अगर आप दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु जैसे शहरों में रहते हैं, तो ट्रैफिक का मतलब आपके लिए होगा कान फाड़ने वाला हॉर्न का शोर और हर तरफ मची अफरा-तफरी. लेकिन सोचिए, क्या भारत में कोई ऐसा भी शहर हो सकता है जहां ट्रैफिक जाम तो हो, पर हॉर्न की आवाज सुनाई न दे? उत्तर-पूर्व की पहाड़ियों में बसा आइजोल एक ऐसा ही जादुई शहर है. बादलों की ओट में बसे मिजोरम की इस राजधानी को लोग प्यार से भारत की 'साइलेंट सिटी' यानी शांत शहर कहते हैं. यहां की शांति किसी पाबंदी की वजह से नहीं, बल्कि यहां के लोगों के व्यवहार की वजह से है. तो चलिए जानते हैं आइजोल की इस अनोखी शांति और वहां के गजब के अनुशासन का पूरा माजरा.
आइजोल समुद्र तल से करीब 1,132 मीटर की ऊंचाई पर पहाड़ियों की चोटी पर बसा है. यहां से जब आप नीचे घाटियों को देखते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे पूरा शहर बादलों पर तैर रहा हो. लेकिन आइजोल की खूबसूरती सिर्फ इसके नजारों में नहीं, बल्कि यहां की धीमी और शांत जीवनशैली में है. भारत के बाकी हिस्सों में जहां लोग भागम-भाग में रहते हैं, आइजोल के लोग सुकून और धैर्य के साथ अपनी जिंदगी जीना पसंद करते हैं.
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ट्रैफिक जाम है, पर हॉर्न का नाम-ओ-निशान नहीं
आइजोल का सबसे चौंकाने वाला पहलू यहां का अनुशासित यातायात है. एक ऐसे देश में जहां हॉर्न बजाना और आक्रामक ड्राइविंग पहचान बन गई है, आइजोल बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करता है. संकरी और घुमावदार पहाड़ी सड़कों के बावजूद यहां गाड़ियां कतार लगाकर चलती हैं. खतरनाक मोड़ पर भी कोई ओवरटेक करने का जोखिम नहीं उठाता. सबसे खास बात यह है कि यहां बेवजह हॉर्न बजाना बहुत बुरा व्यवहार माना जाता है. ड्राइवर हॉर्न का इस्तेमाल सिर्फ तब करते हैं जब किसी अंधे मोड़ पर अपनी मौजूदगी बताना बेहद जरूरी हो.
वो परंपरा जो दिल जीत लेगी
इस बेमिसाल अनुशासन के पीछे मिजो समुदाय की एक गहरी परंपरा है, जिसे 'तलावमंगैहना' कहा जाता है. इसका सरल अर्थ है, निस्वार्थ भाव, विनम्रता और अपने से पहले दूसरों के बारे में सोचना. इसी सोच की वजह से यहां पैदल यात्रियों का बहुत सम्मान किया जाता है. जब कोई सड़क पार करता है, तो गाड़ियां खुद-ब-खुद धीमी हो जाती हैं. जब भी शहर पर कोई विपदा आती है, तो बिना किसी शोर-शराबे या अफरा-तफरी के, यहां के लोग एक-दूसरे की मदद के लिए खामोशी से कतार में खड़े हो जाते हैं.
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आइजोल की इस खामोशी के पीछे यहां की शानदार साक्षरता दर और जागरूक नागरिक हैं. यहां के लोग अपने शहर को सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि अपना घर मानते हैं. यही वजह है कि यहां सार्वजनिक स्थानों पर कूड़ा फेंकना सिर्फ मना नहीं है, बल्कि इसे बेहद बुरा व्यवहार माना जाता है. अनुशासन का आलम तो देखिए कि जब दफ्तर और स्कूलों की छुट्टी का वक्त होता है, तब ट्रैफिक पुलिस का बोझ कम करने के लिए स्थानीय लोग खुद 'स्वयंसेवक' बनकर सड़कों पर उतर आते हैं. साझा जिम्मेदारी की यही खूबसूरत भावना आइजोल को दुनिया के दूसरे शहरों से जुदा बनाती है. बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिए आइजोल का यह नजारा किसी अजूबे से कम नहीं है, जो हमें यह सबक देता है कि बिना शोर मचाए भी एक सभ्य और अनुशासित शहर चलाया जा सकता है.