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यहां काम कम, शोर ज्यादा... जर्मनी से बेंगलुरु लौटे टेकी ने बताया दोनों देशों के वर्क कल्चर का फर्क

जर्मनी में शांति, साफ हवा और अच्छा वर्क-लाइफ बैलेंस… या फिर भारत में परिवार, दोस्तों और अपनी मिट्टी का अपनापन? ये सवाल आजकल हजारों भारतीय युवाओं के मन में घूम रहा है.

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तनुज लिखते हैं कि जर्मनी में उनका रूटीन बेहद शांत और सिस्टेमैटिक था (Photo: Pexel)
तनुज लिखते हैं कि जर्मनी में उनका रूटीन बेहद शांत और सिस्टेमैटिक था (Photo: Pexel)

बेहतर जिंदगी आखिर कहां है-भारत में या यूरोप में? ये सवाल आजकल बहुत से भारतीय प्रोफेशनल्स को परेशान किए रहता है.कुछ दिन पहले एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर तनुज ने इस बहस को फिर से जोरदार तरीके से छेड़ दिया. तनुज पहले जर्मनी में काम कर रहे थे, अब वापस बेंगलुरु शिफ्ट हो गए हैं. उन्होंने X पर अपनी दोनों जिंदगियों की तुलना करते हुए पोस्ट डाली, और कमेंट्स में आग लग गई.

तनुज लिखते हैं कि जर्मनी में उनका रूटीन बेहद शांत और सिस्टेमैटिक था. सुबह उठते ही शांति, साफ हवा, बाहर जाकर रनिंग, फिर ट्रेन या बस पकड़कर आराम से ऑफिस. काम के बाद लैपटॉप बंद, और दिन खत्म. कोई शाम को 8 बजे भी मैसेज करके 'ये कर दो' नहीं कहता था,लेकिन बेंगलुरु वापस आकर सब बदल गया.अब सुबह उठते ही बाहर कारों और ट्रकों का शोर, मॉर्निंग वॉक के लिए भी सोसाइटी के अंदर घूमना पड़ता है. ऑफिस जाने में डेढ़-दो घंटे ट्रैफिक में फंसना तय है. दिन भर मीटिंग्स, ब्रेनस्टॉर्मिंग, और फिर घर लौटकर भी कई बार 10 बजे रात तक कॉल्स चलती रहती हैं.

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पोस्ट वायरल होते ही लोगों ने अपनी राय रखनी शुरू कर दी.एक यूजर ने लिखा कि सैलरी भले ही भारत में अच्छी हो, लेकिन क्वालिटी ऑफ लाइफ कहां गई?दूसरे ने कहा कि बेंगलुरु में ऑपर्चुनिटी तो ढेर सारी हैं, मगर ये ट्रैफिक और लेट नाइट मीटिंग्स किसी को भी मार डालेंगी.कुछ लोगों ने भारत का पक्ष भी लिया. एक ने कमेंट किया कि जर्मनी में सब कुछ ऑर्डरली है, ये सच है, लेकिन वहाँ अकेलापन भी बहुत होता है.

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देखें पोस्ट

 'दोनों जगहों के अपने प्लस-माइनस हैं'

बेंगलुरु में दोस्त-यार, परिवार, अच्छा खाना और वो वाली एनर्जीृये चीजें वहां नहीं मिलती.बहुत से लोग ये भी कह रहे हैं कि असली समस्या शहर की नहीं, बल्कि हमारे वर्क कल्चर की है. जहां कंपनी को उम्मीद होती है कि आप 24 घंटे और सातों दिन उपलब्ध रहोगे.आखिर में बात यही निकलती है कि दोनों जगहों के अपने प्लस-माइनस हैं.

 यूरोप में सिस्टम, शांति और वर्क-लाइफ बैलेंस बेहतर है, लेकिन वहां कई बार इंसान अकेला महसूस करता है।.भारत में भाग-दौड़, गड़बड़ और स्ट्रेस ज्यादा है, लेकिन अपने लोग, परिवार और वो जुड़ाव भी तो है जो अकेलेपन से बचाता है.तो सही जवाब क्या है?
शायद कोई एक सही जवाब नहीं है. ये सब आपकी प्राथमिकताओं पर निर्भर करता है -पैसे, शांति, परिवार, या फिर ग्रोथ.


 

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