लिंग परीक्षण में नाकाम रही दोहा एशियाई खेल 2006 की रजत पदक विजेता शांति सुंदरराजन अपनी आजीविका के लिये अब ईट के भट्टे पर दिहाड़ी मजदूरी करने को मजबूर है.
शांति ने कहा कि भारतीय एथलेटिक्स महासंघ ने टेस्ट के बाद उस पर प्रतिबंध लगा दिया और अधिकारियों ने उसकी पूरी तरह से उपेक्षा की है.
उसने कहा, ‘मैं दुखी थी लेकिन आगे बढना जरूरी था. मेरे सारे रिकॉर्ड मिटा दिये गए हैं. अब मैं ईट के भट्टे पर काम करके 200 रूपये रोज कमा रही हूं.’
उसने कहा कि राज्य सरकार के कोच के तौर पर उसने नौकरी छोड़ दी क्योंकि तनख्वाह बहुत कम थी. इसके अलावा उसकी नियुक्ति अनुबंध के आधार पर थी और अस्थायी भी.
शांति ने कहा, ‘मैं बेहतर कोच बनना चाहती थी लेकिन इसकी प्रक्रिया पता नहीं थी. अब मैं एक और सरकारी नौकरी तलाश रही हूं.’
उसने दावा किया कि उसकी कोचिंग पाने वाले कई एथलीटों ने राष्ट्रीय टूर्नामेंट जीते.
अपने हाथों के छाले दिखाते हुए उसने कहा कि अब वह पुडुकोट्टाइ जिले के कांथाकुरूची में अपने माता पिता के साथ मजदूरी करती है.
वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों ने हालांकि शांति के दावों का खंडन किया. उन्होंने कहा कि सरकार का रवैया सहानुभूतिपूर्ण रहा है.
अतिरिक्त मुख्य सचिव (खेल) जी ए राजकुमार ने कहा कि उसे जून 2008 में नौकरी की पेशकश की गई थी. तमिलनाडु खेल विकास प्राधिकरण ने उसे कोच बनाया.
उन्होंने कहा, ‘उसने तबादले की मांग की. जिला स्तर पर एथलीट कोच की कोई जगह नहीं थी लेकिन उसके लिये पद का सृजन किया गया और वहां उसका तबादला किया गया.’
उन्होंने कहा कि वह सरकारी नौकरी जारी नहीं रखना चाहती थी तो 31 अगस्त 2010 को उसे पदमुक्त कर दिया गया.
दोहा एशियाड खेलों के बाद तमिलनाडु सरकार ने उसे 15 लाख रूपये दिये थे.
पुडुकोट्टाइ के खेल अधिकारियों ने कहा कि सरकार ने उसे कई मौके दिये जिनका वह इस्तेमाल नहीं कर सकी.