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यहां 2-3 हफ्ते की छुट्टी लेना आम बात, भारतीय ने बताया कैसा है यूरोप का वर्क कल्चर

दुनिया के हर देश का वर्क कल्चर अलग होता है. भारत में जहां वर्क कल्चर काफी दबाव भरा रहता है, वहीं यूरोप का वर्क कल्चर उससे काफी अलग है.

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अलेख ने बताया यहां काम जिंदगी नहीं है (Representational Image: Pexel))
अलेख ने बताया यहां काम जिंदगी नहीं है (Representational Image: Pexel))

विदेश में रहने वाले भारतीयों को लेकर अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि वे बेहतर लाइफस्टाइल, साफ हवा और आधुनिक सुविधाओं के कारण भारत लौटना नहीं चाहते. लेकिन बेल्जियम में काम कर रहे भारतीय अलेख श्रीवास्तव के एक वीडियो ने इस सोच को नए नजरिए से देखने पर मजबूर कर दिया है. सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस वीडियो में उन्होंने बताया कि असली वजह लाइफस्टाइल नहीं, बल्कि वर्क कल्चर है.

अलेख श्रीवास्तव ने कहा कि भारत में कई सुविधाएं ऐसी हैं, जो विदेशों में आसानी से नहीं मिलतीं. Zomato और Blinkit जैसी सेवाएं और घर में मदद करने वाले लोग भारत में जीवन को काफी आसान बनाते हैं. इसके बावजूद, विदेश में रहने वाले कई भारतीयों के लिए वापस लौटने का फैसला आसान नहीं होता.

उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर बताया कि असली अंतर वर्क-लाइफ बैलेंस में है. उनके मुताबिक, यूरोप में आमतौर पर काम शाम 5 बजे तक खत्म हो जाता है और इसके बाद का समय पूरी तरह निजी जीवन के लिए होता है. वहीं भारत में अगर कोई कर्मचारी 5 बजे ऑफिस छोड़ता है, तो अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या उसने आधा दिन काम किया है.

दो से तीन हफ्ते की छुट्टी लेना सामान्य

अलेख ने यह भी बताया कि यूरोप में दो से तीन हफ्ते की छुट्टी लेना सामान्य माना जाता है और इससे काम पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता. इसके उलट भारत में तीन दिन की छुट्टी लेना भी मुश्किल हो सकता है. कई बार कर्मचारियों से कहा जाता है कि वे छुट्टी से पहले अपना बैकअप तैयार करें. इस पर उन्होंने कहा कि कई बार उन्हें ऐसा लगता है कि वे खुद ही बैकअप बन जाते हैं.

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देखें वायरल वीडियो


वीडियो के कैप्शन में उन्होंने लिखा कि यूरोप में रहने के बाद उन्हें समझ आया कि असली फर्क साफ-सफाई या इंफ्रास्ट्रक्चर में नहीं, बल्कि इस बात में है कि समय को कैसे देखा और जिया जाता है. उनके अनुसार, यूरोप में शाम 5 बजे का मतलब निजी जिंदगी की शुरुआत होता है, जबकि भारत में ऐसा महसूस होता है कि काम किसी और रूप में जारी रहता है.

उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग विदेश जाने से पहले 25-30 साल भारत में बिता चुके होते हैं, वे वहां की परिस्थितियों के आदी होते हैं. ऐसे में असली दुविधा बेहतर सुविधाओं को छोड़ने की नहीं, बल्कि उस वर्क-लाइफ बैलेंस को छोड़ने की होती है, जो उन्हें विदेश में मिलता है. यही वजह है कि कई लोग भारत लौटने को लेकर असमंजस में रहते हैं.

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