लिलियम एक महत्वपूर्ण कट फ्लावर है जो अपनी सुंदरता के कारण वैश्विक बाजार में टॉप दस कट फ्लावर में अपना स्थान रखता है. यह एक कंदीय फूल का पौधा है जिसकी खेती आमतौर पर ठंडे प्रदेशों में की जाती है. लेकिन उच्च तकनीक जैसे की पाली हाउस, शेड नेट लगाकर इसे उष्ण जलवायु में भी सफलता से लगाया जा सकता है. इसका नया उपयोग बांदा के कृषि विश्वविद्यालय में वैज्ञानिकों और प्रोफेसरों ने किया.
बता दें लिलियम की बढ़ती मांग को देखते हुए बुंदेलखंड की जलवायु में इसे प्रयोग के तौर पर पहली बार बांदा कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के पुष्प एवं भू-दृश्य निर्माण विभाग ने शेड नेट के अंदर एशियाटिक लिली को लगाया. जिसका परिणाम उत्साहवर्धक रहा. बुंदेलखंड तपती गर्मी के बीच भी वैज्ञानिकों की टीम ने अपना कमाल कर दिखाया है.
बुंदेलखंड में होगी लिलियम फूल की खेती
विश्वविद्यालय के असिटेंट प्रोफेसर डाक्टर अमित कनौजिया ने बताया कि एशियाटिक लिली की 10 प्रजातियों का परीक्षण किया गया. जिसमें जिसे नवंबर के प्रथम सप्ताह में लगाया गया. प्रजातियों की वानास्पतिक वृद्धि एवं फूलों के स्पाइक की गुणवत्ता अच्छी रही.
एशियाटिक लिली की वृद्धि के लिए दिन में औसतन 18-21 डिग्री तथा रात में 12-15 डिग्री तापमान की आवश्यकता होती है. कंद को लगभग 30x45 सेमी. की दूरी पर लगाया गया तथा 180 वर्गमीटर क्षेत्रफल में लगभग 360 कांद लगाए गए. कंद को दिल्ली से मंगाया गया था जिसकी कीमत 25-30 रुपये प्रति कंद रही. शेडनेट के अंदर प्रति वर्गमीटर लगभग 7 से 10 स्पाइक का उत्पादन लिया जा सकता है.
लखनऊ, कानपुर जैसे शहरों में प्रति स्पाइक कीमत लगभग 50-60रु. बाजार की कीमत के अनुसार रहती है. पुष्प एवं भू-दृश्य निर्माण विभाग के विभाग के अध्यक्ष डॉक्टर अजय कुमार सिंह ने बताया एशियाटिक लिली का परीक्षण किया गया और इसे अभी शोध कार्य किया जा रहा है और अगले वर्ष भी कुछ और प्रजातियों का परीक्षण किया जाएगा.
एशियाटिक लिली की 10 प्रजातियों का परीक्षण किया गया
लिलियम का इस्तेमाल फ्लावर बुके, त्योहारों एवं शादियों और घरों में फ्लावर वेस में तथा ईस्टर के दौरान किया जाता है और यह देखने में अत्यंत खूबसूरत होता है एवं बाजार में इसका उचित मूल्य मिलता है, इसलिए इसकी खेती किसानों के लिए अधिक लाभदायक होती है. बुंदेलखंड की जलवायु में ग्लेडियोलस की तरह लिलियम के कंदों को अप्रैल माह में जमीन से निकालकर कोल्ड स्टोरेज में अप्रैल से अक्टूबर माह तक सुरक्षित रखा जाता है.
सुरक्षित कंदों को अक्टूबर-नवंबर में निकालकर ग्लेडियोलस की ही तरह दुबारा प्रयोग में लाया जाता है. इस प्रकार पिछले वर्ष की तुलना में अगले वर्ष लिलियम के कंद पर लगने वाली लागत पर खर्च नहीं होता एवं लाभ अधिक होता है. बता दें कि लिलियम की खेती करने के इच्छुक किसान विश्वविद्यालय के उद्यान महाविद्यालय में पुष्प एवं भूदृश्य निर्माण विभाग से संपर्क कर सकते है.