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ये है मनाली घूमने का असली 'गेम चेंजर' तरीका, जहां हर कदम पर दिखेगी जन्नत

अगर आपको मनाली का असली और सुकून भरा रूप देखना है, तो इस बार भीड़-भाड़ वाले टूरिस्ट स्पॉट्स से हटकर पैदल रास्तों को चुनिए. क्योंकि मनाली की जन्नत गाड़ियों में नहीं, उन पगडंडियों पर मिलती है जो आपको पहाड़ों के सबसे करीब ले जाती हैं.

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गाड़ी छोड़िए और पैदल चलकर देखिए मनाली का असली रूप (Photo: Pexels)
गाड़ी छोड़िए और पैदल चलकर देखिए मनाली का असली रूप (Photo: Pexels)

अक्सर हम मनाली घूमने का प्लान तो बड़े जोश से बना लेते हैं, लेकिन वहां पहुंचकर पूरा समय टैक्सी बुक करने, मॉल रोड की भीड़ झेलने और वही पुराने टूरिस्ट पॉइंट्स पर फोटो खिंचवाने में निकल जाता है. सच कहें तो पहाड़ों की असली खूबसूरती इन जगहों पर नहीं, बल्कि उन शांत पगडंडियों और अनजान रास्तों में छिपी है, जहां गाड़ियों का शोर नहीं होता.

अगर आप भी वही घिसा-पिटा तरीका छोड़कर कुछ अलग करना चाहते हैं, तो इस बार पैदल निकल पड़िए. देवदार के ऊंचे पेड़ों के बीच से आती धूप, ठंडी पहाड़ी हवा और रास्ते में मिलने वाला सुकून, ये सब आपको कार की खिड़की के पीछे बैठकर कभी महसूस नहीं होगा. ये सिर्फ घूमना नहीं है, बल्कि प्रकृति को करीब से जीना है.

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पगडंडियों पर असली रोमांच

अगर पहाड़ों को सच में महसूस करना है, तो जोगिनी वाटरफॉल की तरफ पैदल चलना एक बढ़िया शुरुआत हो सकती है. वशिष्ठ गांव से होते हुए जब आप सेब के बागानों और घने जंगलों के बीच से गुजरते हैं, तो हर मोड़ पर नया नजारा मिलता है. जब आखिर में झरने की ठंडी फुहार चेहरे पर पड़ती है, तो सारी थकान अपने आप गायब हो जाती है. थोड़ा ज्यादा एडवेंचर चाहिए तो हिडिम्बा मंदिर के पीछे से शुरू होने वाला लामा दुघ ट्रेक आजमाइए. ऊपर पहुंचकर हरे-भरे मैदान और दूर तक दिखती धौलाधार की चोटियां ऐसा नजारा देती हैं, जिसे शब्दों में बताना मुश्किल है.

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जहां रफ्तार धीमी पड़ जाती है

मनाली का एक अलग ही रंग ओल्ड मनाली की गलियों में दिखता है. यहां शोर-शराबा कम है और सुकून ज्यादा. पुराने पहाड़ी घर, छोटे-छोटे कैफे और शांत रास्ते आपको धीमे चलने पर मजबूर कर देते हैं. मनु मंदिर तक की चढ़ाई से पूरी घाटी का शानदार नजारा दिखता है. अगर बस शांति चाहिए, तो वन विहार में देवदार के पेड़ों के बीच टहलें या ब्यास नदी के किनारे बैठकर बहते पानी की आवाज सुनें. यकीन मानिए, ये सुकून किसी महंगे होटल के कमरे में नहीं मिलेगा.

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मनाली को करीब से जानना है, तो नग्गर जैसे पुराने गांवों की गलियों को अपने पैरों से नापिए. वहां के लकड़ी के नक्काशीदार घर, लोगों का सादा रहन-सहन और वो अपनापन आपको शहर की भागदौड़ से दूर एक अलग ही दुनिया में ले जाएगा. सच कहें तो, जंगल के रास्तों से होकर हिडिम्बा देवी मंदिर तक पैदल जाना एक ऐसा अनुभव है जिसे आप कभी नहीं भूलेंगे. 

अगर आप मनाली के इस असली रूप को देखना चाहते हैं, तो मार्च से जून या फिर सितंबर से नवंबर का समय सबसे बढ़िया है. बस एक जोड़ी अच्छे और आरामदायक जूते पहनिए, पानी की बोतल साथ रखिए और निकल पड़िए. यकीन मानिए, पहाड़ों को जीने का इससे देसी और शानदार तरीका कोई और हो ही नहीं सकता. 

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