मंगलवार को दावोस में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी का भाषण आने वाले वक्त में ग्लोबल डिप्लोमेसी का एक अहम मोड़ माना जाएगा. इसे उस ऐतिहासिक पल के तौर पर देखा जाएगा, जब जी-7 के किसी नेता ने पहली बार खुले मंच से वेस्टर्न ऑर्डर की हिपोक्रेसी पर सवाल उठा दिए.
कार्नी के भाषण पर खूब तालियां बजीं जिसमें अमेरिका की असहज चुप्पी भी दिखी. असल में कार्नी ने वही बात सार्वजनिक तौर पर कह दी, जो दुनिया के नेता अमेरिका की 'डायनासोर डिप्लोमेसी' के उभार के बाद से बंद कमरों में कहते आ रहे थे.
कार्नी ने अमेरिका के पाखंड का पर्दाफाश ऐसे समय में किया है जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दोस्त-दुश्मन का फर्क किए बिना सबके साथ सख्त और धमकी भरा रवैया अपना रहे हैं.
दुनियाभर पर टैरिफ लगाने के बाद ट्रंप अब ग्रीनलैंड पर कब्जे की बातें कर रहे हैं. वो इस रास्ते में आने वालों को सजा देने की धमकी दे रहे हैं, यहां तक कि फ्रांस जैसे नाटो सहयोगियों को भी धमका चुके हैं.
कनाडा भी इससे अछूता नहीं रहा. ट्रंप ने कनाडा को '51वां राज्य' बनाने की बात कही, कनाडाई सामान पर 25 फीसदी टैरिफ की धमकी दी और यह जताया कि कनाडा की संप्रभुता पर भी सौदेबाजी की जा सकती है. जो देश सात दशक तक अमेरिका का सबसे भरोसेमंद साथी रहा, उसके लिए ट्रंप का यह रवैया महज धमकी नहीं बल्कि अपमान भी है.
ऐसे में दावोस से बेहतर मंच और क्या हो सकता था, यह बताने के लिए कि अमेरिका के साथ वफादारी निभाने का अब कोई फायदा नहीं रहा.
करीब सत्तर साल तक पश्चिमी देश यह दिखाते रहे कि सब देशों के लिए नियम बराबर हैं. कहानी यही रही कि अमेरिका एक ऐसी महाशक्ति है जो दूसरों पर वही नियम लागू करता है जिसे वो खुद मानता है. दावोस में कनाडाई पीएम कार्नी ने इस दिखावे की बखिया उधेड़ दीं.
उन्होंने कहा, 'अंतरराष्ट्रीय नियम-आधारित व्यवस्था की कहानी कभी पूरी तरह सच नहीं थी. ताकतवर देश सुविधा के अनुसार खुद को छूट देते रहे, व्यापार नियम असमान रूप से लागू हुए और अंतरराष्ट्रीय कानून की कठोरता आरोपी या पीड़ित के हिसाब से बदलती रही.' उनके इस भाषण पर उभरते देशों के प्रतिनिधियों ने तालियां बजाईं, जबकि पश्चिमी देशों के चेहरों पर सन्नाटा साफ दिखा.
सीधी भाषा में कहें तो यह तथाकथित 'रूल्स-बेस्ड ऑर्डर' हमेशा ऐसा रहा जिससे अमेरिका को फायदा होता रहे.
यह मानकर कि सबसे ताकतवर देश यानी अमेरिका अपनी सुविधा से नियम तोड़ता रहा, कार्नी ने मझोले देशों की बरसों पुरानी शिकायतों को सही ठहरा दिया. भारत जैसे देशों को नियमों का पाठ पढ़ाया गया, लेकिन वही नियम व्यापार, जलवायु और तेल खरीद के मामलों में पश्चिम ने खुद नहीं माने. कार्नी ने यह बात कहकर पश्चिमी देशों के पाखंड को स्वीकार किया.
