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LPG संकट के बीच किसान बना आत्मनिर्भर... गोबर गैस से जल रहा चूल्हा और खत्म हुई सिलेंडर की टेंशन

सहारनपुर के भलस्वा गांव में किसान रकम सिंह सैनी ने LPG संकट के बीच आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की है. 9 साल पहले लगाए गए बायोगैस प्लांट से रोज 6–8 घंटे चूल्हा जलता है और 8–10 लोगों का खाना बनता है. परिवार साल में सिर्फ 2–3 सिलेंडर ही इस्तेमाल करता है. वहीं, रकम सिंह सैनी ने किसानों से बायोगैस अपनाने की अपील की है.

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पूरे साल में सिर्फ 2 से 3 सिलेंडर ही इस्तेमाल होते हैं.(Photo: Rahul Kumar/ITG)
पूरे साल में सिर्फ 2 से 3 सिलेंडर ही इस्तेमाल होते हैं.(Photo: Rahul Kumar/ITG)

मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब भारत के किचन तक पहुंचता नजर आ रहा है. कई इलाकों में LPG गैस की किल्लत और एजेंसियों पर लंबी कतारें देखी जा रही हैं. ऐसे हालात में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर का एक किसान परिवार आत्मनिर्भरता की मिसाल बनकर सामने आया है, जो बिना LPG के पूरी तरह गोबर गैस से खाना बना रहा है और किसी भी संकट से बेफिक्र नजर आ रहा है.

सहारनपुर जिला मुख्यालय से करीब 12 किलोमीटर दूर गांव भलस्वा में रहने वाले किसान रकम सिंह सैनी ने अपने घर पर बायोगैस प्लांट लगाया हुआ है. करीब 9 साल पहले मनरेगा योजना के तहत बने इस प्लांट से आज उनका पूरा परिवार खाना बना रहा है. इस प्लांट में गाय के गोबर और पानी का घोल डालकर गैस तैयार की जाती है. इससे रोजाना 6 से 8 घंटे तक चूल्हा जलता है और 8 से 10 लोगों का खाना आसानी से बन जाता है.

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रकम सिंह बताते हैं कि रोज करीब 12 से 15 किलो गोबर से तीनों समय का खाना तैयार हो जाता है. इस प्लांट की खास बात यह है कि गैस बनने के बाद जो अवशेष बचता है, वह जैविक खाद बन जाता है, जिसे खेतों में इस्तेमाल किया जाता है. इससे खेती की लागत कम होती है और केमिकल खाद की जरूरत भी घटती है. उनका कहना है कि यह प्लांट लगभग जीरो मेंटेनेंस पर चलता है और साल में एक बार सफाई करनी पड़ती है.

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बायोगैस से रसोई और खेती दोनों को फायदा

रकम सिंह सैनी के अनुसार, इस प्लांट ने उनके घर और खेती दोनों में बड़ा बदलाव किया है. जहां पहले ईंधन के लिए LPG या लकड़ी पर निर्भरता थी, वहीं अब गोबर गैस से रोजमर्रा की जरूरतें पूरी हो रही हैं. इससे घरेलू खर्च में कमी आई है और खेतों के लिए जैविक खाद भी आसानी से उपलब्ध हो रही है.

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परिवार की गृहिणी गीता सैनी बताती हैं कि पहले उन्हें लकड़ी और भूसे से खाना बनाना पड़ता था, जिससे धुआं और परेशानी होती थी. अब गोबर गैस से तेज आंच पर जल्दी खाना बन जाता है और रसोई भी साफ-सुथरी रहती है. उन्होंने बताया कि LPG सिलेंडर अब उनके घर में 4 से 5 महीने तक चलता है और साल में सिर्फ 2 से 3 सिलेंडर की जरूरत पड़ती है.

गीता सैनी ने बताया कि सर्दियों के मौसम में, खासकर दिसंबर और जनवरी में थोड़ी दिक्कत आती है क्योंकि गैस कम बनती है. ऐसे समय में उन्हें दूसरा साधन इस्तेमाल करना पड़ता है. हालांकि, बाकी पूरे साल गोबर गैस से खाना बनता है और उन्हें किसी तरह की परेशानी नहीं होती.

'जय ऊर्जा गैस' बना परिवार का भरोसा

गीता सैनी ने कहा कि यह उनके लिए “जय ऊर्जा गैस” है, जिसे वे गोबर से तैयार करते हैं. उन्होंने बताया कि यह गैस बिल्कुल LPG जैसी है और उसी तरह चूल्हे पर खाना बनता है. उनका कहना है कि LPG गैस की रोटी नुकसान देती है, लेकिन इस गैस से बनी रोटी नुकसान नहीं देती.

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उन्होंने बताया कि उनके पास LPG कनेक्शन मौजूद है, लेकिन उसका इस्तेमाल बहुत कम होता है. सिर्फ सर्दियों में ही इसकी जरूरत पड़ती है. एक सिलेंडर करीब 4 से 5 महीने तक चल जाता है और पूरे साल में सिर्फ 2 से 3 सिलेंडर ही इस्तेमाल होते हैं.

रकम सिंह सैनी का कहना है कि जब दुनिया गैस संकट से जूझ रही है, तब गांव के संसाधनों से आत्मनिर्भर बनना सबसे बड़ा समाधान है. उन्होंने अन्य किसानों से भी अपील की है कि वे बायोगैस प्लांट लगाकर खर्च कम करें और पर्यावरण संरक्षण में योगदान दें. उनका मानना है कि अगर हर गांव इस दिशा में कदम बढ़ाए, तो देश को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है.

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