इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश की न्याय व्यवस्था में लंबित आपराधिक मामलों और न्याय में हो रही देरी को लेकर कड़ी टिप्पणी की है. कोर्ट ने साफ कहा कि जिला अदालतों में बढ़ते मामलों के लिए केवल न्यायिक अधिकारियों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, बल्कि इसके पीछे राज्य सरकार, पुलिस और फॉरेंसिक सिस्टम की कमजोरियां भी बड़ी वजह हैं.
फतेहपुर निवासी हत्या के आरोपी मेवालाल प्रजापति की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने यह टिप्पणी की. कोर्ट ने 1993 की फिल्म ‘दामिनी’ के मशहूर संवाद “तारीख पे तारीख” का जिक्र करते हुए कहा कि यह आम आदमी की उस पीड़ा को दर्शाता है, जिसमें उसे समय पर न्याय नहीं मिल पाता.
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि कई युवा और ईमानदार न्यायिक अधिकारी पूरी मेहनत और निष्ठा से काम करना चाहते हैं, लेकिन पर्याप्त स्टाफ, पुलिस सहयोग और समय पर फॉरेंसिक रिपोर्ट नहीं मिलने के कारण वे प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाते. कोर्ट ने माना कि समन और वारंट के क्रियान्वयन में पुलिस की लापरवाही और कमजोर जांच भी मामलों के लंबा खिंचने की बड़ी वजह है.
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी पाया कि हत्या के एक केस में खून से सना पेचकस बरामद होने के बावजूद जांच अधिकारी ने डीएनए जांच नहीं कराई. इस लापरवाही पर कोर्ट ने पहले ही यूपी के डीजीपी, गृह सचिव और एफएसएल निदेशक को तलब किया था.
एफएसएल निदेशक ने अदालत को बताया कि प्रदेश की 12 लैब में से केवल आठ में ही डीएनए प्रोफाइलिंग की सुविधा उपलब्ध है. साथ ही कई लैब में आधुनिक उपकरणों और कर्मचारियों की भारी कमी है. इस पर हाईकोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा कि कमजोर फॉरेंसिक व्यवस्था और ढांचागत कमियां न्याय प्रक्रिया को प्रभावित कर रही हैं.
कोर्ट ने यह भी कहा कि मामलों में देरी अपराधियों का मनोबल बढ़ाती है और जनता का न्याय व्यवस्था से भरोसा कमजोर करती है. अदालत ने टिप्पणी की कि कई अपराधी बिना किसी डर के अपराध करते रहते हैं और कुछ तो विधायक, सांसद और मंत्री तक बन जाते हैं. हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को सुझाव दिया कि उत्तर प्रदेश एफएसएल को गृह विभाग के अंतर्गत स्वायत्त संस्था बनाया जाए और जिला न्यायाधीशों की सुरक्षा के लिए व्यक्तिगत सुरक्षा अधिकारी उपलब्ध कराने पर भी विचार किया जाए. अदालत ने अपने आदेश की प्रति मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भेजने का निर्देश दिया है.
हाई कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों की व्यक्तिगत सुरक्षा पर भी चिंता व्यक्त की और पाया कि न्यायाधीशों को अक्सर अदालत कक्षों में धमकियों और सार्वजनिक स्थानों पर अपराधियों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से डराने-धमकाने का सामना करना पड़ता है. पीठ ने कहा कि पंजाब और हरियाणा के विपरीत, उत्तर प्रदेश में सभी न्यायिक अधिकारियों को व्यक्तिगत सुरक्षा अधिकारी उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं, जिससे उनके निडर होकर कार्य करने और कुख्यात अपराधियों के खिलाफ दोषसिद्धि आदेश पारित करने की क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.