अगर आप भारतीय हैं तो आपने कभी न कभी ट्रेन में सफर किया ही होगा. बचपन के दिन वो याद कीजिए जब आप गर्मियों की छुट्टियां शुरू होते ही 'नानी के घर' जाने का प्लान बनाते थे. नानी का घर हो या फिर कहीं घूमने जाना हो उसके लिए ट्रेन पकड़ते थे. प्लेटफॉर्म पर खड़े होकर आप अपनी गर्दन तिरछी किए बस ट्रेन का इंतजार करते रहते थे कि कब वो आएगी और कब आप उसमें सवार होकर अपने सफर पर निकलेंगे.
जैसे ही दूर से काली पटरी पर रंग-बिरंगे डिब्बों वाली ट्रेन आपकी तरफ आती थी आप खुशी से उछल पड़ते थे. तब आपके लिए ट्रेन सिर्फ एक सवारी थी, लेकिन अब जब आप बड़े हो गए हैं तो क्या आपने कभी गौर किया कि हर बार ट्रेन के डिब्बों का रंग बदल जाता है? क्या कभी आपके मन में ये सवाल उठा है कि आखिर ट्रेन के डिब्बों के रंग बदलते क्यों हैं?
भारतीय रेलवे ने सालों से अपनी ट्रेनों को अलग-अलग रंगों में रंगा है, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि ये सिर्फ पेंट का फर्क नहीं है. हर रंग के पीछे एक पूरी कहानी है, जिसमें इसकी इंजीनियरिंग, सुरक्षा का पैमाना और यात्रियों की सहूलियत का लेवल छिपा होता है. अगर आप इन रंगों का मतलब समझ लें, तो बिना टिकट देखे ही आप बता सकते हैं कि अंदर की सीट कैसी होगी और ट्रेन कितनी रफ्तार से अपने गंतव्य की तरफ दौड़ेगी. चलिए जानते हैं कौन से रंग की ट्रेन क्या बताती है.
नीली ट्रेनें
आपने बहुत बार नीले रंग की ट्रेनों में सफर किया होगा. ये ट्रेनें भारतीय रेलवे की पहचान मानी जाती हैं, जो आज भी देश के कई हिस्सों को जोड़ रही हैं. नीले रंग के कोच इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) वाले पुराने जमाने के कोच होते हैं. अगर आपकी ट्रेन नीली है, तो समझिए आप एक ऐसी मशीन में सवार हैं जिसने पिछले कई दशकों से करोड़ों भारतीयों को उनकी मंजिल तक पहुंचाया है.
ये कोच लोहे के बने होते हैं और इनमें हवा वाला ब्रेक (एयर ब्रेक) सिस्टम होता है. नई ट्रेनों के मुकाबले इनमें झटके थोड़े ज्यादा महसूस हो सकते हैं और इनकी रफ्तार आमतौर पर 110 किमी प्रति घंटा तक सीमित रहती है, लेकिन किफायती सफर के लिए ये आज भी सबकी पहली पसंद हैं.
लाल ट्रेनें
लिस्ट में अगला नंबर लाल ट्रेनों का आता है. जब आप रेलवे स्टेशनों पर पहुंचते हैं, तो आपको अक्सर लाल या गहरे मरून रंग की ट्रेनें देखने को मिल जाती हैं. ये लिंके हॉफमैन बुश (LHB) कोच कहलाते हैं, जो जर्मनी की तकनीक पर आधारित हैं. इन लाल डिब्बों की सबसे बड़ी खासियत इनकी सुरक्षा है.
ये डिब्बे लोहे से नहीं स्टेनलेस स्टील से बने होते हैं. खास बात ये है कि अगर कोई एक्सीडेंट होता है तो ये डिब्बे एक-दूसरे के ऊपर नहीं चढ़ते. इसके अलावा, इनमें डिस्क ब्रेक होते हैं और ये 160 किमी प्रति घंटा की रफ्तार भी छू सकते हैं.
सफेद ट्रेनें
जब हम सफेद रंग की ट्रेनों की बात करते हैं तो ये भारतीय रेलवे के मॉडर्न अवतार का प्रतीक हैं. ये कोई नॉर्मल ट्रेन नहीं हैं, बल्कि एक 'सेल्फ-प्रोपेल्ड' यूनिट हैं, जिसका मतलब है कि इसमें अलग से इंजन लगाने की जरूरत नहीं होती. पूरी ट्रेन खुद ही एक इंजन की तरह काम करती है. सफेद रंग इसकी प्रीमियम पहचान को दर्शाता है. इनमें आपको वर्ल्ड-क्लास सुविधाएं, जैसे घूमने वाली सीटें, ऑटोमैटिक दरवाजे और जीपीएस वाली जानकारी मिलती है.