प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी BRICS समिट में शामिल होने के लिए मंगलवार सुबह दक्षिण अफ्रीका के लिए रवाना हो गए हैं. जोहान्सबर्ग में होने वाली इस समिट में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी शामिल होंगे. हालांकि, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इस समिट में वर्चुअली हिस्सा लेंगे.
रूसी राष्ट्रपति इसलिए वर्चुअली जुड़ेंगे ताकि दक्षिण अफ्रीका को अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) की ओर से जारी गिरफ्तारी वारंट पर अमल न करना पड़े.
दक्षिण अफ्रीका में होने वाला यह सम्मेलन भारत के लिए काफी मायने रखता है. क्योंकि वैश्विक स्तर पर अपनी छवि को मजबूत करने और पश्चिमी देशों से मुकाबला करने के लिए चीन ने लगातार ब्रिक्स का विस्तार और सऊदी अरब और इंडोनेशिया जैसे देशों को इसमें शामिल करने की पैरवी की है. जबकि भारत और ब्राजील इसका विरोध करता रहा है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जोहान्सबर्ग रवाना होने से पहले भारत के विदेश सचिव विनय मोहन क्वात्रा ने सोमवार को कहा कि भारत ब्रिक्स विस्तार के मुद्दे पर खुले दिमाग और सकारात्मक इरादे से विचार करेगा. लेकिन सभी निर्णय आम सहमति से होनी चाहिए.
सऊदी अरब, ईरान और इंडोनेशिया समेत 20 से ज्यादा देश दुनिया की सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं के समूह ब्रिक्स (BRICS) में शामिल होना चाहते हैं. इस साल की अध्यक्षता कर रहे दक्षिण अफ्रीका के राजदूत अनिल सूकलाल के अनुसार, 40 से अधिक देशों ने इस समूह में शामिल होने की इच्छा व्यक्त की है. जबकि 22 देशों ने औपचारिक रूप से शामिल करने के लिए कहा है.
मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो सऊदी अरब, इंडोनेशिया, संयुक्त अरब आमीरात, मिस्र और अर्जेंटीना को इसी महीने 22-24 अगस्त के बीच दक्षिण अफ्रीका के जोहानिसबर्ग में होने वाले शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स की सदस्यता दी जा सकती है. वर्तमान में ब्रिक्स में पांच देश हैं- ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका.
भारत और ब्राजील क्यों कर रहा है विरोध?
ब्राजील का मानना है कि समूह के विस्तार से ब्रिक्स अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के काउंटर समूह के तौर पर आगे बढ़ रहा है, जिससे पश्चिमी देशों की ओर से चिंता जाहिर की जा रही है. जबकि भारत चाहता है कि समूह का विस्तार किए बिना अन्य देश कब और कैसे ब्रिक्स से नजदीक आ सकते हैं, इस पर सख्त नियम बने.
चूंकि, मोहम्मद बिन सलमान के क्राउन प्रिंस बनने के बाद चीन और सऊदी अरब के बीच नजदीकियां काफी बढ़ी हैं. चीन, सऊदी अरब के लिए सबसे बड़ा तेल खरीददार है. इसके अलावा चीन, यूएई और इंडोनेशिया जैसे देश चीन के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट रोड एंड बेल्ट प्रोजेक्ट का भी हिस्सा हैं.
ऐसे में भारत को इस बात की आशंका है कि सऊदी अरब, यूएई और मिस्र जैसे देशों के आने से ब्रिक्स में चीन अपना दबदबा दिखाने की कोशिश कर सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत इस बात को लेकर भी चिंतित है कि अगर ब्रिक्स में ईरान, सऊदी अरब, इंडोनेशिया जैसे मुस्लिम देशों को जगह मिलती है, तो कल पाकिस्तान को भी इसमें शामिल करने की मांग की जा सकती है.
भारत और ब्राजील ने जताई आपत्ति
न्यूज एजेंसी ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मामले से अवगत अधिकारियों का कहना है कि भारत और ब्राजील ब्रिक्स के विस्तार की चीनी कोशिश का विरोध कर रहे हैं. दोनों देशों का आरोप है कि चीन अपने राजनीतिक दबदबे को बढ़ाने और अमेरिका का मुकाबला करने के लिए ब्रिक्स का विस्तार चाहता है. अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि दोनों देशों ने दक्षिण अफ्रीका में होने वाले शिखर सम्मेलन की उस वार्ता पर आपत्ति दर्ज की है, जिस वार्ता के तहत ब्रिक्स देश इंडोनेशिया और सऊदी अरब को समूह में शामिल करने पर चर्चा करेंगे.
