उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में एक दिन कुछ अलग था. सरकारी दफ्तरों की वही फाइलें, वही कुर्सियां और वही जिम्मेदारियां थीं, लेकिन उन्हें संभालने वाले चेहरे बदले हुए थे. यह बदलाव था 'मिशन शक्ति' के तहत शुरू हुई एक अनोखी पहल का, जिसने बेटियों को सिर्फ सपने देखने ही नहीं, बल्कि उन्हें जीने का मौका भी दिया. 8 अप्रैल की सुबह जब ज्ञानेंद्र सिंह अपने कार्यालय पहुंचे, तो उनके साथ एक खास मेहमान थीं. राम लुभाई साहनी राजकीय महाविद्यालय की बीएससी छात्रा इरम बी. उन्हें उस दिन के लिए जिलाधिकारी की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. शुरुआत में चेहरे पर हल्की झिझक थी, लेकिन आंखों में आत्मविश्वास साफ झलक रहा था.
कुछ ही देर में इरम बी ने अपनी कुर्सी संभाली और जनसुनवाई शुरू हुई. सामने एक व्यक्ति जमीन विवाद की शिकायत लेकर आया. इरम ने ध्यान से पूरी बात सुनी, संबंधित अधिकारियों को बुलाया और तुरंत कार्रवाई के निर्देश दिए. उस पल वह सिर्फ एक छात्रा नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार प्रशासक की तरह नजर आ रही थीं.
इसी दौरान विकास भवन में एक और कहानी लिखी जा रही थी. बीएससी की छात्रा रिया गंगवार को एक दिन के लिए जिला विकास अधिकारी बनाया गया था. रिया ने विभागीय फाइलों का निरीक्षण किया, योजनाओं की जानकारी ली और अधिकारियों से सवाल पूछे. उनके हर सवाल में सीखने की उत्सुकता और कुछ कर दिखाने का जज्बा साफ दिख रहा था.
दिन भर का यह अनुभव सिर्फ प्रशासनिक कामकाज तक सीमित नहीं था, बल्कि यह उन बेटियों के लिए एक नई दिशा थी, जो बड़े सपने देखती हैं लेकिन अक्सर रास्ते नहीं जान पातीं. जिलाधिकारी ज्ञानेंद्र सिंह ने बताया कि मिशन शक्ति के जरिए बेटियों को यह संदेश दिया जा रहा है कि वे किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ सकती हैं, चाहे वह प्रशासन हो या कोई और क्षेत्र.
शाम होते-होते यह दिन भले ही खत्म हो गया, लेकिन इरम और रिया के दिलों में एक नई शुरुआत हो चुकी थी. अब उनके सपने सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं थे, बल्कि उन्हें जीने का आत्मविश्वास भी मिल चुका था. यह कहानी सिर्फ दो छात्राओं की नहीं, बल्कि हर उस बेटी की है, जो अवसर मिलने पर आसमान छू सकती है.