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Death to Dictator... ईरान में आंदोलन की आवाज बने 93 नारे, बता रहे वहां की कहानी

ईरान में विरोध प्रदर्शन के बीच 'डेथ टू डिक्टेटर' और 'मुल्लाओं को देश छोड़ना होगा' जैसे नारे तेज हो गए हैं. जैसे -जैसे आंदोलन तेज होता जा रहा है. इसके स्वर यानी नारे भी बदलने लगे हैं. अब तो 'खामेनेई डरो, रेजा शाह आएंगे' जैसे नारे लगने लगे हैं. ऐसे में समझते हैं - प्रदर्शन के बीच बदलते स्लोगन से वहां के हालात.

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ईरान में हो रहे पूरे आंदोलन को उन नारों से समझिए, जो इनकी आवाज बनी (Photo - Reuters/video grab)
ईरान में हो रहे पूरे आंदोलन को उन नारों से समझिए, जो इनकी आवाज बनी (Photo - Reuters/video grab)

तेहरान में 28 दिसंबर को व्यापारियों ने विरोध स्वरूप अपने दुकानों के शटर गिरा दिए. जब सुरक्षा बल वहां पहुंचे तो पहली बार सड़कों पर नारे गूंजे  'सम्मानित व्यापारियों; समर्थन करो, समर्थन करो!' फिर जब यह सिलसिला आगे बढ़ा तो 'डरो मत, डरो मत; हम सब इसमें एक साथ हैं', जैसे स्वर उभरे. यह सिर्फ एक आर्थिक विरोध था. धीरे-धीरे इन नारों के शब्दों के साथ इनका लहजा बदलता गया और इसने व्यापक पॉलिटिकल एजिटेशन का रूप ले लिया. 

यह आंदोलन राजधानी से तेहरान से निकलकर अब पूरे देश में छा गया है. हर दिन सैकड़ों जगहों पर लोग प्रदर्शन करते नजर आ रहे हैं. कहीं आगजनी हो रही है, तो कहीं गाड़ियां जलाई जा रही है, तो कहीं लोग पुलिस बलों के साथ झड़प कर रहे हैं. इन सबके बीच इस आंदोलन की आवाज बनने वाले नारे ईरान की पूरे हालात की हकीकत बयां करते नजर आतें है. ऐसे में समझते हैं कि विरोध-प्रदर्शन के बीच लोग क्या नारे लगा रहे हैं और ये क्या कहानी कहती है. 

कारोबारियों की हड़ताल से सत्ता परिवर्तन की मांग तक
ईरान इंटरनेशनल ने ईरान में शुरू हुए जन आंदोलन पर नजदीक से नजर रखे हुए है. इसने विरोध के शुरुआती दस दिनों  की एक रिपोर्ट बनाई है, जिसमें ईरान के लोगों के विरोध जताने का जरिया बने उनके स्लोगन और उसके बदलते स्वरूप के साथ आंदोलन की बदलती रूपरेखा को समझने की कोशिश की गई है.  

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ईरान इंटरनेशनल के मुताबिक, विद्रोह के पहले 10 दिनों के 463 क्लिपों की समीक्षा की गई- जो 91 शहरों, कस्बों और गांवों में रिकॉर्ड किए गए थे.  उन सभी फुटेज को इकट्ठा किया गया, जिसमें नारे स्पष्ट रूप से सुनाई दे रहे थे.फुटेज में 641 रिकॉर्ड किए गए स्लोगन सुने गए. इनमें से 93 अलग-अलग नारों की पहचान की जा सकी. 

इन फुटेज में सुनाई देने वाले नारे एक तीव्र बदलाव को दर्शाते हैं. हड़ताल के आह्वान और एकजुटता से लेकर इस्लामी गणराज्य को खारिज करने और रेजा शाह की वापसी के अह्वान तक का सफर, इन नारों की गूंज में सुनाई देता है. राजधानी में एक व्यापारिक हड़ताल से विरोध शुरू हुआ, जो जल्द ही 'डेथ टू डिक्टेटर' जैसे नारों के साथ इस्लामिक शासन को हटाने तक पहुंच गया. इसके बाद अब 'रेजा शाह आएंगे' जैसे नारे लगने शुरू हो गए. 

