है. इलाके में हिंसा भी है. एलाइड डेमोक्रेटिक फ़ोर्स नाम का एक आतंकी संगठन जो इस्लामिक स्टेट से जुड़ा है, यहां और आसपास के इलाकों में हमले करता रहता है.
पड़ोसी देशों को खतरा क्यों है?
इटूरी प्रांत युगांडा और दक्षिण सूडान की सीमा के पास है. अफ्रीका सीडीसी ने कहा है कि लोगों की आवाजाही बहुत ज्यादा है जिससे बीमारी सीमा पार कर सकती है. इसीलिए शुक्रवार को एक आपातकालीन बैठक बुलाई गई जिसमें कांगो, युगांडा और दक्षिण सूडान के स्वास्थ्य अधिकारी, UN (संयुक्त राष्ट्र) एजेंसियां और अन्य देश शामिल हुए.
इस बैठक में यह तय किया गया कि सीमा पार निगरानी कैसे की जाए, टेस्टिंग और वैक्सीन कैसे पहुंचाई जाए और संक्रमित लोगों के संपर्क में आए लोगों को कैसे ट्रैक किया जाए.
कांगो में इबोला का इतिहास क्या है?
इबोला बीमारी की खोज सबसे पहले 1976 में कांगो में ही हुई थी. तब से अब तक यह कांगो में 17 बार फट चुका है. 2018 से 2020 के बीच पूर्वी कांगो में एक बड़ा प्रकोप हुआ था जिसमें 1000 से ज्यादा लोग मारे गए थे.
इसी साल यानी 2025 में भी एक प्रकोप हुआ था जो तीन महीने चला और 43 लोगों की जान गई. उसके पांच महीने बाद यह नया प्रकोप सामने आया है. 2014 से 2016 के बीच पश्चिम अफ्रीका में इबोला के एक बड़े प्रकोप में 11000 से ज्यादा लोग मारे गए थे.
कांगो के लिए यह और भी मुश्किल क्यों है?
कांगो अफ्रीका का दूसरा सबसे बड़ा देश है लेकिन वहां बीमारियों से लड़ना हमेशा बहुत मुश्किल रहा है. देश के पूर्वी हिस्से में M23 जैसे कई सशस्त्र गुट सक्रिय हैं जिन्होंने जनवरी से बड़े शहरों पर कब्जा कर रखा है. पिछले साल के प्रकोप के दौरान WHO को वैक्सीन पहुंचाने में भारी दिक्कत हुई थी क्योंकि रास्ते बंद थे और पैसे की कमी थी. इस बार भी वही चुनौती सामने है.