
ईरान के साथ जारी जंग को खत्म करने के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बेताबी अब साफ नजर आने लगी है. हाल ही में उन्होंने सीजफायर बढ़ाने का ऐलान किया, लेकिन ईरान ने इसे एकतरफा बताते हुए खारिज कर दिया. सवाल यह है कि आखिर ट्रंप इतनी जल्दी में क्यों हैं? इसके पीछे कई वजहें हैं. खासतौर से अमेरिका में होने वाला मिड टर्म चुनाव, ट्रंप की गिरती अप्रूवल रेटिंग और हथियारों की कमी.
इसकी सबसे बड़ी वजह अमेरिकी सेना की घटती ताकत मानी जा रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान के खिलाफ ऑपरेशन के दौरान अमेरिका ने अपने कई अहम मिसाइल सिस्टम का बड़ा हिस्सा इस्तेमाल कर लिया है. सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका अपने THAAD और पैट्रियट जैसे एयर डिफेंस मिसाइलों का करीब आधा स्टॉक खर्च कर चुका है.
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इसके अलावा प्रिसिजन स्ट्राइक मिसाइल, टॉमहॉक और दूसरे एडवांस हथियारों का भी बड़ा हिस्सा इस जंग में इस्तेमाल हो चुका है. अंदाजा है कि कुछ मिसाइल सिस्टम का 30 से 50 फीसदी तक स्टॉक खत्म हो गया है. ऐसे में अगर जंग लंबी चलती है, तो अमेरिका के सामने नई चुनौती खड़ी हो सकती है.

विशेषज्ञों का कहना है कि इन हथियारों को फिर से पुराने स्तर पर लाने में 3 से 5 साल तक लग सकते हैं. यानी अगर अभी कोई और बड़ा टकराव जैसे कि अगर चीन के साथ ही होता है, तो अमेरिका के पास उतनी तैयारी नहीं होगी जितनी पहले थी. हालांकि पेंटागन ने इन दावों को पूरी तरह खारिज नहीं किया, लेकिन यह जरूर कहा कि अमेरिका के पास अभी भी पर्याप्त हथियार हैं और वह जरूरत पड़ने पर कार्रवाई कर सकता है. फिर भी, अंदरखाने चिंता साफ दिख रही है.
दूसरी बड़ी वजह ये है कि अमेरिका में नवंबर महीने तक मिडटर्म चुनाव होने वाले हैं. ट्रंप की लोकप्रियता लगातार गिर रही है. हालिया सर्वे में उनकी अप्रूवल रेटिंग करीब 35% तक आ गई है, जो उनके लिए बड़ा झटका है. अमेरिका के लोग पहले से ही नई जंग के खिलाफ थे. ट्रंप ने चुनाव के दौरान वादा किया था कि वह देश को नई लड़ाइयों में नहीं झोंकेंगे. लेकिन ईरान जंग ने उस वादे को कमजोर कर दिया है.
इसका असर आम लोगों की जेब पर भी पड़ा है. तेल और गैस की कीमतें बढ़ गई हैं, महंगाई बढ़ी हैं और लोगों में नाराजगी बढ़ रही है. यही वजह है कि अब ट्रंप को अपनी ही पार्टी के समर्थकों का विरोध झेलना पड़ रहा है. ऐसे में ट्रंप के सामने साफ चुनौती है कि वह या तो जंग जारी रखें और राजनीतिक नुकसान उठाएं, या फिर किसी तरह समझौता कर स्थिति को संभालें.

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यही कारण है कि वह हर हाल में ईरान के साथ डील करना चाहते हैं. सीजफायर बढ़ाने का फैसला भी इसी दिशा में एक कदम माना जा रहा है, ताकि बातचीत के लिए और समय मिल सके. लेकिन समस्या यह है कि ईरान इस दबाव में आने को तैयार नहीं दिख रहा. उसने साफ कर दिया है कि वह किसी एकतरफा फैसले को नहीं मानेगा.
सीधी बात यह है कि ट्रंप इस समय कई मोर्चों पर घिरे हुए हैं. जंग का दबाव, हथियारों की चिंता, जनता की नाराजगी और चुनाव का डर. ऐसे में उनका हर कदम अब सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि राजनीतिक गणित से भी जुड़ा हुआ है. ट्रंप ने सीजफायर को ताकत की वजह से नहीं, बल्कि जरूरत की वजह से बढ़ाया है. डिप्लोमैटिक रुकावट, ईरान में अंदरूनी अफरा-तफरी और महंगी जंग के खतरे के बीच समय हासिल करना भी एक वजह हो सकती है.
आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या ट्रंप ईरान के साथ कोई समझौता कर पाते हैं या फिर यह जंग उन्हें और मुश्किल में डालती है. फिलहाल इतना तय है कि इस जंग का असर सिर्फ मैदान तक सीमित नहीं है, बल्कि व्हाइट हाउस की राजनीति तक साफ दिख रहा है.