कानपुर के औद्योगिक इलाकों में इन दिनों सन्नाटा छाया हुआ है और इसकी बड़ी वजह है कमर्शियल LPG गैस की भारी किल्लत. शहर की फैक्ट्रियों के लिए गैस की सप्लाई क्या रुकी, मानो काम-धंधे की रफ्तार ही थम गई. आजतक से बातचीत में इंडस्ट्रियल कोऑपरेटिव एस्टेट के अध्यक्ष विजय कपूर ने बताया कि हालात इतने खराब हो चुके हैं कि कानपुर की करीब 1250 फैक्ट्रियों में काम बंद हो गया है. गैस कटिंग और गैस पर चलने वाली मशीनों के भरोसे चलने वाले कारखाने इस मुसीबत की सबसे ज्यादा मार झेल रहे हैं.
अगर आंकड़ों को देखें तो स्थिति काफी गंभीर है. करीब 500 से ज्यादा लोहा और स्टील कटिंग यूनिट्स पर ताला लटक चुका है. वहीं, प्लास्टिक इंडस्ट्री का काम भी 70% तक गिर गया है. साबुन और डिटर्जेंट बनाने वाली लगभग 250 फैक्ट्रियां भी बंद पड़ी हैं. कुल मिलाकर कानपुर का आधा उद्योग इस समय बर्बादी की कगार पर है. जो फैक्ट्रियां किसी तरह चल भी रही हैं, वहां मालिक मजबूरी में तीन गुना दाम देकर ब्लैक में सिलेंडर खरीद रहे हैं ताकि किसी तरह थोड़े-बहुत ऑर्डर्स पूरे किए जा सकें.
दोहरी मार झेल रहा कानपुर
इस संकट का सबसे बुरा असर उन मजदूरों पर पड़ा है, जिनकी रोजी-रोटी इन फैक्ट्रियों से चलती थी. काम बंद होने से हजारों मजदूरों के सामने दाने-दाने का संकट खड़ा हो गया है. हालात ये हैं कि कई मजदूरों के घरों में खाना बनाने तक के लिए गैस सिलेंडर नहीं बचा है. भूख और बेरोजगारी से तंग आकर बड़ी संख्या में मजदूर अब अपने गांवों की ओर लौटने लगे हैं, जिससे आने वाले समय में काम करने वालों की भारी कमी होने का डर सता रहा है.
हैरानी की बात यह है कि जब उद्योगपति इस मुसीबत से निकलने का रास्ता ढूंढ रहे हैं, तब सरकार की तरफ से उन्हें कोई खास राहत नहीं मिली. व्यापारियों का आरोप है कि एक तरफ धंधा चौपट है और दूसरी तरफ मार्च क्लोजिंग के नाम पर टैक्स वसूली के नोटिस भेजे जा रहे हैं. कारोबारियों ने सरकार से गुहार लगाई थी कि टैक्स भरने के लिए कम से कम एक-दो महीने की मोहलत दी जाए, लेकिन इस पर कोई सुनवाई नहीं हुई. व्यापारियों का मानना है कि इतने बड़े संकट के समय सरकार को थोड़ा नरम रुख अपनाना चाहिए था ताकि न सिर्फ व्यापार बचता, बल्कि हजारों परिवारों का चूल्हा भी जलता रहता.