अधिकारियों ने आगे कहा कि भारत और ब्राजील चाहता है कि सम्मेलन के दौरान किसी भी देश को सीधे समूह में शामिल करने पर चर्चा करने के बजाय इन देशों को पर्यवेक्षक का दर्जा देने पर चर्चा की जाए. वहीं, दक्षिण अफ्रीका इन देशों को समूह का हिस्सा बनाने के विकल्पों पर चर्चा का तो समर्थन करता है, लेकिन विस्तार का विरोध नहीं करता है.
लोकतांत्रिक देशों को शामिल करने के पक्ष में भारत
भारत का कहना है कि यदि ब्रिक्स का विस्तार करना है तो सदस्य देशों के रूप में वंशवादी और निरंकुश शासन वाले सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों के बजाय उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ-साथ अर्जेंटीना और नाइजीरिया जैसे लोकतांत्रिक देशों को शामिल करना चाहिए.
इसके अलावा भारत, सऊदी अरब के बजाय इंडोनेशिया को शामिल करना चाहता है क्योंकि इंडोनेशिया भी भारत और अमेरिका की तरह इंडो-पैसिफिक में चीनी कार्रवाइयों को लेकर चिंता जाहिर करता है.
रिपोर्ट के मुताबिक, दो भारतीय अधिकारियों ने कहा है कि भारत के विरोध के बावजूद नए देशों को सदस्यता देने के लिए मसौदा नियम तैयार किए गए और आगामी शिखर सम्मेलन के दौरान इसके दिशानिर्देशों पर चर्चा और अपनाए जाने की उम्मीद है.
पिछले महीने ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर से जब ब्रिक्स विस्तार को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा था कि काम जारी है. जबकि चीन के विदेश मंत्रालय का कहना है कि पिछले साल ब्रिक्स नेताओं की बैठक में सदस्यता के विस्तार को मंजूरी दी गई थी. ब्रिक्स समूह में अन्य देशों को शामिल करना पांचों देशों की राजनीतिक सहमति है.
वहीं, ब्रिक्स के विस्तार पर रूसी राष्ट्रपति पुतिन के सलाहकार फ्योडोर लुक्यानोव ने कहा, "रूस ब्रिक्स के विस्तार पर कोई दृढ़ रुख नहीं रखता है. मौटे तौर पर यह कदम ब्रिक्स विस्तार के पक्ष में है, लेकिन बिना किसी बड़े उत्साह के. हम किसी भी फैसले को नहीं रोकेंगे."
ब्रिक्स की शुरुआत कैसे हुई?
साल 2001 में अर्थशास्त्री जिम ओ'नील ने ब्राजील, रूस, भारत और चीन में मजबूत विकास दर की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए ब्रिक (BRIC) शब्द का इस्तेमाल किया था. जिम ओ'नील के एक शोध में कहा गया था कि 2050 तक ब्रिक देशों की संयुक्त अर्थव्यवस्थाएं तत्कालीन अमीर देशों की अर्थव्यवस्थाओं को पीछे छोड़ देंगी.
दरअसल, उसी साल 11 सितंबर को अमेरिका में आतंकवादी हमला हुआ था. इसके बाद अमेरिकी बाजार में निराशा के बीच निवेशकों के लिए ब्रिक में संभावनाएं दिख रहीं थी. ऐसे में चारों देशों ने इस संगठन पर विचार किया. BRIC विदेश मंत्रियों की पहली बैठक 2006 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान रूस में आयोजित की गई थी. ब्रिक समूह का पहला शिखर सम्मेलन 2009 में आयोजित किया गया था. एक साल बाद 2010 के अंत में दक्षिण अफ्रीका को इसमें शामिल किया गया. दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद ब्रिक का नाम बदलकर ब्रिक्स हो गया.
क्या करता है ब्रिक्स?
ब्रिक्स की सबसे बड़ी उपलब्धि न्यू डेवलपमेंड बैंक की स्थापना है. पांचों देशों ने 100 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा जमा करने पर सहमति दर्ज की, जिससे किसी भी आपात स्थिति में एक-दूसरे को उधार दिया जा सके. 2015 में न्यू डेवलपमेंट बैंक ने पूरी तरह से काम करना शुरू कर दिया. वाटर और ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी परियोजनाओं के लिए न्यू डेवलपमेंड बैंक ने 30 बिलियन डॉलर से अधिक की ऋण मंजूरी दी है. कोविड के दौरान दक्षिण अफ्रीका ने महामारी से लड़ने के लिए न्यू डेवलपमेंड बैंक से लगभग 1 बिलियन डॉलर का उधार लिया था.
ब्रिक्स देशों में दुनिया की कुल आबादी की 40 प्रतिशत आबादी रहती है. वहीं, अगर जीडीपी की बात करें तो कुल जीडीपी का 23 प्रतिशत प्रतिनिधित्व ब्रिक्स देशों के पास है. जबकि 26 प्रतिशत क्षेत्रफल ब्रिक्स देशों में है.