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'बदलूराम का बदन…', असम रेजीमेंट का यह गीत क्यों हुआ वायरल? जानिए इसके पीछे की कहानी

असम रेजीमेंट के ऑफिसर्स और जवान हाल ही में वायरल हुए एक वीडियो में अपने मशहूर रेजिमेंटल गीत 'बदलूराम का बदन' पर थिरकते नजर आते हैं. आखिर इस गाने की कहानी क्या है और यह इतना खास क्यों है? आइए इसके पीछे छिपी असली वजह जानते हैं.

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यह गीत राइफलमैन बदलूराम की स्मृति में तैयार किया गया था(Photo:X/@Trident)
यह गीत राइफलमैन बदलूराम की स्मृति में तैयार किया गया था(Photo:X/@Trident)

रिपब्लिक डे से पहले चल रही परेड रिहर्सल के दौरान एक अनोखा दृश्य सोशल मीडिया पर खूब चर्चा में है. 20 जनवरी को कर्तव्य पथ पर अभ्यास चल रहा था, जब इंस्ट्रक्टर ने जवानों से माहौल हल्का करने के लिए कोई गीत गाने को कहा. इस दौरान असम रेजीमेंट के जवानों ने अपना रेजिमेंटल गीत चुना-'बदलूराम का बदन जमीन के नीचे है.'

जवानों की जोशीली आवाज और उनकी परफॉर्मेंस का यह वीडियो इंटरनेट पर तेजी से फैल गया है. बहुत से लोग यह जानना चाहते हैं कि आखिर यह गाना इतना खास क्यों है और इसके बोलों के पीछे कहानी क्या है. आइये जानते हैं.

इस सवाल का जवाब इतिहास के उन पन्नों में छिपा है, जो असम रेजीमेंट की बहादुरी के साथ वर्ल्ड वॉर-2 की घटनाओं से जुड़े हुए हैं. यह गीत किसी काल्पनिक पात्र पर नहीं, बल्कि एक सच्चे सैनिक राइफलमैन बदलूराम की स्मृति में बनाया गया था.

बदलूराम ब्रिटिश इंडियन आर्मी की फर्स्ट बटालियन, असम रेजीमेंट के जवान थे. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जब भारतीय और ब्रिटिश सैनिक जापानी सेना से लड़ रहे थे, तब बदलूराम भी इसी मोर्चे पर तैनात थे. लड़ाई के दौरान वे वीरगति को प्राप्त हुए. उनकी शहादत के कुछ ही समय बाद हालात और मुश्किल होते चले गए.

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देखें वायरल वीडियो

जापानी सेना ने कोहिमा क्षेत्र को अपनी घेराबंदी में ले लिया. नतीजतन, ब्रिटिश इंडियन आर्मी की सप्लाई लाइन कट गई और सैनिकों के सामने भोजन की गंभीर समस्या खड़ी हो गई. दुर्गम पहाड़ी इलाकों और जापानी एंटी-एयरक्राफ्ट गन की वजह से एयरड्रॉप सप्लाई भी लगभग असंभव हो गई थी.

इन्हीं कठिन परिस्थितियों में एक मानो चमत्कार जैसी घटना घटी. बदलूराम की कंपनी के वाटर मास्टर ने राशन सूची से उनका नाम हटाना भूल गया था. बदलूराम तक तो वह राशन पहुंच नहीं सकता था, लेकिन रोजाना उनके नाम का अतिरिक्त हिस्सा दर्ज होता रहा. महीनों तक जमा हुआ यही एक्स्ट्रा राशन बाद में घिरे हुए सैनिकों के लिए जीवनदान साबित हुआ.

जब हालात बेहद गंभीर हो चुके थे, तब इसी अतिरिक्त राशन ने सैनिकों को भूख से बचाए रखा और उन्हें लड़ाई जारी रखने की ताकत दी. बदलूराम की इस अदृश्य, लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका की याद में 1946 में मेजर पी.टी. पॉटर ने यह गीत लिखा-बदलूराम का बदन जमीन के नीचे है.

समय के साथ यह गीत असम रेजीमेंट की पहचान बन गया. शिलांग में पासिंग आउट परेड के दौरान यह गीत आज भी रंगूट द्वारा गाया जाता है. सैनिकों के लिए यह केवल एक धुन नहीं, बल्कि साहस, बलिदान और भाईचारे की भावना को सलाम करने का तरीका है.

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आज जब इस गाने पर असम रेजीमेंट के जवानों का वीडियो वायरल हो रहा है, तो देशभर के लोग उस वीर कहानी को फिर से याद कर रहे हैं, जिसने इस गीत को जन्म दिया था.

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