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ट्रंप के टैरिफ पर नहीं आया फैसला, US के सुप्रीम कोर्ट में दूसरी बार टली सुनवाई

डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए रेसिप्रोकल टैरिफ पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर कोई फैसला नहीं सुनाया है. दूसरी बार सुनवाई टलने से कानूनी और आर्थिक अनिश्चितता बनी हुई है. यह मामला राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियों और कांग्रेस के अधिकारों से जुड़ा है.

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सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रपति ट्रंप के टैरिफ पॉलिसी को चुनौती दी गई थी. (Photo- ITG)
सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रपति ट्रंप के टैरिफ पॉलिसी को चुनौती दी गई थी. (Photo- ITG)

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सरकार द्वारा लगाए गए रेसिप्रोकल टैरिफ पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने आज भी कोई फैसला नहीं सुनाया. कोर्ट ने इस मामले में दूसरी बार निर्णय को टाल दिया है. इससे पहले 9 जनवरी को कोर्ट ने मामले पर फैसला टाल दिया था. अब इस केस पर फैसला कब आएगा, कोर्ट की तरफ से फिलहाल कुछ स्पष्ट नहीं किया गया है.

सुप्रीम कोर्ट ने आज तीन अन्य मामलों में फैसले जरूर सुनाए, लेकिन टैरिफ से जुड़े केस पर न तो कोई बहस हुई और न ही यह साफ किया गया कि अगली सुनवाई कब होगी या फैसला कब आ सकता है. इससे यह मामला फिलहाल अनिश्चितता में फंसा हुआ है.

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यह केस इस बात की जांच से जुड़ा है कि क्या राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने संवैधानिक और कानूनी अधिकारों से आगे बढ़कर लगभग सभी बड़े अमेरिकी व्यापारिक साझेदारों पर 10% से 50% तक के टैरिफ एकतरफा रूप से लगा दिए? ट्रंप ने इन टैरिफ को सही ठहराने के लिए 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) का इस्तेमाल किया और व्यापार घाटे और फेंटेनाइल जैसे अवैध ड्रग्स की तस्करी को "राष्ट्रीय आपातकाल" बताया.

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वहीं, डेमोक्रेट शासित 12 अमेरिकी राज्यों के कारोबारियों की ओर से दायर याचिकाओं में कहा गया है कि IEEPA कानून का मकसद आपात स्थितियों से निपटना था, न कि व्यापक व्यापार नीति लागू करना. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि टैरिफ तय करने का अधिकार मुख्य रूप से कांग्रेस के पास है, न कि राष्ट्रपति के पास.

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इससे पहले निचली फेडरल अदालतें ट्रंप सरकार के कई टैरिफ को अवैध करार दे चुकी हैं, जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. नवंबर 2025 में हुई मौखिक सुनवाई के दौरान संकेत मिले थे कि रूढ़िवादी और उदारवादी दोनों तरह के जज राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियों की इस एक्सप्लेनेशन को लेकर संशय में हैं.

अगर कोर्ट टैरिफ के खिलाफ फैसला देता, तो अमेरिकी सरकार को करीब 130 से 150 अरब डॉलर तक की वसूली गई ड्यूटी लौटानी पड़ सकती थी. खुद ट्रंप ने सोशल मीडिया पर चेतावनी दी थी कि अगर सरकार केस हारती है तो यह "आर्थिक आपदा" होगी.

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