कार्नी ने यह भी कहा कि अमेरिका के वर्चस्व के दौर में सबको फायदा होता रहे, इसलिए पश्चिमी देश कथनी और करनी के फर्क पर आंखें मूंदे रहे.
कार्नी ने अपने भाषण के दौरान सबसे चालाकी वाली बात ये की कि बिना ट्रंप का नाम लिए उन्हें दुनिया में उथल-पुथल पैदा करने वाला बता दिया.
उन्होंने कहा कि बीते बीस सालों में वित्त, स्वास्थ्य, ऊर्जा और भू-राजनीति के संकटों ने जरूरत से ज्यादा वैश्वीकरण के खतरे दिखा दिए हैं. अब बड़ी ताकतें आर्थिक रिश्तों को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही हैं, टैरिफ दबाव का जरिया बन गए हैं, वित्तीय सिस्टम डराने का औजार है और सप्लाई चेन को कमजोरी की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है.
उनका साफ कहना था कि यह बदलाव नहीं, बल्कि व्यवस्था में आई गहरी दरार है.
बंद कमरों में दुनिया के और नेता भी ट्रंप को लेकर यही बातें कर रहे होंगे. ग्रीनलैंड को लेकर जुनून, फ्रांस को चुप कराने की धमकी, कनाडा पर टैरिफ या कब्जे की बातें, और भारत पर सप्लाई चेन के जरिए दबाव, दुनिया ट्रंप की सौदेबाजी वाली राजनीति से घबराई हुई है, लेकिन खुलकर बोल नहीं पा रही.
आमतौर पर कनाडा अमेरिकी वर्चस्व का सबसे बड़ा समर्थक रहा है, क्योंकि उसे सुरक्षा का फायदा मिलता रहा. लेकिन कार्नी का रुख बताता है कि अब स्थिरता के बदले चुप रहना मुश्किल हो गया है.
मतलब साफ है- जब सुरक्षित समुद्री रास्ते, स्थिर फाइनेंस और भरोसेमंद व्यापार जैसी चीजें दबाव और धमकी में बदल जाएं, तो साथ निभाने की वजह भी खत्म हो जाती है.
अमेरिकी वर्चस्व पर सवाल उठाकर कार्नी दुनिया से कह रहे हैं- अब हर देश को अपना रास्ता खुद देखना होगा.
कनाडा अमेरिका का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है, नाटो का सहयोगी है और सांस्कृतिक रूप से भी बेहद करीबी है. जब ऐसा दोस्त कहे कि तुम बदमाशी पर उतर आए हो, तो उसकी बात दुश्मन से ज्यादा चुभती है.
कार्नी ने अमेरिका से इतर एक अलग वर्ल्ड ऑर्डर के लिए सोच और नैतिक आधार दे दिया है. छोटे, मझोले और विकासशील देशों के लिए यह भाषण किसी राहत से कम नहीं. यह दिखाता है कि अमेरिका के सबसे करीबी दोस्त भी अब शब्दों और हकीकत के फर्क से तंग आ चुके हैं.
संदेश साफ है- राजा नंगा है. और अगर उसका सबसे करीबी दोस्त यह कह सकता है, तो बाकी दुनिया भी कह सकती है.
कार्नी कहते हैं कि कनाडा जैसे मझोले देशों के सामने सवाल यह नहीं है कि बदलना है या नहीं क्योंकि बदलना तो पड़ेगा. असली सवाल यह है कि क्या हम सिर्फ दीवारें ऊंची करेंगे या मिलकर कुछ बड़ा करने की कोशिश करेंगे.
उनके शब्दों में, मझोले देशों को साथ आना होगा, क्योंकि अगर हम टेबल पर नहीं बैठे तो हमें थाली में परोस दिया जाएगा.
अमेरिका से इतर दुनिया एक झटके में नहीं बनेगी. लेकिन जनवरी 2026 का दावोस शायद वही पल माना जाए, जब यह तय हो गया कि बदलाव तो होकर रहेगा, अब यह टलने वाला नहीं है.