पहले 10 दिनों के दौरान लगातार विरोध के नारे लगाए गए. कुल मिलाकर, 453 वीडियो में 641 नारों को विश्लेषित कर एक आंकड़ा तैयार किया गया. फिर इन डेटा के माध्यम से पूरे आंदोलन के बदलते स्वरूप को दिखाने की कोशिश की गई. 

पहले दिन के फुटेज सीमित थे. शूश बाजार के एक क्लिप के अलावा - जिसमें व्यापारी 'पेज़ेश्कियन, थोड़ी शर्म करो, राष्ट्रपति पद छोड़ दो' के नारे लगा रहे थे. व्यापारियों की दुनिया से बाहर के कुछ ही नारे उन वीडियो में स्पष्ट रूप से सुनाई दे रहे थे. दूसरे दिन भी, 'बंद करो, बंद करो' जैसे हड़ताल के नारे बाजारों में गूंजते रहे - लेकिन विरोध की शब्दावली निर्णायक रूप से इस्लामी गणराज्य के साथ खुले टकराव में बदल गई.

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यह भी पढ़ें: ईरान में सड़कों पर उतरा जनसैलाब, लोगों में दिखा शासन के खिलाफ जबरदस्त उबाल, Photos

तेहरान में 'जब तक मौलवी को दफनाया नहीं जाता, यह मातृभूमि, मातृभूमि नहीं बनेगी' और 'तोपें, टैंक, आतिशबाजी, मुल्लाओं को जाना होगा' जैसे नारों ने व्यापारिक विरोधों से आगे राजनीतिक अस्वीकृति की ओर बदलाव के संकेत दिए. दसवें दिन, एक ऐसी पंक्ति सामने आई जिसने विरोध के पहले 10 दिनों को परिभाषित किया. ये नारा था- 'यह अंतिम लड़ाई है, पहलवी वापस लौटेगा.'

इसके बाद से विद्रोह के नारे अब केवल दबाव या विरोध के बारे में नहीं रह गए थे. वे सत्ता के बारे में थे. मतलब साफ था लोग अपने नारों के माध्यम से सत्ता परिवर्तन की इच्छा दिखा रहे हैं. साथ ही उस सत्ता की जगह किसे लेनी चाहिए, ये भी बता रहे हैं.

विश्वविद्यालयों में भी पहलवी समर्थक नारे सुनाई दिए. अल्लामेह तबतबाई विश्वविद्यालय में छात्रों ने नारे लगाए, 'न पहलवी, न सर्वोच्च नेता, आजादी और समानता', बेहेश्टी विश्वविद्यालय में 2022 के महिला जीवन स्वतंत्रता आंदोलन की एक पंक्ति सुनाई दी. 'तुम लंपट हो; तुम वेश्या हो, मैं एक आजाद महिला हूं.'

जैसे-जैसे दिन बीतते गए, आंदोलन का देश में भौगोलिक विस्तार होता गया. फुटेज तेहरान से आगे बढ़कर छोटे शहरों और कस्बों - कौह-चेनर, फरसान, असदाबाद, जुनेघन - तक से आने लगे. जबकि छात्रावासों के साथ-साथ सड़कों पर भी विरोध प्रदर्शन जारी रहे.

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इन नजारों में जो बात सबसे अधिक स्पष्ट रूप से सामने आई, वह न केवल प्रदर्शनों का व्यापक प्रसार था, बल्कि लोगों द्वारा लगाए गए नारों में दो प्रमुख राजनीतिक ध्रुवों को लेकर जनभावना दिखाई दे रही थी. इसमें एक इस्लामी गणराज्य का विरोध और दूसरा पहलवी परिवार के लिए समर्थन शामिल है.

