संगम तट पर चल रहा माघ मेला... जहां हर सांस में आस्था बसती है और हर कण में भक्ति की अनुभूति होती है. साधु-संतों के विविध रूप, अखाड़ों की परंपराएं, वैराग्य और साधना की अनगिनत कथाएं माघ मेले को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देती हैं. ये कहानी भगवान शिव के उन रहस्यमय उपासकों की है, जिनकी उपस्थिति कुंभ और माघ मेलों में होती है. माघ मेले में जब जंगम जोगी पहुंचे तो संगम तट पर ईश्वरीय साधना की अनोखी कहानी सामने आई.
अघोरेश्वर धाम के शिविर में जंगम जोगी बम बम लहरी… की गूंज के साथ पहुंचे. शिव महिमा के सुर जैसे ही गूंजे, हवा में शिव भक्ति की तरंग फैल गई. ढोलक, टाली और कंठ से निकली शिव स्तुति ने पूरे शिविर को मंत्रमुग्ध कर दिया. साधु-संत हों या श्रद्धालु, हर कोई उस क्षण में शिवमय हो उठा. नृत्य, गायन और ताल के साथ जंगम जोगियों ने अघोरेश्वर धाम को मानो शिवलोक में बदल दिया. जंगम जोगी आमतौर पर कुंभ मेलों में नजर आते हैं. वे शैव परंपरा के दशनामी संन्यासियों के पुरोहित माने जाते हैं. दशनामी साधु कुंभ और माघ मेलों में साधना करने पहुंचते हैं.
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जंगम जोगियों की पहचान सिर्फ उनके भजनों और शिव स्तुति से नहीं होती, बल्कि उनकी अलौकिक वेशभूषा भी उन्हें अलग बनाती है. सिर पर मुकुट या कलगी, जिस पर शेषनाग विराजमान हैं, कानों में विशेष कर्णफूल, शरीर पर अनोखा जनेऊ और हाथ में गूंजती हुई टाली... हर प्रतीक अपने-आप में एक देवकथा समेटे हुए है.
जंगम साधु बताते हैं कि सिर का मुकुट भगवान विष्णु का प्रतीक है, शेषनाग स्वयं महादेव का, कर्णफूल माता पार्वती के, जनेऊ ब्रह्मा जी का और टाली नंदी बैल के आशीर्वाद का प्रतीक मानी जाती है. यही टाली उनका वाद्य भी है और यही उनका दानपात्र.
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पौराणिक कथाओं में जंगम साधुओं की उत्पत्ति भी रहस्यमय बताई जाती है. कथा के अनुसार, भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के समय महादेव ने भगवान विष्णु और ब्रह्मा को दान देने की इच्छा जताई. लेकिन दोनों देवों ने विनम्रता से कहा कि प्रभु, आपका दान कच्चे पारे के समान है, इसे ग्रहण करना हमारे लिए संभव नहीं. जब शिव विवाह में कोई भी दान लेने को तैयार नहीं हुआ, तब महादेव ने अपनी जंघा से जंगम को उत्पन्न किया. इसी कारण इन्हें ‘जंगम’ कहा गया. महादेव ने इन्हें न केवल दान लेने का अधिकार दिया, बल्कि शिव विवाह का गायन करने का वरदान भी दिया. कहा जाता है कि हरियाणा क्षेत्र में हजारों वर्षों से शिव विवाह का गायन जंगम जोगी करते आ रहे हैं.
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जंगम साधु शिव के उपासक होते हैं. वे सामान्य गृहस्थों से दान नहीं लेते. उनका जीवन साधु-संतों द्वारा दी गई दान-दक्षिणा से चलता है. इसके लिए वे अखाड़ों में जाते हैं, शिव कथा सुनाते हैं और शिव महिमा का गायन करते हैं. मान्यता है कि हर कोई जंगम साधु नहीं बन सकता. यह अधिकार केवल उनके वंश में ही होता है और हर पीढ़ी से केवल एक सदस्य ही इस परंपरा को आगे बढ़ाता है, ताकि परंपरा कभी टूट न जाए.
दान लेने की उनकी परंपरा भी अलग है. जंगम साधु कभी दान सीधे हाथ में नहीं लेते. दान हमेशा टाली में ही स्वीकार किया जाता है. कथा के अनुसार, नंदी ने यह टाली इसलिए दी थी, क्योंकि शिव की ओर से दिया गया दान यदि सीधे शरीर को छू जाए, तो वह भस्म कर सकता है. इसी कारण आज भी शिव का दान टाली के माध्यम से ही लिया जाता है. इस समय माघ मेले में केवल चार जंगम साधु पहुंचे हैं, यहां उनके स्वर गूंजते हैं. माघ मेले में जंगम जोगियों की अनोखी झलक श्रद्धालुओं के लिए आस्था, रहस्य और शिव भक्ति का अद्भुत संगम है.