
UP के बांदा में मकर संक्रांति के त्योहार पर हर साल एक अनोखा मेला देखने को मिलता है, जहां बड़ी संख्या में प्रेमी जोड़े यानी कपल्स किले में पहुंचते हैं और यहां बने मंदिर में अपनी-अपनी मन्नत मांगते हैं. इस किले की भी कहानी किसी फिल्मी प्रेम कहानी से कम नहीं है. कपल्स किले के पास बह रही बांदा की जीवनदायिनी केन नदी में स्नान कर मंदिर के दर्शन करते हैं. इस किले को भूरागढ़ का किला कहा जाता है, जो लगभग 650 वर्षों से बना हुआ है, जिसकी एक अलग ब्रिटिश हुकूमत की क्रांतिकारी और प्रेम कहानी है. ये किला बलिदानियों के भी जाना जाता है. जहां पूर्व में कई लोगों को फांसी दी गई तो कई लोगों ने अपनी जान गंवाई. आइए, जानते हैं इस किले की कहानी......
कहा जाता है कई सौ साल पहले इस किले में एक राजा रहा करते थे, जिसकी बेटी को करतब नाच गाना दिखाने वाले नट से प्यार हो गया था, दोनों एक दूसरे से बहुत मोहब्बत करते थे और शादी करना चाहते थे. जब इस प्यार की कहानी की जानकारी राजा को हुई तो उसने अपने मंत्रियों से सलाह लेकर एक रणनीति बनाई.
राजा ने बेटी की शादी के लिए नट से रखी थी शर्त
राजा ने अपनी बेटी से शादी करने के लिए नट से अजीबोगरीब शर्त रखी थी. शर्त यह थी कि ''तुम यदि केन नदी से किले तक का सफर एक रस्सी के सहारे से तय लोगे तो मैं अपनी बेटी की शादी तुमसे कर दूंगा.'' तय समय पर नदी के दोनों छोरों पर रस्सी बांधी गयी. नट ने रस्सी के सहारे चलना शुरू किया और जब आधे से ज्यादा रास्ता तय भी कर लिया था.

राजा ने कटवा दी थी रस्सी, नट की नदी में डूबने से हुई थी मौत
जब राजा यह जान गया कि ये शर्त पूरी कर लेगा और मुझे अपनी बेटी की शादी नट से करनी पड़ जाएगी. जिसके बाद क्रोध में आकर राजा ने बेईमानी से उस रस्सी को काटने के लिए कई औजारों का प्रयोग किया, लेकिन रस्सी कटी नहीं, लेकिन अंत में रस्सी टूट ही गई और उस नट की डूबने से मौत हो गई, जिसकी याद में वहां एक मंदिर बनवाया गया था, जहां हर साल मकरसंक्रांति के दिन हर साल यहां कपल्स अपनी मनोकामनाएं मांगने आते हैं.

ब्रिटिश हुकूमत की बर्बरता का गवाह भी है ये किला
कहा जाता है कि अंग्रेजी हुकूमत और स्वतंत्रता संग्राम की कई यादें इस किले से जुड़ी हैं. इस दुर्ग में ब्रिटिश शासन में बहुत बर्बरता की गई, 1857 में यहां कई सैकड़ा लोगों को फांसी की सजा हुई थी, कई सैनिक भी मारे गए थे. आज भी यहां कई सैनिकों के बलिदान की निशानी बनी हुई है, जहां प्रशासन अपनी देखरेख में कार्यक्रम आयोजित कराता है. बताते हैं कि इस दुर्ग को छत्रसाल महाराजा ने बनवाया था, जिले के तमाम रिटायर्ड सैनिक शहीद स्मारक पर श्रद्धांजलि देते हैं.