नेटफ्लिक्स की नई सीरीज ‘लैला’ में महिलाओं को जूठी पत्तलों पर लोटने पर मजबूर किया जाता है. ऐसा शुद्धिकरण के नाम पर होता है. लेकिन भारत के कर्नाटक राज्य में असल में ये प्रथा रही है जहां दलित ब्राह्मणों की जूठन और थूक पर लेटते रहे हैं. इसे मडे स्नाना यानी थूक स्नान कहते हैं.
ब्राह्मणों की जूठन और थूक पर लेटने वाले दलितों को ये अहसास कराया जाता था कि इससे उन्हें बुरे कर्मों से छुटकारा मिलेगा. साथ ही त्वचे की बीमारी और अन्य दुख भी दूर हो जाएंगे. आमतौर पर हर साल नवंबर-दिसंबर में होने वाली इस प्रथा में 25 हजार तक लोग भाग लेते थे. (फोटो- नेटफ्लिक्स)
कर्नाटक के दक्षिण कनारा जिले में कुके सुब्रमन्या तीर्थस्थल पर चंपा शास्ती या सुब्रमन्या शास्ती के अवसर पर मडे स्नाना आयोजित किया जाता रहा है. कुके सुब्रमन्या मंदिर में नौ सिरों वाले सांप की मूर्ति को भगवान सुब्रमन्या के नाम से पूजा जाता है. यह तीर्थस्थल खुद को 4,000 सालों से चली आ रही नाग पूजा की परंपरा से खुद को जोड़ता रहा है जिस कारण इसका काफी महत्व है. (फोटो- नेटफ्लिक्स)
इस प्रथा के बारे में कुछ जानकारों का मानना था कि सांपों की बांबियों से निकले कीचड़ में रोगमुक्त करने की क्षमता होती है, शायद इस तरह इस परंपरा की शुरुआत हुई, लेकिन बाद में इसने वैदिक रस्म का स्वरूप ले लिया और इसे अगड़ी जाति के लोग नियंत्रित करने लगे.
पिछले कुछ सालों से मडे स्नाना प्रथा का विरोध होने लगा था और फिर इसे ईडे स्नाना नाम से किया जाने लगा. ईडे स्नाना में लोग प्रसाद रखे हुए पत्तल पर लोटते थे. हालांकि, पिछले साल परयाया पलीमारु मठ ने दोनों ही प्रथा पर रोक लगा दी थी. मठ ने कहा था कि इस प्रथा की वजह से भक्तों में काफी कंफ्यूजन पैदा हो रहा है.