'तानाशाह का नाश हो, पहलवी वापस आएगा'
दस दिनों की अवधि के बीच में विद्रोह की भाषा में शोक के भाव भी मिलने लगे थे.  नारे केवल उत्साहवर्धक उद्घोष ही नहीं, बल्कि शोकगीत बन गए. कौहदाश्त में शोक मनाने वालों ने नारे लगाए-  'यह फूल टूट गया है, यह मातृभूमि के लिए एक उपहार बन गया है'. उन्होंने सड़कों पर पहले से ही प्रचलित नारे भी दोहराए - 'पहलावी वापस आएगा' और 'तानाशाह का नाश हो.'

फूलादशहर में, दारियुश अंसारी के अंतिम संस्कार के दौरान शोक मनाने वालों ने 'खामेनेई मुर्दाबाद' के नारे लगाए. दारियुश अंसारी इस अशांति के दौर में मारे गए पहले प्रदर्शनकारियों में से एक थे. वहीं, मारवदश्त में, खुदादाद शिरवानी मोनफारेद के अंतिम संस्कार के दौरान 'शाह अमर रहें' के नारे लगाए गए.

आंदोलन के नारों पर ध्यान देने से पता चलता है कि विद्रोह का एक नहीं बल्कि कई लहजा है. इसमें क्रोध, दुख, और अस्वीकृति और कभी-कभी एक मिथक भी है, जो पुराने राजशाही के आह्वान से जुड़ा है.जाहेदान में, शुक्रवार की नमाज़ के बाद 'अल्लाहू अकबर' और 'खामेनेई का नाश हो' के नारे रिकॉर्ड किए गए. हमादान प्रांत के एक गांव में एक और नारा सुनाई दिया - 'विलाप करो खामेनेई, पहलवी आ रहे हैं'.

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शिराज विश्वविद्यालय के छात्रावास के प्रांगण में, छात्रों ने नारे लगाए - 'शाह घर लौट रहे हैं, ज़ाहक का तख्तापलट होगा'. खामेनेई के प्रतीक के रूप में पौराणिक तानाशाह ज़ाहक का इस्तेमाल नारों में किया जा रहा है. इलाम प्रांत के मालेकशाही में लतीफ करीमी, रजा अजीमी और मेहदी इमामी-पोर के अंतिम संस्कार समारोह के दौरान 'मैं मार डालूंगा, मैं मार डालूंगा, जिसने भी मेरे भाई को मारा है' जैसे नारे गूंजते रहे.

एक वीडियो क्लिप में मालेकशाही के एक अस्पताल पर हमले के दौरान नागरिकों को 'पुलिस बल समर्थन करो', जैसे नारे सुने गए. आंदोलन जब परवान पर चढ़ने लगा है तो राजनीतिक परिदृश्य अधिक स्पष्ट हो गया. आठ शहरों और गांवों से आए फुटेज में तीन नारे  प्रमुखता से सुनाई दिए - 'शाह अमर रहें', 'तानाशाह का नाश हो', और 'न गाजा, न लेबनान; मेरी ईरान के लिए'.

हमदान प्रांत के सबसे बड़े गांव चेनर-शेख (चेनर सोफला) में जारी विरोध प्रदर्शन में एक नारे ने सबका ध्यान खींचा है. 'खामेनेई एक हत्यारा है'. 19 शहरों में एक साथ जब विरोध प्रदर्शन शुरू हुए, तो वहां 'तानाशाह' के खिलाफ और 'पहलवी' के समर्थन में लगाए जाने वाले नारे प्रमुख थे.

ऐसे में ईरान में जारी आंदोलन के नारे वहां के बदलते हालात की स्पष्ट तस्वीर पेश कर रहे हैं. कारोबरियों की महंगाई के खिलाफ हड़ताल से शुरू हुआ विरोध, खामेनेई को सत्ता से हटाने की मांग तक पहुंच गया. अब वहां के लोग एक कदम आगे तानाशाह को हटाकर रेजा पहलवी को वापस आने का आह्वान कर रहे हैं. 

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