
सोशल मीडिया पर इन दिनों दो मामलों को लेकर जबरदस्त चर्चा हो रही है. ट्विशा शर्मा और दीपिका केस. इन दोनों महिलाओं की मौत के बाद दहेज प्रथा, महिलाओं के उत्पीड़न और कानून की मजबूती को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं. लोग सिर्फ इन घटनाओं पर दुख जता रहे, साथ ही समाज की सोच और परिवारों के रवैये पर भी खुलकर बहस कर रहे हैं.
भोपाल में 31 साल की ट्विशा शर्मा की अपने ससुराल में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत से हड़कंप मच गया. मृतका के परिजनों ने पति और सास के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का मामला दर्ज कराया है. परिवार ने मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न के भी गंभीर आरोप लगाए हैं. बताया जा रहा है कि शादी के बाद से ही ट्विशा लगातार परेशान थी और अपनी तकलीफ परिवार से साझा कर रही थी.
वहीं ग्रेटर नोएडा के जलपुरा गांव में विवाहिता दीपिका की मौत का मामला भी दहेज उत्पीड़न से जुड़ता नजर आ रहा है. आरोप है कि ससुराल वाले दीपिका के परिवार से 50 लाख रुपये और एक फॉर्च्यूनर कार की मांग कर रहे थे. परिजनों का कहना है कि दहेज के लिए उसे लगातार प्रताड़ित किया गया और आखिरकार परेशान होकर उसने मौत को गले लगा लिया.
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इन दोनों घटनाओं के बाद सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा और दर्द साफ दिखाई दे रहा है. लोग इस पर खुलकर बात कर रहे हैं, सवाल उठा रहे हैं और यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर ऐसी घटनाएं बार-बार क्यों सामने आती हैं
ट्विशा की व्हाट्सएप चैट शेयर करते हुए एक सोशल मीडिया यूजर ने लिखा कि ट्विशा को सिर्फ उसके पति और ससुराल वालों ने ही नहीं, बल्कि इस मुश्किल वक्त में उसके अपने माता-पिता भी बचा नहीं सके. यूजर ने इस पूरी घटना को बेहद दुखद और दिल तोड़ देने वाला बताया.

इसी चर्चा के बीच एक अन्य यूजर ने समाज में बेटों की परवरिश पर सवाल उठाते हुए लिखा, “बेटों को बचपन से ‘राजा बेटा’ बनाकर पाला जाता है. उन्हें बाहर से सभ्य दिखना सिखाया जाता है, लेकिन अंदर एक भेड़िये जैसी सोच छिपी रहती है. और इसी तरह यह चक्र चलता रहता है.”
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कुछ लोगों ने यह सवाल भी उठाया कि जब ट्विशा लगातार अपनी परेशानी परिवार को बता रही थी, तो समय रहते उसे उस माहौल से बाहर क्यों नहीं निकाला गया. एक यूजर ने लिखा, “ट्विशा शर्मा की शादी सिर्फ 5 महीने पहले हुई थी. परिजनों के मुताबिक, शादी के बाद से ही वह लगातार परेशान थी. 12 मई को उसने अपनी जान दे दी. अब सवाल यह है कि जब बेटी बार-बार अपनी तकलीफ बता रही थी, तो आखिर उसे समय रहते उस माहौल से बाहर क्यों नहीं निकाला गया?”

बहस यहीं नहीं रुकी. कई यूजर्स ने भारतीय समाज की उस सोच पर भी सवाल उठाए, जहां लड़कियों को हर हाल में समझौता करना सिखाया जाता है. एक यूजर ने लिखा कि यह भारतीय समाज की वही पुरानी सोच है, जहां लड़कियों को हर हाल में समझौता करना सिखाया जाता है, लेकिन लड़कों को क्यों नहीं? एक लड़की अपना घर, अपनी पहचान तक छोड़ देती है और उससे उम्मीद की जाती है कि वह किसी दूसरे परिवार का नाम अपना ले. मुझे ‘कन्यादान’ की सोच पसंद नहीं. क्या लड़की कोई वस्तु है, जिसे दान कर दिया जाए?

सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इस मामले को भारतीय परिवारों की उस मानसिकता से जोड़कर देखा, जहां शादी बचाने को बेटी की जिंदगी से भी ऊपर रखा जाता है. एक यूजर ने लिखा, “व्हाट्सएप चैट से साफ दिख रहा है कि लड़की का परिवार हर हाल में शादी बचाना चाहता था. जब बेटी बार-बार कह रही थी कि अब ससुराल में रहना उसके लिए असंभव हो गया है, तब मां की तरफ से जवाब आया-पापा सॉरी बोल देंगे.’ शायद उन्होंने कभी नहीं सोचा होगा कि इस कहानी का अंत उनकी बेटी की जान के साथ होगा. क्या ज्यादातर भारतीय परिवार ऐसे ही नहीं हैं?
'शादी बचाने के लिए कोई भी अपमान सह लो'
एक अन्य यूजर ने समाज की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाते हुए लिखा कि शादी बेटी की जिंदगी से पहले. समाज बेटी की जिंदगी से पहले. शादी बचाने के लिए कोई भी अपमान सह लो. आखिर महिलाओं की जिंदगी की कीमत सबसे आखिर में क्यों आती है? क्या महिलाएं सिर्फ शादी के लिए खड़ी की गई कोई वस्तु हैं?”
वहीं कुछ लोगों ने माता-पिता के फैसलों पर भी नाराजगी जताई. एक यूजर ने लिखा कि मुझे लड़की और उसकी तकलीफ के लिए बेहद सहानुभूति है, लेकिन उन लोगों के लिए बिल्कुल नहीं, जिन्होंने बार-बार उसे उसी माहौल में वापस जाने के लिए मजबूर किया.